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जमशेदपुर भाजपा में 17 मंडल अध्यक्षों की घोषणा, 11 पर सस्पेंस; जल्द होगा फैसला

Chikheang 2025-12-16 10:37:22 views 524
  

सांकेतिक तस्वीर



जागरण संवाददाता, जमशेदपुर। राजनीति के कुरुक्षेत्र में धैर्य सबसे बड़ा शस्त्र होता है, लेकिन जब परीक्षा की घड़ी लंबी हो जाए, तो सब्र का बांध टूट ही जाता है। महीनों से नेपथ्य (पर्दे के पीछे) में चल रही सियासी रस्साकशी, गुटबाजी की बिसात और नेतृत्व के ऊहापोह का अंततः सोमवार को आंशिक पटाक्षेप हो गया। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

साकची स्थित भाजपा जिला कार्यालय का वातावरण हर्ष और विषाद के मिश्रित भावों का साक्षी बना। जैसे ही जिला चुनाव अधिकारी मनोज सिंह और पर्यवेक्षक बिरंची नारायण ने 17 मंडल अध्यक्षों के नामों की घोषणा की, कहीं विजय का शंखनाद हुआ तो कहीं महत्वाकांक्षाओं के महल ढहने की खामोश टीस महसूस की गई।

जिन चेहरों ने बाजी मारी, वे ढोल-नगाड़ों की थाप पर फूल-मालाओं से लद गए, लेकिन जो महीनों से अध्यक्ष पद का सपना संजोए बायोडाटा लेकर नेताओं की परिक्रमा कर रहे थे, उनके हाथ केवल निराशा लगी।
बंद कमरों की सियासत और सड़कों का शोर

जमशेदपुर महानगर के 28 मंडलों में अध्यक्ष पद के लिए पिछले कई महीनों से जो घमासान मचा था, वह किसी विधानसभा चुनाव से कम नहीं था। हर गुट अपने प्यादे को वजीर बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा था।

\“\“आर्गेनाइजेशन पर्व\“\“ के नाम पर चल रही रायशुमारी में हजारों कार्यकर्ताओं ने अपनी दावेदारी पेश की थी। सोमवार को जब सूची जारी हुई, तो यह स्पष्ट हो गया कि संगठन ने पुराने कार्यकर्ताओं के अनुभव और युवाओं के जोश के बीच एक महीन संतुलन बनाने की कोशिश की है।

कार्यालय में जुटी भीड़ इस बात की गवाह थी कि कार्यकर्ता परिणाम जानने को कितने बेताब थे। घोषणा होते ही समर्थकों ने नवनिर्वाचित अध्यक्षों को कंधों पर उठा लिया और अबीर-गुलाल से सराबोर कर दिया।
11 मंडलों में क्यों फंसा पेंच?

सबसे बड़ा सवाल उन 11 मंडलों को लेकर खड़ा हो गया है, जिनकी घोषणा रोक दी गई है। सूत्रों की मानें तो इन मंडलों में एक अनार, सौ बीमार वाली स्थिति है। यहां गुटीय समीकरण इतने उलझे हुए हैं कि पर्यवेक्षकों को एक नाम तय करने में पसीने छूट रहे हैं।

यह 11 सीटों का सस्पेंस यह बताने के लिए काफी है कि पर्दे के पीछे की कलह और सहमति का द्वंद्व अभी थमा नहीं है। इन मंडलों के दावेदारों की धड़कनें अभी भी बढ़ी हुई हैं और लाबिंग का दौर अब भी जारी है।
अध्यक्ष की कुर्सी: पद नहीं, काटों का ताज

महानगर अध्यक्ष सुधांशु ओझा ने नवनिर्वाचित अध्यक्षों को बधाई देते हुए स्पष्ट संकेत दिए कि यह केवल पद नहीं, बल्कि दायित्व का किरीट (ताज) है। उन्होंने कहा कि इन सेनापतियों को संगठन के विस्तार और सशक्तीकरण के लिए दिन-रात एक करना होगा। ओझा ने विश्वास जताया कि नई टीम जनमुद्दों पर मुखर होकर संघर्ष करेगी और पार्टी की विचारधारा को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाएगी।
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