जम्मू-कश्मीर के विभिन्न राजनीतिक दल इस मुद्दे पर आमने-सामने हैं, जिससे सदन में हंगामा तय है।
राज्य ब्यूरो, जम्मू। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के लिए आरक्षण नीति का मुद्दा बजट सत्र में एक बार फिर मुश्किल पैदा करने जा रहा है। उन्हें सिर्फ अपने विरोधियों का ही नहीं अपने करीबियों की भी आलोचना व सवालों का सामना करना पड़ेगा।
वह आरक्षण को युक्तिसंगत बनाने के अपने वादे को पूरा करने में अब तक की विफलता के लिए लोकभवन को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं, लेकिन आर्थिक रूप से पिछड़ वर्ग और पिछड़ा क्षेत्र जैसे आरक्षित वर्गाें के कोटे पर इस प्रक्रिया में कैंची चलने का दावा किया जा रहा है, के समर्थक भी सत्र का ही इंतजार कर रहे हैं।
जम्मू कश्मीर में वर्ष 2018 से वर्ष 2024 में निर्वाचित सरकार के गठन तक आरक्षण कोटे में व्यापक बदलाव हुआ है और इस दौरान सामान्य वर्ग जिसे ओपन मेरिट कहा जाता है के लिए सरकारी नौकरियों व सरकारी प्रोफेशनल शिक्षण संस्थानों लिए अवसर 40 प्रतिशत तक सीमित हो गए हैं।
जम्मू-कश्मीर में अब तक क्या है आरक्षण कोटा
मौजूदा समय में जम्मू कश्मीर में अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए आठ प्रतिशत, अनुसूचित जनजातियों के लिए 20(गुज्जर और बकरवाल के लिए 10 और पहाड़ी बोलने वाले लोगों के लिए 10 प्रतिशत), आर्थिक रूप से पिछड़े अथवा कमजोर वर्गाें के लिए 10 और पिछड़े क्षेत्रों के निवासियों जिन्हें आरबीए कहते हैं के लिए 10 और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को आठ प्रतिशत आरक्षण है।
वास्तविक नियंत्रण रेखा (एएलसी) और अंतर्राष्ट्रीय सीमा (आइबी) के साथ रहने वाले लोगों को चार प्रतिशत आरक्षण है। इसके अलावा ओपन मेरिटर में, विकलांग व्यक्तियों या पीडब्लयूडी के लिए तीन प्रतिशत, रक्षा कर्मियों के बच्चों के लिए तीन प्रतिशत, अर्धसैनिक और पुलिस अधिकारियों के बच्चों को एक प्रतिशत और असाधारण खेल प्रदर्शन वाले आवेदकों के दो प्रतिशत का क्षैतिज कोटा है।
सर्वाेच्च न्यायालय के अनुसार, आरक्षण कोटा 50 प्रतिशत तक होना चाहिए। वर्ष 2024 में प्रदेश में विधानसभा चुनाव में आरक्षण नीति का मुद्दा भी नेशनल कान्फ्रेंस, पीडीपी, पीपुल्स कान्फ्रेंस जैसे दलों नेअपने चुनाव प्रचार में उछाला था और सभी ने इसे युक्तिसंगत बनाने का यकीन दिलाया था।
निर्वाचित सरकार के गठन के बाद जब इस मुद्दे पर कोई हलचल होती नजर नहीं आयी तो कश्मीर में ओपन मेरिट से संबधित युवाओं ने मुख्यमंत्री के घर के बाहर धरना दिया था। इसमें कश्मीर केंद्रित सभी राजनीतिक,सामाजिक सगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे।
आरक्षण का मुद्दा अब लोकभवन में विचाराधीन
नेशनल कान्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता व सांसद आगा सैयद रुहुल्ला आंदोलनकारियों का नेतृत्व करते नजर आए थे। इसके बाद मुख्यमंत्री ने आरक्षण नीति को युक्ति संगत बनाने के लिए केबिनेट उपसमिति का गठन किया, जिसने गत वर्ष अपनी रिपोर्ट दी और कैबिनेट उस पर मुहर लगाकर उसे लोकभवन भेज दिया, जहां से अभी तक कोई जवाब नहीं आया है।
