चीन को बड़े पैमाने पर तेल बेचना अमेरिका को हरगिज स्वीकार नहीं था
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। बीते शनिवार वेनेजुएला में हुई अमेरिका की आक्रामक और त्वरित सैन्य कार्रवाई को केवल एक अचानक लिया गया फैसला नहीं माना जा सकता। यह तेल-संपन्न देश पर दशकों से बनाए जा रहे अमेरिकी दबाव की परिणति थी। 1990 के दशक में जब वेनेजुएला ने अमेरिकी तेल कंपनियों को बाहर का रास्ता दिखाया, तब से ही वाशिंगटन के मन में असंतोष पलता रहा। इस पर चीन का बढ़ता दखल अमेरिका के लिए जख्म पर नमक छिड़कने जैसा साबित हुआ।
सख्त अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच वेनेजुएला द्वारा चीन को बड़े पैमाने पर तेल बेचना अमेरिका को हरगिज स्वीकार नहीं था। दावा किया जाता है कि राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को सत्ता से हटाने के लिए अमेरिका ने अप्रैल 2019 और मई 2020 में तख्तापलट की कोशिशें कीं। इन प्रयासों में मादुरो की हत्या की साजिश के आरोप भी लगे, हालांकि अमेरिका ने इन्हें हमेशा खारिज किया। तीसरी बार अमेरिका कोई जोखिम नहीं लेना चाहता था।
5 महीने से थी तैयारी
तीन जनवरी 2026 को की गई कार्रवाई इतनी सटीक और तेज थी कि मादुरो के सुरक्षाकर्मियों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। बताया जाता है कि इस ऑपरेशन की तैयारी पिछले पांच महीनों से चल रही थी। मादुरो को पकड़कर अमेरिका लाए जाने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब वेनेजुएला का प्रशासन अमेरिका संभालेगा और उसके तेल संसाधनों का कायाकल्प अमेरिकी कंपनियां करेंगी।
न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, ट्रंप ने अपनी एक प्रेस कान्फ्रेंस में कम से कम 20 बार वेनेजुएला के तेल का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अमेरिकी तेल कंपनियां वेनेजुएला के जर्जर तेल ढांचे में अरबों डॉलर का निवेश करेंगी और देश को दोबारा आर्थिक रूप से खड़ा करेंगी।
तेल पर नजर, चीन का दखल
वेनेजुएला के पास करीब 303 अरब बैरल कच्चे तेल का भंडार है, जो दुनिया के कुल तेल भंडार का लगभग 20 प्रतिशत माना जाता है। इस मामले में वह सऊदी अरब जैसे देशों से भी आगे है।
ट्रंप के बयानों से संकेत मिलता है कि बीते तीन दशकों से चली आ रही अमेरिका-वेनेजुएला की दुश्मनी अब खत्म हो सकती है। गौरतलब है कि 1960 के दशक से अमेरिकी तेल कंपनियों ने वेनेजुएला में भारी निवेश किया था। हालांकि 1976 में तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण ने एक्सॉनमोबिल जैसी कंपनियों को बड़ा झटका दिया। ट्रंप ने यह तक कहा कि वेनेजुएला ने अमेरिका का तेल “चुरा\“\“ लिया था। राष्ट्रीयकरण के बाद वेनेजुएला में आर्थिक अव्यवस्था गहराती चली गई।
आंदोलन कुचलने के लिए उतारी सेना
1988 में उसे आईएमएफ से कर्ज लेना पड़ा। विरोध प्रदर्शनों का दौर शुरू हुआ और फरवरी 1989 में एक बड़े आंदोलन को कुचलने के लिए सेना उतारनी पड़ी। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 300 लोगों की मौत हुई, जबकि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक बताई जाती है। इसी माहौल में ह्यूगो शावेज का उदय हुआ। 1992 के असफल तख्तापलट और 1998 में सत्ता में आने के बाद शावेज अमेरिका-विरोधी राजनीति के प्रतीक बने। 2002 में अमेरिका समर्थित तख्तापलट के बावजूद उनकी दो दिन में वापसी ने वाशिंगटन को शर्मिंदा कर दिया।
मादुरो की अलोकप्रियता अमेरिका के काम आई। शावेज के बाद सत्ता संभालने वाले निकोलस मादुरो न तो उतने लोकप्रिय रहे और न ही दूरदर्शी। उनके शासन में देश फिर आर्थिक संकट में फंस गया। लाखों लोग देश छोड़कर चले गए। अमेरिका और चीन के बीच फंसे वेनेजुएला में अंतत: वही हुआ, जिसकी आशंका वर्षों से जताई जा रही थी- अमेरिका ने सीधे हस्तक्षेप कर मादुरो को सत्ता से बाहर कर दिया। उनकी गिरफ्तारी के बाद देश में सीमित विरोध हुआ और बड़ी संख्या में लोग इसे बदलाव के रूप में देखते नजर आए।
यह भी पढ़ें- वेनेजुएला के बाद ग्रीनलैंड में ट्रंप की धमक, यूरोप हुआ एकजुट; जर्मनी-फ्रांस समेत 7 देशों का US को करारा जवाब |
|