यूपी की पूर्व सीएम मायावती व एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी। फाइल
राज्य ब्यूरो, पटना। Rajya Sabha Election: बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों का बिगुल बज चुका है। 26 फरवरी से नामांकन की प्रक्रिया शुरू होकर पांच मार्च तक चलेगी।
बिहार से नौ अप्रैल को अमरेंद्र धारी सिंह, प्रेमचंद गुप्ता, रामनाथ ठाकुर, उपेंद्र कुशवाहा एवं राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह का कार्यकाल समाप्त हो रहा है।
राज्यसभा चुनाव में इस बार मुकाबला एक तरह से पांचवीं सीट पर सिमट गया है। 16 मार्च को होने वाले चुनाव में जहां एनडीए चार सीटें आसानी से जीतता दिख रहा है, वहीं पांचवीं सीट के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों की रणनीति तेज हो गई है।
एनडीए को तीन वोट की जरूरत
विधानसभा के मौजूदा संख्या बल के अनुसार राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 41 विधायकों के वोट जरूरी हैं। एनडीए के पास कुल 202 विधायक हैं।
इस हिसाब से चार सीटों के लिए उसे 164 वोट चाहिए, शेष 38 वोट बचते हैं, जो पांचवीं सीट के लिए जरूरी 41 से तीन कम हैं। यही कारण है कि एनडीए की राह यहां अटकती नजर आ रही है।
तेजस्वी को चाहिए छह विधायकों का समर्थन
उधर, महागठबंधन भी पांचवीं सीट पर नजरें जमाए बैठा है, लेकिन उसके सामने संख्या की और बड़ी चुनौती है। राजद के 25, कांग्रेस के 6, वाम दलों के 3 और आईआईपी के 1 विधायक को मिलाकर महागठबंधन की कुल संख्या 35 होती है। यानी तेजस्वी को छह अतिरिक्त विधायकों के समर्थन की जरूरत है।
यहीं से चुनावी गणित में असदुद्दीन ओवैसी और मायावती की भूमिका निर्णायक बन जाती है। एआईएमआईएम के पास पांच और बसपा के पास एक विधायक है। दोनों का समर्थन जिस खेमे को मिला, पांचवीं सीट उसी की झोली में जा सकती है।
सूत्रों के अनुसार, ओवैसी की पार्टी ने समर्थन को लेकर शर्तें रख दी हैं, जबकि राजद ने हिना शहाब के नाम को आगे कर माइनॉरिटी कार्ड खेलने की रणनीति अपनाई है। इससे एआईएमआईएम के समर्थन की उम्मीद भी खुलकर जताई जा रही है।
कुल मिलाकर, बिहार के इस राज्यसभा चुनाव में बसपा और एआईएमआईएम किंगमेकर की भूमिका में आ गए हैं, और पांचवीं सीट का फैसला इन्हीं के रुख पर टिका नजर आ रहा है।  |