शनि ग्रह की तस्वीर। सौ. इंटरनेट
रमेश चंद्रा, नैनीताल। शनि ग्रह के छल्लों की उत्पत्ति उसी के दो उपग्रहों की टक्कर से हुई। टक्कर से बिखरे मलबे ने छल्लों का रूप लेकर शनि ग्रह को आकर्षक बना दिया। शनि के छल्ले अभी युवा हैं, जिनकी उम्र करीब 10 करोड़ साल है।
अमेरिका के साउथ वेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (एसडब्ल्यूआरआइ) व कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी (कैल्टेक) और फ्रांस की आब्जर्वेटरी डी पेरिस के विज्ञानियों के हालिया संयुक्त शोध से शनि के छल्लों की उत्पत्ति का यह राज सामने आया है।
आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज) के वरिष्ठ खगोल विज्ञानी डा.शशिभूषण पांडेय ने बताया कि हमारे सौरमंडल का दूसरा सबसे बड़ा ग्रह शनि, चांदी की चादर समेटे बेहद सुंदर नजर आता है।
बेहद चमकदार छल्ले (रिंग्स) इसकी सुंदरता को और बढ़ा देते हैं। अब इसके छल्लों के जन्म को लेकर नया शोध सामने आया है।
जिससे पता चलता है कि उपग्रह टाइटन और प्रोटो हाइप्रियन की टक्कर के कारण शनि ग्रह के छल्लों की उत्पत्ति हुई।
यह टक्कर इतनी भीषण हुई होगी कि एक उपग्रह प्रोटो हाइप्रियन टूटकर पूरी तरह बिखर गया। जिसका मलबा शनि के छल्ले बनाता चला गया। साथ ही मलबे का कुछ हिस्सा उपग्रह टाइटन से भी जा मिला।
अमेरिका व फ्रांस के विज्ञानियों का मानना है कि अतीत में टाइटन उपग्रह भी पिंडों की बड़ी मार झेल चुका है। बड़े-बड़े गड्ढे इसमें रहे होंगे, जो टक्कर के बाद भर गए और टाइटन का आकार भी बड़ा हो गया।
वर्तमान में टाइटन शनि ग्रह का सबसे बड़ा उपग्रह है। इस टकराव से शनि ग्रह का झुकाव भी प्रभावित हुआ था और यह 26.7 डिग्री तक पहुंच गया। जबकि पृथ्वी अपने अक्ष में लगभग 23.5 डिग्री झुकी हुई है।
2.7 लाख किमी व्यास में फैली है शनि ग्रह की रिंग्स
डा. शशिभूषण पांडेय के अनुसार शनि ग्रह की रिंग्स का व्यास लगभग 2.7 लाख किलोमीटर तक फैला हुआ है। इनकी मोटाई 10 से 100 मीटर तक है।
कुछ की एक किमी तक मानी जाती है। यह छल्ले बर्फ से बने हुए हैं। जिनमें धूल, कण और आर्गेनिक पदार्थ मौजूद होते हैं। इसकी रिंग्स धीरे-धीरे रिंग रेन यानी पानी बनकर शनि पर गिर रही हैं, जो भविष्य में गायब हो सकती हैं।  |
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