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कोविड के बाद ढाई गुणा बढ़े मानव-वन्यजीव संघर्ष, विशेषज्ञों की टीम द्वारा किए गए अध्ययन में हुई इसकी पुष्टि

cy520520 2025-12-17 12:37:17 views 1025
  

कोविड के पहले रेस्क्यू की संख्या 80 के करीब तो बाद में 200 से अधिक हुई। सांकेतिक तस्वीर



जितेन्द्र पाण्डेय, गोरखपुर। कोविड काल के बाद मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में ढाई गुणा की बढ़ोतरी हुई है। आंकड़ों में इसकी पुष्टि इस आधार पर हुई कि वर्ष 2015-2020 के बीच करीब 80 वन्यजीव का रेस्क्यू करना पड़ा जबकि 2021-2025 के बीच 200 से अधिक वन्यजीवों काे बचाना पड़ा। सबसे अधिक रेस्क्यू तेंदुए, बाघ और भेड़िए के हुए। बढ़ता रेस्क्यू दबाव प्रदेश के चिड़ियाघरों में भी संख्या बढ़ने का कारण बना। फिर विशेषज्ञों व उच्चाधिकारियों ने वन्यजीवों के बढ़ते हमले के कारणों पर अध्ययन कराने का निर्णय लिया।

वन्यजीव रेस्क्यू विशेषज्ञ डा. आरके सिंह, गोरखपुर चिड़ियाघर के पशु चिकित्सक डा. योगेश प्रताप सिंह, पीलीभीत टाइगर रिजर्व के डीएफओ मनीष सिंह और गैरसरकारी संगठन टर्टल सरवाइल एलायंस के इंडिया हेड डा. शैलेंद्र की टीम ने कारणों पर अध्ययन किया। गोरखपुर, लखनऊ, कानपुर, इटावा, सोहगीबरवा, सिद्धार्थनगर, बलरामपुर, बहराइच, सीतापुर, लखीमपुर, पीलीभीत, दुधवा, नजीमाबाद, हस्तिनापुर, सहारनपुर, चित्रकूट और वाराणसी क्षेत्र के जंगल से सटे इलाकों में पांच बिंदुओं पर हुए अध्ययन में मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष के कारण सामने आए। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

पता चला कि कोविड काल में मनुष्य घरों में बंद रहे, जिससे वन्यजीव जंगलों से बाहर खेतों और गांवों की ओर बढ़े। यहां उन्हें आसानी से भोजन मिलता रहा और कुछ ने स्थायी ठिकाने बनाकर प्रजनन भी किया। इस दौरान जो वन्यजीव हुए, वह जंगल नहीं और उसी स्थान को अपना ठिकाना समझा और रहने लगे। कोविड के बाद जब लोग खेतों में लौटे, तो इन जानवरों से सीधा टकराव बढ़ा।

ग्रामीण खेती के लिए और उनके पशु चरने के लिए जंगल किनारे तक पहुंचने लगे तो शिकार की तलाश में वन्यजीव भी गांवों की ओर बढ़े। वन्यजीवों को जंगल के बाहर आसानी से भोजन मिलने लगे। जबकि जंगल में भोजन के लिए एक दूसरे से लड़ना पड़ता है। इससे भी दोनों के बीच संघर्ष की घटनाएं बढ़ीं। कुछ जगहों पर जंगल किनारे किसानों ने खेत में सिर्फ गन्ने की खेती की है। वन्यजीव बाहर निकले और गन्ने के खेत में पहुंचे।

पूरे वर्ष गन्ने की खेती होने से उन्हें वहां से भागना भी नहीं पड़ा और ठिकाना बन गया। जब कभी मनुष्य खेत में घुसने की कोशिश किए, वन्यजीवों को खतरा महसूस हुआ तो दोनों के बीच संघर्ष हुआ। जंगल के बाहर रहते हुए इन वन्यजीवों को भोजन के रूप में आसानी से जंगली सुअर, सियार, कुत्ता जैसे जानवर भोजन के रूप में आसानी से मिलने लगे।

बरसात और सर्दियों में बाहर आते है वन्यजीव
टीम ने अध्ययन के दौरान यह भी पाया कि मानव जीवन पर वन्यजीवों के सर्वाधिक हमले बरसात और सर्दियों के मौसम में हुए। विशेषज्ञ बताते है कि बरसात के समय वन्यजीव जंगल छोड़ आसपास के गांवों में पहुंचते है, फिर मानव-वन्यजीव के बीच संघर्ष होता है।

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बहराइच में भेड़ियों और मानव के बीच का संघर्ष उदाहरण के रूप में है। बरसात होने और जंगल में पानी भर गया और भेड़िए बाहर आए, भोजन की तलाश में गांव तक पहुंचे, मानव से इनका संघर्ष हुआ।यही हाल सर्दी के मौसम में भी होता है।

सरकार की सख्ती से लगातार बढ़ रहा कूनबा
वन्यजीव रेस्क्यू विशेषज्ञ डा. आरके सिंह ने बताया कि सरकार के सख्त नियमों और संरक्षण से बाघ और तेंदुओं का कूनबा लगाता बढ़ रहा है। पांच वर्षों के आकड़े को देखा जाए तो दोनों की संख्या में तीन गुणा से अधिक का इजाफा हुआ है। जो सभी के लिए सुखद है।
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