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डकार ली तो मास्टर साहब ने क्लास में पटक कर पीट डाला, बेतिया के ओझवलिया स्कूल की घटना ने शिक्षा व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया

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डकार ली तो मास्टर साहब ने क्लास में पटक कर पीट डाला (फोटो-सोशल मीडिया)



जागरण संवाददाता, बेतिया (पश्चिम चंपारण)। विद्यालय को बच्चों के लिए सुरक्षित, संवेदनशील और सीखने का स्थान माना जाता है, लेकिन पश्चिम चंपारण के बेतिया स्थित उच्च माध्यमिक विद्यालय ओझवलिया से सामने आई घटना ने इस भरोसे को झकझोर कर रख दिया है। कक्षा-9 के दो छात्रों के साथ हुई कथित मारपीट सिर्फ एक अनुशासनात्मक विवाद नहीं, बल्कि उस मानसिकता को उजागर करती है, जहां संवाद की जगह दंड और समझाने की जगह हिंसा को चुन लिया गया।

यह मामला 6 दिसंबर का बताया जा रहा है, जब कक्षा के दौरान एक छात्र से अनजाने में डकार निकल गई। आरोप है कि इसी बात पर दो शिक्षक आपा खो बैठे और छात्रों को कक्षा से बाहर निकालकर बेरहमी से पीटा गया। घटना सामने आने के बाद शिक्षा विभाग हरकत में आया है और अब इसे शिक्षक-छात्र संबंधों के गंभीर उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है।
अनुशासन या अत्याचार?

शिकायत के अनुसार, कक्षा में डकार लेने को अनुशासनहीनता मानते हुए शिक्षक सुनील कुमार पाल और संदीप कुमार राय ने दो छात्रों को जबरन बाहर निकाला। आरोप है कि छात्रों को टाइल्स लगी जमीन पर पटक दिया गया और फिर उनकी पिटाई की गई। छात्रों का कहना है कि वे हाथ जोड़कर माफी मांगते रहे, लेकिन गुस्से में डूबे शिक्षक नहीं रुके।

यह घटना एक बड़ा सवाल खड़ा करती है, क्या स्कूलों में अनुशासन कायम करने का तरीका आज भी डर और मारपीट ही है? क्या बच्चों की गलती, चाहे वह कितनी भी छोटी क्यों न हो, शारीरिक दंड का कारण बन सकती है?
मूकदर्शक बने शिक्षक, माहौल पर सवाल

पीड़ित छात्रों ने यह भी आरोप लगाया है कि घटना के समय अन्य शिक्षक मौजूद थे, लेकिन किसी ने हस्तक्षेप नहीं किया। यह चुप्पी सिर्फ दो छात्रों की पिटाई तक सीमित नहीं है, बल्कि स्कूल के पूरे माहौल को कटघरे में खड़ा करती है।


यदि शिक्षक ही एक-दूसरे के गलत व्यवहार पर मौन साध लें, तो छात्रों को सुरक्षा का भरोसा कैसे मिलेगा? यह सवाल अब अभिभावकों और स्थानीय लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।
निष्कासन की पैरवी से बढ़ा मानसिक दबाव

मामले ने तब और गंभीर रूप ले लिया, जब आरोप सामने आए कि मारपीट के बाद शिक्षकों ने प्रधानाध्यापक से छात्रों को विद्यालय से निष्कासित करने की पैरवी की।

बच्चों और उनके परिजनों का कहना है कि यह कदम छात्रों पर मानसिक दबाव बनाने जैसा था। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि छात्रों से कोई गलती हुई भी थी, तो उसका समाधान समझाइश, चेतावनी या नियमों के तहत कार्रवाई से किया जा सकता था, न कि हिंसा और निष्कासन की धमकी देकर किया जा सकता है।
शिक्षा विभाग का सख्त रुख

मामले की लिखित शिकायत पटखौली परती टोला, बैरिया निवासी मो. सैयद हुसैन द्वारा जिला शिक्षा पदाधिकारी को दी गई थी। शिकायत के आधार पर डीपीओ समग्र शिक्षा एवं माध्यमिक शिक्षा-साक्षरता गार्गी कुमारी ने आरोपित दोनों शिक्षकों से तीन दिनों के भीतर स्पष्टीकरण तलब किया है।

डीपीओ ने अपने आदेश में साफ तौर पर कहा है कि यह मामला अध्यापक आचरण संहिता और शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE), 2009 के प्रावधानों का उल्लंघन है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि विद्यालय में शारीरिक दंड किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं है और यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित शिक्षकों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
सिर्फ एक घटना नहीं, सिस्टम की चेतावनी

शिक्षाविदों का कहना है कि यह मामला केवल दो शिक्षकों के व्यवहार तक सीमित नहीं है। यह उस सोच को दर्शाता है, जो आज भी कई स्कूलों में बच्चों को अधिकारों वाले नागरिक नहीं, बल्कि डर से नियंत्रित किए जाने वाले अधीनस्थ मानती है।

RTE कानून स्पष्ट रूप से शारीरिक दंड पर रोक लगाता है, फिर भी ऐसी घटनाओं का सामने आना यह दिखाता है कि नियमों की जानकारी और संवेदनशीलता दोनों की कमी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि शिक्षकों के लिए नियमित काउंसलिंग, व्यवहार प्रशिक्षण और बाल मनोविज्ञान की समझ बेहद जरूरी है।
अभिभावकों में आक्रोश, भरोसा डगमगाया

घटना के बाद से अभिभावकों में गुस्सा और चिंता दोनों है। उनका कहना है कि वे बच्चों को स्कूल इसलिए भेजते हैं कि वे सुरक्षित माहौल में पढ़ें-लिखें, न कि डर और मारपीट का शिकार हों।


स्थानीय लोगों ने मांग की है कि सिर्फ स्पष्टीकरण तक सीमित न रहकर इस मामले में निष्पक्ष जांच हो और दोषियों पर उदाहरणात्मक कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
सवाल जो अब भी बाकी

ओझवलिया स्कूल की यह घटना कई सवाल छोड़ जाती है...

  • क्या बच्चों की छोटी-सी गलती पर हिंसा जायज है?
  • क्या शिक्षक अनुशासन के नाम पर कानून से ऊपर हो सकते हैं?
  • और सबसे बड़ा सवाल, क्या हमारे स्कूल बच्चों के लिए सच में सुरक्षित हैं?


अब सबकी नजरें शिक्षा विभाग की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। यह मामला केवल दो छात्रों के इंसाफ का नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र में भरोसे की बहाली का इम्तिहान बन चुका है।
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