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रुपया 90 के पार क्या गया, अफगानिस्तान-श्रीलंका जैसे देशों के खड़े हुए कान! भारतीय चीनी की दुनियाभर में लगी लॉटरी!

Chikheang 2025-12-4 18:39:40 views 1207
  

भारत सरकार ने 2025-26 सीजन के लिए 1.5 मिलियन टन चीनी निर्यात की अनुमति दी है।



नई दिल्ली। भारत सरकार ने 14 नवंबर को 2025-26 सीजन (अक्टूबर–सितंबर) के लिए 1.5 मिलियन टन चीनी निर्यात की अनुमति क्या दी, उद्योग में तेजी लौट आई है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अब तक करीब 1 लाख टन चीनी के स्पॉट डिलीवरी वाले करार हो चुके हैं, जिनकी आपूर्ति मध्य जनवरी तक हो जाएगी। कुछ खेपें तो रवाना भी हो चुकी हैं। पहले आशंका जताई जा रही थी कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय चीनी कीमतों के मुकाबले प्रतिस्पर्धी नहीं रह पाएगी, लेकिन रुपये के डॉलर के मुकाबले 90 के पार जाने से निर्यात अचानक आकर्षक हो गया है। एक उद्योग विशेषज्ञ के अनुसार शुरुआती 1 लाख टन के करार तब हुए थे जब डॉलर करीब ₹88 के आसपास था, इसलिए आगे और ज्यादा करार होने की उम्मीद है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें
कहां-कहां से आ रही है मांग?

अफगानिस्तान, श्रीलंका, सोमालिया, यमन, केन्या समेत मध्य-पूर्व और अफ्रीका के कई देशों से भारतीय चीनी की लगातार पूछताछ हो रही है। कुछ व्यापारियों के अनुसार, अधिकांश सौदे 440-450 डॉलर प्रति टन (FOB) की दर से वेस्ट कोस्ट पोर्ट से हुए हैं।

चेन्नई स्थित राजाथी ग्रुप के डायरेक्टर एम. मदन प्रकाश ने बताया कि केन्या को चीनी 510 डॉलर (C&F) और बंदर अब्बास (ईरान) के लिए 470 डॉलर प्रति टन में करार हुए हैं। उनके अनुसार आस-पास के कई देशों से अच्छी पूछताछ जारी है।
सरकार की \“यूनिफॉर्म कोटा\“ नीति

पिछले महीने खाद्य मंत्रालय ने सभी संचालित चीनी मिलों को उनकी पिछले तीन सीज़न की औसत उत्पादन मात्रा के आधार पर 5.286% का समान निर्यात कोटा दिया है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि मिलें अपने कोटे को खुद निर्यात कर सकती हैं या फिर व्यापारी निर्यातकों/रिफाइनरियों को बेच सकती हैं। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश की कई मिलों ने अपना कोटा व्यापारियों को बेच दिया है। व्यापारियों के अनुसार यह मात्रा 30,000-40,000 टन के आसपास है।
1 मिलियन टन और निर्यात की मांग

नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रियां (NFCSF) ने सरकार से अतिरिक्त 1 मिलियन टन चीनी निर्यात की अनुमति देने की मांग की है। संघ का कहना है कि इससे घरेलू बाजार में दाम स्थिर रहेंगे और मिलों की वित्तीय स्थिति पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा।

NFCSF के अनुसार 2025-26 में देश की खपत लगभग 29 मिलियन टन रहेगी, जबकि 5 मिलियन टन के शुरुआती स्टॉक और मौजूदा उत्पादन के साथ 7.5 मिलियन टन चीनी मिलों के गोदामों में बची रह जाएगी। इतनी बड़ी स्टॉक राशि मिलों की पूंजी फंसा देगी और ब्याज का बोझ बढ़ाएगी।
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