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अब आयुष उपचार भी कैशलेस कवरेज के दायरे में, 32 बीमा कंपनियों के पॉलिसीधारकों को फायदा; AIIA और GIC में करार

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आयुष उपचार को अब कैशलेस बीमा में शामिल किया गया। फोटो: सांकेतिक  



अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। आयुष चिकित्सा उपचार के कैशलेस बीमा कवरेज के दायरे में आने पर ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद (एआईआईए) नई दिल्ली और जनरल इंश्यरेंस काउंसिल ने ‘काॅमन एम्पैनलमेंट एमओयू’ साइन किया गया।

10 फरवरी को हुए इस समझौते के तहत 32 जनरल इंश्योरेंस कंपनियों से जुड़े बीमा पालिसीधारकों को कैशलेस आयुष उपचार की सुविधा उपलब्ध होगी। आयुष में नैचुरोपैथी, योग, सिद्ध, आयुर्वेद,यूनानी और होम्योपैथी चिकित्सा पद्धतियां शामिल हैं।

इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथाॅरिटी ऑफ इंडिया (आईआरडीएआई) ने सभी स्वास्थ्य बीमा पाॅलिसियों में आयुष उपचार को एलोपैथी के समान कवर करना अनिवार्य कर दिया है। यह पूरे देश में लागू है और सभी बीमा कंपनियों पर बाध्यकारी है।  

इस नियामकीय निर्देश और संस्थागत समझौते ने आयुष उपचार को वित्तीय सुरक्षा का आधार दिया है। जिसे समन्वित और समग्र स्वास्थ्य सेवा माॅडल की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। आइआरडीएआइ के निर्देशानुसार इसके तहत निर्धारित शर्तों को पूरा करने पर मान्यता प्राप्त अस्पताल में भर्ती आयुष उपचार पर ‘सम इंश्योर्ड’ दावा तक किया जा सकता है।

पहले कई पाॅलिसियों में आयुष उपचार पर सीमित कवर या उन पर सब-लिमिट लागू थी, लेकिन अब नियामकीय सुधारों के बाद बीमाधारकों को व्यापक वित्तीय सुरक्षा मिल रही है। शर्त यह है कि उपचार मान्यता प्राप्त अस्पताल में योग्य चिकित्सकों द्वारा और पाॅलिसी की शर्तों के अनुरूप कराया जाए।

एआईआईए के निदेशक प्रो. (वैद्य) प्रदीप कुमार प्रजापति से मिली जानकारी अनुसार कामन एम्पैनलमेंट व्यवस्था का उद्देश्य बीमित व्यक्तियों के लिए उपचार प्रक्रिया को सरल बनाना और बीमा कंपनियों से अलग-अलग स्वीकृति लेने की मजबूरी को कम करना है। साथ ही पात्र मामलों में संस्थान को सीधे कैशलेस सुविधा दिलाना।

कहाकि इससे समय की बचत के साथ बीमा मामलों में पारदर्शिता भी बढ़ेगी। विशेषज्ञों का कहना है कि यह पहल पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को मुख्यधारा के स्वास्थ्य तंत्र से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

इससे न केवल आयुष संस्थानों की विश्वसनीयता सुदृढ़ होगी, बल्कि बीमाधारकों को उपचार के अधिक विकल्प भी उपलब्ध होंगे। इससे न केवल आयुष संस्थानों की विश्वसनीयता सुदृढ़ होगी, बल्कि बीमाधारकों को उपचार के अधिक विकल्प भी उपलब्ध होंगे।

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