तिरुवनंतपुरम। केरल विधानसभा चुनाव के लिए जारी मतगणना के शुरुआती रुझानों में सियासी तस्वीर तेजी से बदलती नजर आ रही है। अब तक सामने आए आंकड़ों के अनुसार, कांग्रेस की लीडरशिप वाली यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) स्पष्ट बढ़त बनाए हुए है, जबकि CPI(M) की लीडरशिप वाली सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) को बड़ा झटका लगता दिख रहा है।
केरल विधानसभा चुनाव में इस बार उम्मीदवारों के चयन में बड़े बदलाव ने चुनावी मुकाबले को नई दिशा दी है। कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ ने रणनीतिक तौर पर 99 सीटों पर नए चेहरे उतारकर स्पष्ट संदेश दिया कि वह एंटी-इंकम्बेंसी को सीधे संबोधित करना चाहते थे। गठबंधन ने केवल 27 मौजूदा विधायकों को दोबारा टिकट दिया, जबकि 14 विधायकों के टिकट काटे गए। इसके अलावा, पिछले चुनाव में हार चुके 85 उम्मीदवारों को दोबारा मौका नहीं दिया गया था।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस फ्रेश कैंडिडेट रणनीति का मकसद स्थानीय स्तर पर नाराजगी कम करना और मतदाताओं के बीच नई ऊर्जा पैदा करना था। शुरुआती रुझानों में यूडीएफ की बढ़त इस बात का संकेत देती है कि यह प्रयोग असरदार साबित हो सकता है। दूसरी ओर, भाजपा नेतृत्व वाले राजग ने अपेक्षाकृत सीमित बदलाव की रणनीति अपनाई। गठबंधन ने पिछली बार के केवल 15 उम्मीदवारों को ही दोहराया था, जबकि वह 129 सीटों पर चुनाव मैदान में उतरा था और भाजपा ने 98 सीटों पर अपनी किस्मत आजमाई थी।
तटीय इलाकों में मछुआरों का असंतोष बना गेमचेंजर
इसके साथ ही तटीय इलाकों में मछुआरा समुदाय का रुझान इस बदलाव की एक बड़ी वजह माना जा रहा है। राज्य की करीब 140 सीटों में से लगभग 40 सीटें तटीय प्रभाव वाली मानी जाती हैं, जहां करीब 10 लाख मछुआरे वोटर चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों में वोटिंग पैटर्न का बदलना सीधे सत्ता समीकरण पर असर डाल सकता है।
अमर उजाला की ग्राउंड रिपोर्ट्स के मुताबिक, मछुआरा समुदाय में पिछले कुछ समय से तटीय संरक्षण, समुद्र कटाव, आजीविका संकट और पुनर्वास योजनाओं को लेकर असंतोष देखा गया था। खासतौर पर पुनर्गेहन और समुद्र से दूरी बनाए रखने जैसे प्रस्तावों को लेकर कई परिवारों ने नाराजगी जताई थी। इसके अलावा, तटीय विकास परियोजनाओं और पर्यावरणीय मुद्दों पर भी समुदाय की चिंताएं सामने आई, जिससे सत्तारूढ़ एलडीएफ के खिलाफ नाराजगी का माहौल बना था।
राजनीतिक जानकारों का मानना था कि अगर तटीय बेल्ट में 5-10% वोटों का भी झुकाव बदला, तो इसका सीधा फायदा यूडीएफ को मिल सकता है और मौजूदा रुझानों में दिख रही बढ़त इसी बदलाव का संकेत हो सकती है।
प्रवासी मतदाताओं की गैर-मौजूदगी ने बदला केरल चुनाव का गणित
इसके साथ ही खाड़ी देशों में काम कर रहे प्रवासी मतदाताओं की बड़ी संख्या में गैर-मौजूदगी और राज्य में गैस आपूर्ति संकट ने चुनावी समीकरण को प्रभावित किया।
आंकड़ों के मुताबिक, केरल में करीब 2.42 लाख पंजीकृत प्रवासी मतदाता हैं, जो आमतौर पर चुनाव के दौरान वोट डालने के लिए राज्य लौटते हैं। लेकिन इस बार पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, उड़ानों की सीमित उपलब्धता और टिकटों की कीमतों में भारी उछाल के चलते बड़ी संख्या में प्रवासी वोटर केरल नहीं पहुंच सके। रिपोर्ट्स के अनुसार, कई रूट्स पर हवाई किराया तीन से चार गुना तक बढ़ गया, जिससे मजदूर और मध्यम वर्ग के प्रवासियों के लिए लौटना मुश्किल हो गया।
विश्लेषण बताता है कि प्रवासी मतदाताओं का प्रभाव खासकर उत्तर और मध्य केरल के जिलों कोझिकोड, मलप्पुरम और कन्नूर की सीटों पर ज्यादा रहता है। इन इलाकों में हजारों वोटों का अंतर चुनावी नतीजों को पलट सकता है। उदाहरण के तौर पर, कुछ सीटों पर जीत-हार का अंतर 5,000 से 10,000 वोट के बीच रहता है, जबकि प्रवासी मतदाताओं की संख्या कई जगह इससे कहीं ज्यादा होती है। ऐसे में उनकी गैर-मौजूदगी ने सीधे तौर पर करीबी मुकाबलों का परिणाम बदलने की क्षमता रखी। राजनीतिक रूप से देखा जाए तो प्रवासी वोटर्स का झुकाव परंपरागत रूप से यूडीएफ की ओर माना जाता है। ऐसे में उनकी अनुपस्थिति ने कई सीटों पर समीकरण को प्रभावित किया, जिससे मुकाबला और भी अनिश्चित हो गया।
गैस संकट ने मतदाताओं के मूड को किया प्रभावित
इसके साथ ही, राज्य में गैस की किल्लत भी एक अहम चुनावी मुद्दा बनकर सामने आई। पश्चिम एशिया संकट के कारण गैस आपूर्ति प्रभावित हुई, जिससे केरल में घरेलू एलपीजी और व्यावसायिक गैस दोनों की उपलब्धता पर असर पड़ा। होटल, रेस्तरां और पर्यटन उद्योग, जो राज्य की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा हैं। उन्हें इससे भारी नुकसान झेलना पड़ा।
व्यापारिक संगठनों के अनुसार, कई क्षेत्रों में गैस सिलेंडर की सप्लाई बाधित रही और कीमतों में बढ़ोतरी ने छोटे कारोबारियों की लागत बढ़ा दी। इसका असर सीधे तौर पर आम जनता तक पहुंचा, जिससे महंगाई और रोजमर्रा की परेशानियों को लेकर असंतोष बढ़ा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इन दोनों फैक्टर्स प्रवासी मतदाताओं की अनुपस्थिति और गैस संकट ने मिलकर मतदाताओं के मूड को प्रभावित किया।

National Desk
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