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पांच राज्यों में चुनाव के नाम पर हो रहा डराव ...

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अनिल जैन
चुनाव आयोग की ओर से आदर्श आचार संहिता लागू है, जिसके मुताबिक चुनाव प्रचार के दौरान न तो धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है और न ही धर्म, संप्रदाय और जाति के आधार पर वोट देने की अपील की जा सकती है। इसके अलावा किसी भी धार्मिक अथवा जातीय समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने वाले भाषण देने या नारे लगाने का भी आचार संहिता निषेध करती है। इसके बावजूद भाजपा की ओर से धर्म के नाम पर वोट मांगे जा रहे हैं।   




  
इस समय पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और केंद्र शासित पुड्डुचेरी में विधानसभा चुनाव के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रचार अभियान जारी हैं। भाजपा की ओर से हमेशा की तरह प्रचार की कमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने संभाल रखी है। उनके अलावा तमाम केंद्रीय मंत्री, सभी भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी के तमाम नेता धुआंधार प्रचार कर रहे हैं। सभी के प्रचार की वही चिर-परिचित थीम है, जो पिछले बारह साल से हर चुनाव में रहती आई है- धर्म, हिंदू, मुसलमान, पाकिस्तान, गाय आदि। दूसरी पार्टियां भी कहीं-कहीं इसी लाइन पर अपनी प्रतिक्रियाएं दे रही हैं। आम जनता के रोजमर्रा के जीवन से जुड़े सवालों की कोई चर्चा नहीं।   




  
कहने को तो चुनाव आयोग की ओर से आदर्श आचार संहिता लागू है, जिसके मुताबिक चुनाव प्रचार के दौरान न तो धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है और न ही धर्म, संप्रदाय और जाति के आधार पर वोट देने की अपील की जा सकती है। इसके अलावा किसी भी धार्मिक अथवा जातीय समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने वाले भाषण देने या नारे लगाने का भी आचार संहिता निषेध करती है। इसके बावजूद भाजपा की ओर से धर्म के नाम पर वोट मांगे जा रहे हैं और एक समुदाय विशेष के खिलाफ़ नफ़रत फैलाने वाली बातें कही जा रही हैं।  




  
खुद मोदीजी भी अपनी चुनावी रैलियों में खुले आम धार्मिक आधार पर लोगों से वोट देने की अपील कर रहे हैं और लोगों से धार्मिक नारे लगवा रहे हैं। उनकी रैली के मंच पर हमेशा की तरह धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा तो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के मकसद से इस चुनाव को 'सभ्यताओं का संघर्षÓ तक बता रहे हैं। यही नहीं, वे विरोधी पार्टी के नेताओं के खिलाफ़ अपने बयानों में भद्दी गालियों तक का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह सब बेरोक-टोक चल रहा है, जो कि कानूनन कतई नहीं चलना चाहिए।  




  
ऐसे माहौल में करीब तीन दशक पहले का वाकया याद आता है, जब चुनावी सभा में भड़काऊ और नफ़रत फैलाने वाला भाषण देने के लिए शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे पर चुनाव आयोग ने छह साल के लिए चुनाव लड़ने और वोट देने पर पाबंदी लगा दी थी। मामला यह था कि 1987 में महाराष्ट्र विधानसभा की विले पार्ले मुंबई सीट पर उपचुनाव हो रहा था। मुख्य मुकाबला कांग्रेस के उम्मीदवार प्रभाकर काशीनाथ कुंटे और निर्दलीय उम्मीदवार डॉ. रमेश यशवंत प्रभु के बीच था। डॉ. रमेश प्रभु को बाल ठाकरे की शिव सेना का समर्थन प्राप्त था।  

  
गौरतलब है कि उस समय शिव सेना को एक राजनीतिक दल के रूप में मान्यता नहीं मिली थी, लेकिन शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे खुद डॉ. प्रभु के लिए चुनावी सभाओं के जरिए वोट मांग रहे थे। 13 दिसंबर, 1987 को मतदान हुआ था और 14 दिसंबर को उस उप चुनाव का नतीजा आया था। कांग्रेस उम्मीदवार प्रभाकर कुंटे को हार का सामना करना पड़ा। इस उपचुनाव से पहले विले पार्ले सीट कांग्रेस के पास ही थी।  
  
कांग्रेस के प्रभाकर कुंटे ने डॉ. प्रभु के निर्वाचन को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने आरोप लगाया कि डॉ. प्रभु भड़काऊ और नफ़रत फैलाने वाले भाषणों के सहारे चुनाव जीते हैं। उन्होंने अपने आरोप के समर्थन में सबूत पेश करते हुए डॉ. प्रभु का चुनाव रद्द करने की अपील की। कई महीनों तक चली सुनवाई के बाद 7 अप्रैल, 1989 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने डॉ. रमेश प्रभु और बाल ठाकरे को 'जनप्रतिनिधित्व कानून 1951Ó में परिभाषित 'चुनाव में भ्रष्ट आचरणÓ का दोषी पाया और इस आधार पर विले पार्ले सीट के उपचुनाव का नतीजा रद्द कर दिया। बॉम्बे हाई कोर्ट के इस फैसले को डॉ. प्रभु ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन 11 दिसंबर 1995 को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अपील खारिज करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले को बरकरार रखा।  