इस बीच, स्वास्थ्य विभाग में स्वास्थ्य अधिकारियों और जम्मू कश्मीर में पुलिस कांस्टेबल भर्ती के साथ यह मुद्दा फिर गर्मा गया है। इस मुद्दे पर गत दिसंबर में श्रीनगर में एक प्रदर्शन का आयोजन किया गया, लेकिन पुलिस ने सभी प्रमुख नेताओं को नजरबंद बना इसे नाकाम बना दिया था। इससे मामला शांत होने क बजाय और तूल पकड़ गया है।
प्रदर्शन अब उपराज्यपाल के घर के बाहर होना चाहिए
सत्ताधारी नेशनल कान्फ्रेंस की वरिष्ठ नेता और समाज कल्याणमंत्री सकीना इट्टू के अनुसार, सरकार ने अपना काम कर दिया है। प्रदर्शन करना है तो अब यह उपराज्यपाल के घर के बाहर होना चाहिए, मुख्यमंत्री के घर के बाहर नहीं। उन्होंने कहा हमने आरक्षण नीति को युक्तिसंगत बनाया है। युक्तिसंगत कैसे बनाया है,इस पर उन्होंने कभी भी कुछ भी स्पष्ट रूप से नहीं बताया है। इससे आरक्षण कोटे को लेकर असमंजस बना हुआ है।
पीडीपी नेता वहीद उर रहमान परा ने कहा कि सरकार आरक्षण नीति को युक्तिसंगत बनाने के नाम पर न सिर्फ ओपन मेरिट को मूर्ख बना रही है, बल्कि आर्थिक रूप से कमजोर और आरबीए वर्ग के साथ अन्याय भी करने जा रही है,जो सर्वथा अनुचित है। हमारे लिए यह असहनीय है।
कश्मीर के नौजवानों के साथ विश्वासघात किया
सरकार आरक्षण को युक्ति संगत बनाने की मांग कर रहे लोगों के आंदोलन को बेशक अभी पाबंदियो के सहारे दबा रही है, लेकिन सदन में उसे जवाब देना होगा। नेशनल कान्फ्रेंस ने इस मुद्दे पर कश्मीर के नौजवानों के साथ विश्वासघात किया है। जिन वर्गाें के कोटे पर कैंची चलाए जाने की बात है, उससे सबसे ज्यादा कश्मीर प्रांत ही प्रभावित होगा। भाजपा नेता सुनील शर्मा के अनुसार, भाजपा किसी भी तरह से आर्थिक रूप से कमजार और आरबीए के साथ अन्याय नहीं होने देगी और उनके आरक्षण कोटे में किसी तरह की कटौती की इजाजत देगी।
पीपुल्स कान्फ्रेंस के चेयरमैन सज्जाद गनी लोन ने कहा कि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को अगर देखे तो वह अपनी हर विफलता के लिए लोकभवन को जिम्मेदार ठहराते हैं। वह सीधे बताएं कि उन्होंने आरक्षण कोटे को कैसे युक्तिसंगत बनाया है,लोकभवन में उन्होंने क्या प्रस्ताव भेजा है।
हम किसी के आरक्षण के खिलाफ नहीं
यह पता चलना चाहिए। हम किसी के आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन यह ओपन मेरिट के नौजवान कहां जाएं, किसके दरवाजे पर जाकर अपना हक मांगे। उन्होंने कहा कि अगर आप अनुसूचित जनजाति, आर्थिक रूप से कमजोर और आरबीए जैसे आरक्षत वर्गाें का आकलन करेंगे तो भी पाएंगे कि इन वर्गाें में कोटे के लाभार्थियों की संख्या कश्मीर में जम्मू प्रांत की तुलना में कम है।
दूसरी तरफ नेशनल कान्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता और गुरेज के विधायक नजीर अहमद गुरेजी भी कह रहे हैं कि हम न अनुसूचित जनजाति के कोटे में कटौती करने दंगे न एएलसी के कोटे में और न आरबीए व आर्थिक रूप से कमजोर वर्गाें के कोटे में। उन्होंने कहा कि आरबीए के दायरे में आने वाले स्कूल-कालेजों की स्थिति को हमसे बेहतर कोईनहीं जानता। हम एलओसी के साथ बसे हैं,हमें पता है कि वहां क्या हालात हैं। यह कहना गलत है कि आरक्षित वर्गाें में प्रतिभा नहीं है, प्रतिभा है । |