नई दिल्ली। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को हटाने के लिए विपक्ष द्वारा लाए गए प्रस्ताव के नोटिस के बाद संसद की कार्यप्रणाली और परंपराओं पर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। इस घटनाक्रम के बीच देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की 1954 की वह ऐतिहासिक टिप्पणी चर्चा में है, जब उन्होंने तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष जीवी मावलंकर के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव पर कांग्रेस सांसदों से कहा था कि वे किसी भी पार्टी व्हिप से बंधे नहीं हैं और इस विषय पर “पार्टी संबंधों की परवाह किए बिना” विचार करें।
वर्तमान प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक माहौल गरम है। विपक्षी दलों ने पिछले मंगलवार को स्पीकर बिरला को हटाने का नोटिस दिया, जिसे नौ मार्च से शुरू होने वाले बजट सत्र के दूसरे चरण में सूचीबद्ध किया जाना है। इस बीच, संसद के इतिहास में ऐसे प्रस्तावों की पृष्ठभूमि पर भी चर्चा शुरू हो गई है।
नेहरू ने व्हिप से मुक्त किया था सांसदों को
18 दिसंबर 1954 को लोकसभा के इतिहास में पहली बार किसी स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव आया था। विपक्ष ने तत्कालीन अध्यक्ष जीवी मावलंकर पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए प्रस्ताव पेश किया था। उस समय कांग्रेस के पास 360 से अधिक सांसदों का भारी बहुमत था। इसके बावजूद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपने दल के सांसदों को संदेश दिया कि वे इस मुद्दे पर किसी व्हिप या पार्टी निर्देश से बंधे नहीं हैं। नेहरू ने सदन में कहा था कि यह विषय पार्टी राजनीति का नहीं, बल्कि सदन की गरिमा और लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा का है। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे इस मामले पर निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से विचार करें।
बहस के दौरान 50 से अधिक सदस्यों ने प्रस्ताव के समर्थन में अपनी बात रखी। विपक्ष ने नेहरू और सरकार पर तीखे हमले किए और स्पीकर पर पक्षपातपूर्ण आचरण के आरोप लगाए। नेहरू ने मावलंकर का बचाव करते हुए कहा कि स्पीकर की ईमानदारी पर सवाल उठाना गंभीर मामला है। उन्होंने कहा, “जब हम स्पीकर की ईमानदारी को चुनौती देते हैं, तो हम अपने देशवासियों और दुनिया के सामने छोटे बन जाते हैं।” अंततः कांग्रेस के बहुमत के चलते यह प्रस्ताव ध्वनि मत से खारिज कर दिया गया, लेकिन नेहरू की उस समय की उदार और संस्थागत दृष्टि को आज भी संसदीय परंपरा का उदाहरण माना जाता है।
1966: प्रारंभिक समर्थन न मिलने से प्रस्ताव ठंडा
स्पीकर को हटाने का दूसरा उल्लेखनीय प्रयास 1966 में हुआ, जब तत्कालीन अध्यक्ष सरदार हुकम सिंह के खिलाफ प्रस्ताव लाने की कोशिश की गई। हालांकि, संसदीय नियमों के अनुसार ऐसे प्रस्ताव को चर्चा के लिए सूचीबद्ध करने से पहले कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन आवश्यक होता है। उस समय यह न्यूनतम समर्थन नहीं जुट पाया और प्रस्ताव प्रारंभिक चरण में ही आगे नहीं बढ़ सका। यह घटना दर्शाती है कि स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया केवल राजनीतिक इच्छा से नहीं, बल्कि कड़े प्रक्रियात्मक मानकों से भी बंधी होती है।
1987: राजीव गांधी ने नेहरू का किया था उल्लेख
15 अप्रैल 1987 को तत्कालीन स्पीकर बलराम जाखड़ के खिलाफ विपक्ष ने प्रस्ताव लाने की कोशिश की। उस समय प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। बहस के दौरान राजीव गांधी ने 1954 की बहस का उल्लेख करते हुए जवाहरलाल नेहरू की टिप्पणियों को दो बार उद्धृत किया। उन्होंने स्पीकर की ईमानदारी पर सवाल उठाने को अनुचित बताया और कहा कि यह सदन की गरिमा के खिलाफ है। राजीव गांधी ने विपक्ष की आलोचना करते हुए कहा कि संस्थाओं की प्रतिष्ठा बनाए रखना सभी दलों की जिम्मेदारी है। अंततः यह प्रस्ताव भी खारिज कर दिया गया।
2024: राज्यसभा में धनखड़ के खिलाफ नोटिस
हाल के वर्षों में भी ऐसे प्रयास हुए हैं। दिसंबर 2024 में विपक्ष ने राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को हटाने के लिए नोटिस दिया था। विपक्ष ने उन पर पक्षपातपूर्ण आचरण का आरोप लगाया था। हालांकि, यह नोटिस प्रक्रियागत आधार पर प्रारंभिक चरण में ही खारिज कर दिया गया और इस पर औपचारिक बहस नहीं हो सकी। यह घटनाक्रम बताता है कि उच्च सदन में भी अध्यक्ष पद को लेकर राजनीतिक विवाद उभरते रहे हैं, लेकिन प्रक्रियात्मक कसौटियां सख्त बनी हुई हैं।
मौजूदा प्रस्ताव: ओम बिरला पर क्या आरोप?
वर्तमान में विपक्ष द्वारा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को हटाने के लिए जो नोटिस दिया गया है, वह संसद के आगामी सत्र में सूचीबद्ध किया जाएगा। हालांकि, इस प्रस्ताव के पीछे के विस्तृत आरोपों और राजनीतिक रणनीति पर अभी चर्चा जारी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्पीकर का पद संवैधानिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह सदन की कार्यवाही के संचालन और नियमों की व्याख्या के लिए जिम्मेदार होता है। ऐसे में उनके खिलाफ प्रस्ताव लाना स्वाभाविक रूप से एक गंभीर राजनीतिक कदम माना जाता है।
स्पीकर पद की संवैधानिक गरिमा
भारतीय संविधान और संसदीय परंपरा के अनुसार, स्पीकर से अपेक्षा की जाती है कि वे निष्पक्ष रहें और सदन की गरिमा बनाए रखें। हालांकि उनका चुनाव आमतौर पर सत्तारूढ़ दल के समर्थन से होता है, लेकिन पद ग्रहण करने के बाद उनसे दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर कार्य करने की अपेक्षा की जाती है। इसी संदर्भ में 1954 की बहस और नेहरू का दृष्टिकोण अक्सर उदाहरण के रूप में सामने आता है, जहां उन्होंने पार्टी लाइन से ऊपर उठकर संस्थागत मर्यादा को प्राथमिकता देने की बात कही थी।
इतिहास से सबक या नई सियासत?
ओम बिरला के खिलाफ प्रस्ताव पर आगे क्या रुख अपनाया जाएगा, यह आने वाले सत्र में स्पष्ट होगा। लेकिन अतीत की घटनाएं यह दिखाती हैं कि स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव दुर्लभ रहे हैं और अधिकतर मामलों में या तो समर्थन के अभाव में ठंडे पड़ गए या बहुमत के आधार पर खारिज हो गए। नेहरू की 1954 की टिप्पणी आज भी संसदीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में देखी जाती है—जहां उन्होंने सांसदों से कहा था कि वे इस मुद्दे को पार्टी राजनीति से ऊपर उठकर देखें। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में क्या वही संस्थागत मर्यादा और निष्पक्षता का आग्रह दोहराया जाएगा या यह बहस नए राजनीतिक टकराव का रूप लेगी।

Editorial Team
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