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गले में भरा जहर...त्रासदी ने छीनी आवाज...फिर पाई-पाई को मोहताज, सिनेमा की पहली महिला कव्वाल की दर्दभरी दास्तां

deltin33 2025-12-17 22:07:29 views 966
  

देश की पहली महिला की दर्दभरी दास्तां



एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। संगीत...इससे जुड़ने वालों को पता है कि इसके मायने क्या हैं। या हम यूं कहें कि संगीत के मायने असल में सबको मालुम हैं। संगीत के अलग-अलग प्रकार हैं और ये किसी भी भाषा में हो, दर्शकों को पसंद आज ही जाता है। कव्वाली भी संगीत का वो हिस्सा है, जिसे पसंद करने वालों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। आज हम आपको भारत की पहली और उस कव्वाल हीरोइन की दास्तां सुनाएंगे जिसके चाहने वाले दशकों तक रहे लेकिन एक त्रासदी ने सबकुछ छीन लिया। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें
50 के दशक में आई वो पहली महिला कव्वाल

80 और 90 के दशक तक कव्वाली का आलम चरम पर था। कव्वाली को पसंद करने वाले मानते हैं कि इसकी आवाज जब कानों तक पहुंचती है सुकून का सिलसिला शुरू हो जाता है। हालांकि 50 और 60 के दशक में कव्वाली को लेकर खासा क्रेज नहीं था, लेकिन वक्त ने बाजी पलटी और देश की पहली महिला कव्वाल के रूप में ऊभरकर सामने आईं शकीला बानो भोपाली (Shakeela bano Bhopali)।

  

वो महिला कव्वाल, जिसकी चर्चा धीरे-धीरे होने लगी। शकीला बानो का जन्म 1942 में भोपाल में हुआ था। उस वक्त भोपाल नवाबों की रियासतों में आता था। शकीला बचपन से ही कव्वाली का शौक रखती थीं। धीरे-धीरे वो कव्वाली गाने लगीं।

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मां नहीं चाहती थीं बेटी बने कव्वाल

शकीला के घर में बचपन से ही शेर और शायरी का माहौल था। पापा और चाचा शायर थे तो ऐसे में शकीला को यहीं से शौक चढ़ गया। धीरे-धीरे वो कव्वाली करने लगीं। हालांकि मां को ये कतई पसंद नहीं था कि वो कव्वाली करें। शकीला 5 वक्त की नमाज पढ़ती थीं तो वहीं कव्वाली भी करती थीं (Shakeela bano Bhopali Qawalli)।

  

11 साल की उम्र में ही वो कव्वाली करने लगीं। पिता अब्‍दुल रशीद खान और मां जमीला की पाबंदिया थोड़ी बढीं तो शकीला बीमार रहने लगीं। हालांकि बाद में डॉक्टर्स ने सलाह दी कि ऐसा ना किया जाए, नहीं तो शकीला ज्यादा बीमार पड़ जाएंगी। इसके बाद पाबंदिया हटीं और पंख फैलाकर शकीला अपने सपनों की उड़ान भरने लगीं।
स्टार बनने के बाद मिलने लगी मुंहमागी कीमत

शकीला कव्वाली करने जरूर लगीं लेकिन उस वक्त में लड़कियों का कव्वाली करना अच्छा नहीं माना जाता था। हालांकि उन्होंने इसकी परवाह नहीं की और धीरे-धीरे कव्वाली करते करते मशहूर होने लगीं। भोपाल की गलियों से शुरू हुई कव्वाली देश के कोने-कोने तक पहुंचने लगी। 70 के दशक तक वह इतनी मशहूर हो चुकी थीं कि उन्हें हर शहर में कव्वाली गाने के लिए बुलाया जाता था और वह भी उनकी मनचाही कीमत पर। एक वक्त तो ऐसा आया कि उनकी डिमांड इतनी बढ़ गई कि उनके पास कव्वाली और शोज करने का वक्त नहीं होता था।

  
दिलीप कुमार ने दिया बंबई आने का न्यौता

शकीला ने शुरूआती दौर में बाबू कव्वाल के साथ जोड़ी बनाई। रात को 10 बजे शुरू होने वाला कार्यक्रम सुबह तक चलता था। जब शकीला 50 के दौर में आईं तो वो स्टार बन ही गई थीं। उनकी कव्वाली को पसंद करने वालों की कमी नही थी। इसी बीच उन्हें दिलीप कुमार ने मुंबई आने का न्यौता दिया। फैशन और फिल्म डिजाइनर मुमताज खान के मुताबिक, दिलीप कुमार (Dilip Kumar) उस वक्त काम के सिलसिले में भोपाल के नजदीक गए थे।

  

फिल्म की शूटिंग खत्म होने के बाद दिलीप साहब अपने कमरे में चले गए तभी उन्हें किसी ने बताया कि शाम को एक लड़की परफॉर्म करने वाली है। इसके बाद दिलीप साहब को लगा कि वो आराम ही कर लेंगे। हालांकि बाद में जब उन्होंने शकाली को परफॉर्म करते देखा तो वो खुद को रोक नहीं पाए। इसके बाद जब दिलीप साहब ने शकीला को सुना तो उन्होंने कहा कि \“\“शकीला तुम बॉम्बे आ जाओ\“\“। जब शकीला मुंबई आईं, तो हर कोई उनकी आवाज को सुनकर दंग रह गया।

  

बीआर चोपड़ा, दिलीप कुमार, वैजयंतीमाला और जॉनी वॉकर समेत सभी पर उनकी आवाज का जादू चल गया। इसके बाद सन 1957 में प्रोड्यूसर सर जगमोहन मट्टू ने उन्हें फिल्म जागीर में एक्टिंग का मौका दिया और इसके बाद एचएमवी कंपनी ने 1971 में उनका पहला रिकॉर्ड बनाया। इसके बाद वो टार्जन, सैमसन और बादशाह, राका, सखी लुटेरा, दस्तक, जान-ए-वफा समेत कई फिल्मों में दिखीं। इसके अलावा वो कई गानों में भी दिखीं और उनके गाने खूब पसंद भी किए गए।
एक हादसे ने बदली जिंदगी

शकीला बानो शौहरत हासिल कर चुकी थीं। उनके पास नाम, पैसा सबकुछ आया। इसी बीच साल 1984 में भोपाल में गैस त्रासदी हुई, जिसके बाद मानो हर तरफ हाहाकार मच गया। इस त्रासदी ने कई लोगों की जान ली तो भोपाल के ना जाने कितने लोग इसकी जद में आ गए। जहरीली गैस ने हजारों लोगों की जिंदगी में जहर घोला और इसका शिकार शकीला बानो भी हुईं। इस त्रासदी ने उनकी आवाज छीन ली और कई बीमारियां उन्हें दे दीं।

  



जैकी श्रॉफ और इंडस्ट्री के कुछ लोगों ने उनकी मदद भी की। हालांकि बाद में धीरे-धीरे सबकुछ तबाह होता चला गया। आर्थिक स्थित भी दिन ब दिन बद से बत्तर होती चली गई। आखिरकार 16 दिसंबर 2002 को उन्होंने सभी को अलविदा कह दिया। हालांकि वो अपने पीछे छोड़ गईं वो मुकाम जिसने ये सिखाया कि पुरुष प्रधान समाज में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। अपनी जिंदगी को अपनी शर्तों पर जिया और हमेशा के लिए लोगों के दिलों में अपनी छाप छोड़कर गईं।  

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