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न्यायिक बिरादरी की गरिमा का दुरुपयोग स्वीकार्य नहीं, चंडीगढ़ में वकील की हरकत पर हाईकोर्ट की टिप्पणी, पढ़ें पूरा मामला

LHC0088 2025-12-15 22:37:40 views 540
  

जज बनकर पुलिस को धमकाने वाले वकील के मामले में हाईकोर्ट का सख्त रुख।



मनोज बिष्ट, चंडीगढ़।  खुद को न्यायिक मजिस्ट्रेट बताकर नाके पर पुलिस पर रौब झाड़ने और मौके से फरार होने वाले वकील प्रकाश सिंह मारवाह की मुश्किलें बढ़ गई हैं। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने वकील की एफआईआर रद करने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि  न्यायिक बिरादरी की गरिमा का दुरुपयोग किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

साथ ही स्पष्ट किया कि पुलिस ड्यूटी में बाधा डालना, प्रतिरूपण (इम्परसनेशन) करना और कानून से बचने का प्रयास गंभीर अपराध हैं, जिनमें बिना ट्रायल अदालत की प्रक्रिया के हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।

मामला 18 मई 2024 का है। सेक्टर-49 थाना पुलिस के अनुसार उस दिन शाम करीब 6:40 बजे एएसआइ अजीत सिंह और कांस्टेबल योगेश सेक्टर-45, 46, 49 और 50 के चौराहे पर नाकाबंदी कर वाहनों की जांच कर रहे थे। इसी दौरान एक स्कार्पियो गाड़ी वहां पहुंची, जिसकी नंबर प्लेट कपड़े से ढकी हुई थी।

पुलिस ने गाड़ी को जांच के लिए रोका, जिस पर काॅन्स्टेबल ने नियमानुसार वीडियोग्राफी शुरू की। आरोप है कि गाड़ी चालक ने न केवल ड्राइविंग लाइसेंस दिखाने से इनकार कर दिया, बल्कि खुद को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रकाश बताते हुए पुलिस पर दबाव बनाने की कोशिश की। गाड़ी पर जज लिखा स्टिकर भी लगा हुआ था। जब पुलिस ने सख्ती दिखाई तो आरोपित गाड़ी लेकर मौके से फरार हो गया।
जांच में खुली पोल, जज बनकर धमकाने वाला निकला वकील

पुलिस जांच में सामने आया कि आरोपित कोई न्यायिक मजिस्ट्रेट नहीं, बल्कि प्रकाश सिंह मारवाह नाम का वकील है। इसके बाद पुलिस ने उसके खिलाफ संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किया। उसने एफआईआर रद कराने के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

याचिका में उसने दावा किया कि वह एक प्रतिष्ठित परिवार से ताल्लुक रखता है, सामाजिक कार्यकर्ता है और पुलिस उससे निजी रंजिश के चलते कार्रवाई कर रही है। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसने पहले ट्रैफिक पुलिस के एक डीएसपी के खिलाफ शिकायत की थी, उसी का बदला लेने के लिए उसे झूठे केस में फंसाया गया।
डिप्रेशन की दलील भी खारिज

याचिकाकर्ता ने अदालत में यह तर्क भी दिया कि वह डिप्रेशन से पीड़ित है और भारतीय दंड संहिता की धारा 84 के तहत उसे मानसिक अस्वस्थता का लाभ मिलना चाहिए। इस पर हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मानसिक अस्वस्थता का बचाव ट्रायल कोर्ट में साक्ष्यों के आधार पर ही तय किया जा सकता है। केवल इस आधार पर एफआइआर को रद नहीं किया जा सकता।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सूर्य प्रताप सिंह ने कहा कि एफआईआर में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया गंभीर प्रकृति के हैं और यह मामला केवल ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन तक सीमित नहीं है।

अदालत ने टिप्पणी की कि खुद को न्यायिक मजिस्ट्रेट बताकर आरोपित ने न केवल पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की, बल्कि न्यायिक बिरादरी की गरिमा का भी दुरुपयोग किया है, जो किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि एफआईआर रद करने की याचिका पर सुनवाई के दौरान मिनी ट्रायल नहीं किया जा सकता। यह जांच और ट्रायल का विषय है कि पुलिस का संस्करण सही है या आरोपित का। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रतिरूपण से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 419 एक स्वतंत्र अपराध है, इसलिए इस मामले में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 195(1) की बाधा लागू नहीं होती।
याचिका खारिज

अंत में हाई कोर्ट ने कहा कि यह मामला ‘दुर्लभ से दुर्लभ’ श्रेणी में नहीं आता, जिसमें असाधारण हस्तक्षेप की आवश्यकता हो। पुलिस जांच में दखल देने का कोई आधार नहीं बनता। इसी के साथ आरोपित वकील की एफआईआर रद करने  की याचिका खारिज कर दी गई।
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