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झारखंड HC ने विद्युत शुल्क अधिनियम किया निरस्त, 1000% बिल बढ़ोतरी पर रोक; 2021 का संशोधन अधिनियम असंवैधानिक

Chikheang 2026-1-7 05:26:57 views 1259
  



राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य के औद्योगिक और बिजली क्षेत्र को बड़ी राहत देते हुए सोमवार को एक अहम फैसला सुनाया। हाई कोर्ट ने झारखंड विद्युत शुल्क (प्रथम संशोधन) अधिनियम, 2021 तथा उससे जुड़े विद्युत शुल्क नियम 2021 को असंवैधानिक और मनमाना करार देते हुए निरस्त कर दिया है।

चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने यह फैसला मेसर्स पाली हिल ब्रुअरीज प्राइवेट लिमिटेड समेत 30 से अधिक याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई के बाद दिया। इन याचिकाओं में बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों, कैप्टिव पावर उत्पादकों, स्टील और खनन कंपनियों तथा औद्योगिक संगठनों ने राज्य सरकार के फैसले को चुनौती दी थी।

हाई कोर्ट ने माना कि राज्य सरकार ने मूल कानून बिहार विद्युत शुल्क अधिनियम, 1948 (जिसे झारखंड ने अपनाया है) की चार्जिंग धारा में संशोधन किए बिना ही बिजली शुल्क की गणना की पद्धति बदल दी गई।

बिजली शुल्क केवल खपत या बिक्री की गई बिजली की इकाइयों (यूनिट) पर ही लगाया जा सकता है। नेट चार्जेज के आधार पर शुल्क लगाने का कोई कानूनी प्रविधान नहीं है। नेट चार्जेज शब्द की परिभाषा कानून में नहीं दी गई, जिससे यह व्यवस्था अस्पष्ट और मनमानी बन जाती है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि एक मामले में नई व्यवस्था के कारण किसी औद्योगिक उपभोक्ता पर बिजली शुल्क में लगभग 1000 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो गई थी। नेट चार्जेज के आधार पर शुल्क लगाने का कोई कानूनी प्रविधान नहीं है।

खंडपीठ ने उस प्रविधान को भी निरस्त कर दिया, जिसके तहत राज्य सरकार को अधिसूचना जारी कर बिजली शुल्क की दरें बदलने का अधिकार दिया गया था। अदालत ने इसे बिना किसी स्पष्ट नीति के विधायी शक्तियों का अत्यधिक हस्तांतरण बताया। साथ ही कोर्ट ने कहा कि विद्युत नियामक आयोग द्वारा तय टैरिफ से बिजली शुल्क को जोड़ना समान परिस्थितियों वाले उपभोक्ताओं के बीच असमानता पैदा कर सकता है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

हालांकि, कोर्ट ने झारखंड विद्युत शुल्क (द्वितीय संशोधन) अधिनियम, 2021 को वैध ठहराया। इस संशोधन के तहत कैप्टिव पावर प्लांट्स पर 17 फरवरी 2022 से 50 पैसे प्रति यूनिट की दर से बिजली शुल्क लगाया गया है।

अदालत ने कहा कि कर दर तय करना राज्य की आर्थिक नीति का विषय है और जब तक इसमें संवैधानिक उल्लंघन न हो, न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं है। प्रार्थियों की ओर से अदालत को बताया गया कि राज्य सरकार ने कानून की मूल संरचना को बदले बिना ही टैक्स लगाने की पूरी प्रणाली बदल दी, जो संविधान और स्थापित न्याय सिद्धांतों के विपरीत है।
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