महाराष्ट्र से शरद पवार का राज्यसभा जाना लगभग तय माना जा रहा है और वे बिना किसी मुकाबले के चुने जा सकते हैं। लेकिन उनके नामांकन के बाद शिवसेना (यूबीटी) के अंदर, खासकर आदित्य ठाकरे के गुट में तनाव बढ़ गया है। यह स्थिति महा विकास अघाड़ी (MVA) के सहयोगी दलों के बीच लंबी और मुश्किल बातचीत के बाद सामने आई है। इस पूरे घटनाक्रम ने गठबंधन के अंदर सीट बंटवारे को लेकर चल रहे मतभेद भी उजागर कर दिए हैं।
उम्मीदवार तय करने की प्रक्रिया के दौरान 86 साल के शरद पवार का नाम सामने आया। दिल्ली और मुंबई में NCP के वरिष्ठ नेताओं और कांग्रेस के नेताओं के बीच कई दौर की बातचीत के बाद पवार के नाम पर सहमति बनी। हालांकि कांग्रेस और NCP दोनों ने पवार की उम्मीदवारी का समर्थन कर दिया है, लेकिन अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक आदित्य ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) में कुछ नए नेताओं की ओर से इस फैसले का विरोध किया जा रहा है, जिससे पार्टी के अंदर असंतोष बढ़ता दिखाई दे रहा है।
उद्धव ठाकरे गुट में उट रहे सवाल
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आदित्य ठाकरे के गुट में राज्यसभा सीट छोड़ने को लेकर खासा असंतोष है। उनका कहना है कि पहले हुई बातचीत के मुताबिक यह सीट शिवसेना (यूबीटी) को मिलनी चाहिए थी, इसलिए अब इसे छोड़ना सही नहीं माना जा रहा। सूत्रों के अनुसार, शुरुआत में उद्धव ठाकरे ने भी इस मुद्दे पर आदित्य ठाकरे का समर्थन किया था और शरद पवार की उम्मीदवारी को लेकर सवाल उठाए थे। शिवसेना के कुछ नेताओं का मानना है कि आदित्य ठाकरे ने साफ तौर पर कहा था कि शरद पवार की पार्टी पर पूरी तरह भरोसा करना मुश्किल है, क्योंकि पिछले एक साल से उनके और अजित पवार के बीच पार्टी के संभावित विलय को लेकर बातचीत चलती रही है।
पार्टी के अंदर यह भी सवाल उठाया गया कि अगर यह राज्यसभा सीट शरद पवार को दे दी जाती है, तो क्या यह भरोसा है कि वे अगले चुनाव तक गठबंधन के साथ ही बने रहेंगे। इसके अलावा, महा विकास अघाड़ी (MVA) में सीटों को लेकर एक रोटेशन व्यवस्था की बात भी सामने आई है। इसके मुताबिक अगर यह सीट अभी पवार को मिलती है, तो 2028 में कांग्रेस इस सीट पर दावा कर सकती है। इसी वजह से शिवसेना के नेताओं को चिंता है कि पार्टी लगातार दो राज्यसभा सीटें खो सकती है—पहले पवार को और बाद में कांग्रेस को। इससे भविष्य में पार्टी की राजनीतिक स्थिति कमजोर पड़ सकती है।
नामांकन से नदारद रहे आदित्य ठाकरे
शरद पवार के नामांकन वाले दिन आदित्य ठाकरे की गैरमौजूदगी को पार्टी के अंदर चल रहे गुस्से और असहमति के संकेत के रूप में देखा गया। माना जा रहा है कि राज्यसभा सीट के बंटवारे को लेकर शिवसेना (यूबीटी) के अंदर नाराजगी है और उसी वजह से आदित्य ठाकरे इस कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। इस बीच संजय राउत के शरद पवार को खुले समर्थन ने स्थिति को और जटिल बना दिया। शिवसेना के वरिष्ठ नेता राउत शुरू से ही पवार के नामांकन का समर्थन करते रहे हैं, जबकि ठाकरे गुट के अंदर कई नेता इसका विरोध कर रहे थे।
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राउत का पवार के समर्थन में इतना जोर देना एक राजनीतिक रणनीति भी हो सकता है। उनका कहना है कि राउत का राज्यसभा कार्यकाल 2028 में खत्म होने वाला है, इसलिए संभव है कि वे अभी पवार का समर्थन करके भविष्य में अपने लिए राज्यसभा की सीट सुरक्षित करने की कोशिश कर रहे हों। |
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