search

गर्भपात के लिए विवाहिता की इच्छा ही निर्णायक, पति की सहमति की आवश्यकता नहीं, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

deltin33 2026-1-1 12:27:33 views 530
  

हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि गर्भपात के महिला की सहमति और इच्छा ही निर्णायक है।



दयानंद शर्मा, चंडीगढ़। गर्भपात के लिए विवाहित महिला की इच्छा और सहमति ही सर्वोपरि है। इसके लिए पति की अनुमति न तो आवश्यक है और न ही कानून इसकी मांग करता है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संवैधानिक संरक्षण देते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

पंजाब के फतेहगढ़ साहिब की रहने वाली 21 वर्षीय महिला ने16 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति मांगी थी। याचिका को स्वीकारते हुए जस्टिस सुवीर सहगल ने फैसला सुनाया है।

याचिकाकर्ता ने बताया था कि उनका विवाह 2 मई 2025 को हुआ। विवाह के तुरंत बाद ही वैवाहिक संबंध अत्यंत तनावपूर्ण हो गए। पति के साथ संबंधों में गंभीर खटास के चलते दोनों के बीच तलाक की कार्यवाही चल रही है, जिसके कारण वह लंबे समय से मानसिक अवसाद और चिंता से गुजर रही हैं।
पीजीआई को दिए थे मेडिकल बोर्ड गठित कर जांच करने के आदेश

महिला ने कहा कि अनचाही गर्भावस्था ने उनकी मानसिक स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया। मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने 22 दिसंबर को पीजीआई चंडीगढ़ को निर्देश दिया कि एक मेडिकल बोर्ड गठित कर याचिकाकर्ता की जांच करे और रिपोर्ट दे कि गर्भपात चिकित्सकीय रूप से संभव और सुरक्षित है या नहीं।
बोर्ड ने यह दी थी रिपोर्ट

इसके अनुपालन में गठित मेडिकल बोर्ड ने 23 दिसंबर 2025 को याचिकाकर्ता की जांच की। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि अल्ट्रासाउंड जांच के अनुसार याचिकाकर्ता की गर्भावस्था 16 सप्ताह और 1 दिन की है, गर्भ में एकल जीवित भ्रूण है और किसी प्रकार की जन्मजात विकृति नहीं पाई गई है।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि महिला पिछले छह महीनों से अवसाद और चिंता के लक्षणों से पीड़ित है, तलाक की प्रक्रिया और गर्भावस्था को लेकर वह गंभीर मानसिक तनाव में है, हालांकि वह मानसिक रूप से इतनी सक्षम है कि स्वतंत्र रूप से अपनी सहमति दे सके। बोर्ड ने यह भी स्पष्ट राय दी कि महिला चिकित्सकीय रूप से गर्भपात के लिए पूरी तरह फिट है।
कोर्ट ने एक्ट की व्याख्या और पूर्व में दिए निर्णयों के आधार पर सुनाया फैसला

इन तथ्यों के आधार पर कोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या गर्भपात के लिए पति की सहमति आवश्यक है। इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कोर्ट ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 की व्याख्या की और पूर्व में दिए गए कई निर्णयों का हवाला दिया। कोर्ट ने दो टूक कहा कि कानून में कहीं भी पति की सहमति का कोई प्रविधान नहीं है न तो स्पष्ट रूप से और न ही अप्रत्यक्ष रूप से।

कोर्ट ने यह भी दोहराया कि एक विवाहित महिला ही यह तय करने की सर्वश्रेष्ठ निर्णायक है कि वह गर्भावस्था जारी रखना चाहती है या उसे समाप्त करना चाहती है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि महिला की सहमति और इच्छा ही निर्णायक है, इसके अतिरिक्त किसी अन्य अनुमति की आवश्यकता नहीं।

अंतत हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता एक सप्ताह के भीतर पीजीआई चंडीगढ़ या किसी अन्य अधिकृत अस्पताल से सुरक्षित तरीके से गर्भपात करवा सकती है। साथ ही अस्पताल को निर्देश दिए गए कि प्रक्रिया के दौरान सभी आवश्यक सावधानियां और चिकित्सकीय मानकों का पूरी तरह पालन किया जाए।
like (0)
deltin33administrator

Post a reply

loginto write comments
deltin33

He hasn't introduced himself yet.

1510K

Threads

0

Posts

4710K

Credits

administrator

Credits
471611