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अब गांवों में भी बन रहे लखपति, पशुपालन ने बदली ग्रामीण अर्थव्यवस्था; बकरी–पोल्ट्री से दोगुनी हो रही आमदनी

LHC0088 4 day(s) ago views 333
  

पशुपालन ने बदली ग्रामीण अर्थव्यवस्था



डिजिटल डेस्क, पटना। कभी रोज़गार के लिए शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर रहने वाले बिहार के ग्रामीण अब अपने ही गांव में कमाई का मजबूत जरिया खड़ा कर रहे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कल्याणकारी नीतियों और सतत जीविकोपार्जन योजना के सहारे गांवों में पशुपालन एक नए आर्थिक मॉडल के रूप में उभर रहा है। बकरी पालन, पोल्ट्री फार्म, डेयरी और मत्स्य पालन से अब हजारों नहीं, बल्कि लाखों परिवार आत्मनिर्भर बनते दिख रहे हैं।

ग्रामीण विकास विभाग के आंकड़ों के अनुसार, बीते 20 वर्षों में इस योजना से जुड़े गरीब परिवारों की आमदनी लगभग दोगुनी हो चुकी है। आज ग्रामीण इलाकों में लोग कृषि और मजदूरी के साथ-साथ पशुपालन को जोड़कर सालाना एक से डेढ़ लाख रुपये तक की अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं। खास बात यह है कि इस बदलाव में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है, जिससे गांवों की आर्थिक तस्वीर और मजबूत हो रही है।
कोरोना के बाद पशुपालन से जुड़ने वालों की संख्या में उछाल

कोरोना काल के बाद पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत सहारा बना। वर्ष 2020-21 के बाद बिहार में 8.12 लाख परिवार बकरी पालन के व्यवसाय से जुड़े, जबकि 2.24 लाख परिवारों ने पोल्ट्री फार्म को अपना रोजगार बनाया।

इसके अलावा 1.75 लाख परिवार डेयरी और 751 परिवार मत्स्य पालन से जुड़कर नियमित आय अर्जित कर रहे हैं।

सरकार ने मनरेगा के तहत पशुपालकों के लिए शेड निर्माण और पोल्ट्री फार्म के विकास पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए हैं। इससे गरीब, एससी-एसटी वर्ग के लोगों को बिना बड़े निवेश के रोजगार का अवसर मिला है।

विभागीय अधिकारियों के अनुसार, पशुपालन से जुड़े परिवार हर महीने 8 से 10 हजार रुपये की स्थायी आमदनी आसानी से कर रहे हैं।
ऋण पर छूट और आसान प्रक्रिया

पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने ऋण प्रक्रिया को भी सरल बनाया है। समूह से जुड़े लाभुकों को बैंकों से कम ब्याज दर पर लोन मिल रहा है।

इससे ग्रामीणों का आत्मविश्वास बढ़ा है और वे नए व्यवसाय शुरू करने में आगे आ रहे हैं। बकरी पालन, पोल्ट्री, डेयरी और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में तेजी से विस्तार हो रहा है।
ग्राम सभा से आवेदन, समूह के जरिए लाभ

सतत जीविकोपार्जन योजना के तहत लाभ लेने के लिए ग्रामीणों को ग्राम सभा या पूरक ग्राम सभा के माध्यम से आवेदन करना होता है। गरीब परिवारों और एससी-एसटी वर्ग को प्राथमिकता दी जाती है।

आवेदन स्वीकृत होने पर लाभुक को यूनिक कोड दिया जाता है। इसके बाद संबंधित व्यवसाय के लिए शेड का निर्माण कर समूह को सौंपा जाता है। समूह के माध्यम से बैंक ऋण उपलब्ध कराया जाता है, जिसे आसान किस्तों में चुकाया जाता है।
गांवों में आर्थिक क्रांति की उम्मीद

ग्रामीण विकास सह परिवहन मंत्री श्रवण कुमार ने योजना की सफलता की सराहना करते हुए कहा कि पशुपालन गांवों के विकास का मजबूत स्तंभ बन चुका है।

इससे न केवल किसानों की आय बढ़ी है, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा हुए हैं। विभाग पशुओं के स्वास्थ्य और पोषण पर भी विशेष ध्यान दे रहा है।

स्पष्ट है कि बिहार के गांव अब सिर्फ खेती पर निर्भर नहीं हैं। पशुपालन ने ग्रामीणों को लखपति बनने का रास्ता दिखाया है और आने वाले समय में यह क्षेत्र गांवों की आर्थिक मजबूती की सबसे बड़ी कहानी बनने जा रहा है।
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