  
पहले हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से डॉ. प्रभु को तो सजा मिल गई लेकिन उनका चुनाव जिन बाल ठाकरे के भ्रष्ट आचरण से प्रभावित हुआ था, वे तो किसी भी सार्वजनिक पद पर या किसी सदन के निर्वाचित सदस्य नहीं थे, इसलिए उनकी सजा क्या हो? देश के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टीएस कृष्णमूर्ति के मुताबिक ऐसे मामलों मे छह साल के लिए मताधिकार से वंचित किया जाना अधिकतम सजा है। ऐसे मामले अदालत की ओर से राष्ट्रपति की ओर संदर्भित किए जाते हैं, क्योंकि मतदाता सूची में कोई भी बदलाव राष्ट्रपति के आदेश से ही हो सकता है। राष्ट्रपति अपने पास आए संबंधित मामले पर चुनाव आयोग से राय मांगते हैं और चुनाव आयोग की राय मिलने के बाद वे फैसला करते हैं।  

  
इस कानूनी प्रावधान के तहत सुप्रीम कोर्ट की ओर से बाल ठाकरे का मामला भी राष्ट्रपति को भेजा गया। उस समय राष्ट्रपति थे के आर नारायणन। मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर उस समय डॉ. मनोहर सिंह गिल थे और उनके साथ जे एम लिंगदोह व टीएस कृष्णमूर्ति चुनाव आयुक्त थे। राष्ट्रपति नारायणन ने तय प्रक्रिया के तहत बाल ठाकरे का मामला चुनाव आयोग के पास भेजा। चुनाव आयोग ने 22 सितंबर 1998 को अपनी सिफारिश राष्ट्रपति कार्यालय को भेजी। इस सिफारिश में चुनाव आयोग ने लिखा था कि- न्यायपालिका द्वारा दोषी पाए जाने के कारण बाल ठाकरे को छह साल के लिए मताधिकार से वंचित कर दिया जाए। चुनाव आयोग की इस सिफारिश पर तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन ने 28 जुलाई 1999 को छह साल के लिए बाल ठाकरे के मताधिकार पर रोक लगा दी थी।  

  
यह पूरा वाकया बताता है कि उस समय देश की संवैधानिक संस्थाएं अपने आप में कितनी मजबूत और अपने दायित्वों के प्रति कितनी मुस्तैद थी। लेकिन यह सब अब एक इतिहास है।  
  
इस समूचे मामले से जुड़ा एक दिलचस्प वाकया यह भी है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महाराष्ट्र की एक चुनावी रैली में भाषण देते हुए बाल ठाकरे के रद्द किए गए मताधिकार को उनकी नागरिकता और उनके मानवाधिकार से जोड़ते हुए कांग्रेस पर तोहमत जड़ दी थी कि उसने बाल ठाकरे को छह साल के लिए मताधिकार से वंचित कर दिया था। मोदी ने 9 अप्रैल 2019 को लातूर की चुनावी रैली में कहा था, 'मैं कांग्रेस वालों से कहता हूं कि जरा दर्पण में अपना मुंह देखो, आपके मुंह से मानवाधिकार की बातें शोभा नहीं देती हैं। आप कांग्रेस वालों को हिंदुस्तान के एक-एक बच्चे को जवाब देना पड़ेगा। आप कांग्रेस वालों ने बालासाहेब ठाकरे की नागरिकता छीन ली थी, उनका मतदान करने का अधिकार छीन लिया था।'  

  
मोदीजी को तथ्यों से कोई मतलब नहीं रहता और वे जो मुंह में आता है या जैसा उन्हें बता दिया जाता है, वैसा ही बोल देते हैं, इसलिए इस मामले में भी वे सरासर गलतबयानी कर गए। हकीकत यह है कि बाल ठाकरे को मिली सजा से कांग्रेस का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था। जब चुनाव आयोग की सिफारिश पर राष्ट्रपति ने बाल ठाकरे को छह साल के लिए मताधिकार से वंचित करने का फैसला सुनाया था तब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी और कांग्रेस विपक्ष में थी।  

  
खुद बाल ठाकरे ने अपना मताधिकार रद्द किए जाने के फैसले की आलोचना जरूर की थी लेकिन इसके लिए उन्होंने कांग्रेस को कभी जिम्मेदार नहीं ठहराया। अपने को मिली सजा के चलते बाल ठाकरे 1999 के लोकसभा चुनाव और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में वोट नहीं डाल पाए थे। उन्होंने 2004 में प्रतिबंध हटने के बाद पहली बार वोट डाला था।  
  
बहरहाल आज चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट जिस तरह काम कर रहे हैं, उसे देखते हुए बाल ठाकरे से जुड़ा पूरा वाकया एक सपना जैसा लगता है। अब तो चुनाव आयोग पूरी तरह  'केंद्र सरकार का रसोई घर' बना हुआ है और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार रसोइये की भूमिका में हैं। चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के नाम पर पश्चिम बंगाल में 90 लाख से ज्यादा लोगों को वोट डालने के अधिकार से वंचित कर दिया है, जिनमें से ज्यादातर एक समुदाय विशेष के हैं। उसकी इस कारगुजारी को सुप्रीम कोर्ट ने भी मान्यता दे दी है। इसीलिए मोदी चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भरोसा जताते हुए पश्चिम बंगाल और असम में भाजपा की जीत और केरल में चौंकाने वाले नतीजे का दावा कर रहे हैं। कुल मिला कर भारत में चुनाव प्रक्रिया अब महज एक फूहड़ नाटक बनकर रह गई है।  
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)






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