deltin33 • 2026-1-4 20:56:38 • views 1182
मुंबई महानगरपालिका। (फाइल)
ओमप्रकाश तिवारी, मुंबई। मुंबई महानगरपालिका के होने जा रहे चुनावों में जहां तीन बड़े गठबंधन या पार्टियां चुनाव लड़ रही हैं, वहीं कई छोटे दल भी मैदान में हैं। बीएमसी चुनावों में बहुत कम मतों से होनेवाली जीत-हार में ये छोटे दल कई बड़े दलों, खासतौर से सेक्युलर दलों का खेल बिगाड़ सकती हैं।
मुंबई महानगरपालिका पर कब्जा करने के लिए एक ओर शिवसेना(यूबीटी), महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और राकांपा (शरदचंद्र पवार) का गठबंधन चुनाव मैदान में है, तो उसकी सीधी टक्कर भाजपा-शिवसेना (शिंदे) गठबंधन से है। पिछले लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव में महाविकास आघाड़ी में रही कांग्रेस इस बार गठबंधन से अलग होकर प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी को साथ लेकर चुनाव लड़ रही है।
इस प्रकार त्रिकोणीय लड़ाई तो इन तीनों गठबंधनों के बीच है ही। लेकिन इनके अतिरिक्त विशेषकर मुंबई में समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, एआईएमआईएम, रिपब्लिकन पार्टी (आठवले) और अजीत पवार के नेतृत्ववाली राकांपा भी अपने-अपने चुनाव चिन्हों पर मैदान में हैं।
सपा ने मुंबई में 70 उम्मीदवार उतारे हैं, तो राकांपा (अजीत) करीब 100 सीटों पर। आरपीआई (आठवले) ने 39 उम्मीदवार उतारे हैं, तो आम आदमी पार्टी ने 75 उम्मीदवारों की घोषणा की है।
मुंबई के लिहाज से ये सभी दल छोटे लग सकते हैं। लेकिन आम आदमी पार्टी को छोड़कर बाकी सब अपनी-अपनी ताकत कभी न कभी दिखा चुके हैं।
बीएमसी में 70 सीटों पर चुनाव लड़ रही सपा 1997 में न सिर्फ 22 सभासद जितवाकर ला चुकी है, बल्कि उन्हीं सभासदों के दम पर विधान परिषद में भी एक सीट जीत चुकी है। उसके तेजतर्रार प्रदेश अध्यक्ष अबू आसिम आजमी कहते हैं कि इस बार टिकट वितरण में उन्होंने अपने नेता अखिलेश यादव की पीडीए नीति का पूरा पालन की करने की कोशिश की है। इसका लाभ उनकी पार्टी को जरूर मिलेगा।
उन्होंने भिवंडी में भी 60 उम्मीदवार खड़े किए हैं। जाहिर है सपा अपने प्रतिबद्ध मुस्लिम वोटबैंक के जरिए न सिर्फ कांग्रेस बल्कि शिवसेना (यूबीटी) को भी नुकसान पहुंचाएगी।
केंद्र की भाजपा सरकार में राज्यमंत्री रामदास आठवले ने गठबंधन की बातचीत में उपेक्षा का आरोप लगाते हुए बीएमसी में 39 उम्मीदवार उतार दिए हैं। लेकिन शनिवार को हुई महायुति की पहली संयुक्त सभा में वह मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस एवं उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से गलबहियां करते दिखाई दिए।
उनके द्वारा स्वतंत्र उम्मीदवार उतारा जाना भाजपा की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। क्योंकि मुंबई-ठाणे के मराठी रिपब्लिकन क्षेत्रों में उनके प्रतिबद्ध मतदाताओं की संख्या कम नहीं है।
1992 में कांग्रेस उनके सहयोग से ही अपना मेयर बना सकी थी। इस बार यदि वह कांग्रेस के नए-नए सहयोगी बने प्रकाश आंबेडकर के उम्मीदवारों को धक्का दे सके, तो नुकसान कांग्रेस को ही पहुंचाएंगे।
भाजपानीत महायुति से अलग होने का बहुत कम नुकसान महायुति को होगा। अजीत पवार की राकांपा के मुंबई अध्यक्ष नवाब मलिक का मुंबई के कई क्षेत्रों में अच्छा जनाधार है। यदि वह मुस्लिम बहुल क्षेत्रों एवं सेक्युलर मतदाताओं के बीच अच्छा वोट बटोर सके, तो कथित सेक्युलर दलों को ही उठाना पड़ेगा। |
|