राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने राष्ट्रपति भवन में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की मूर्ति का अनावरण किया। (फोटो सौजन्य- @rashtrapatibhvn)
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सोमवार को राष्ट्रपति भवन के केंद्रीय प्रांगण में ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस की जगह देश के पहले गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (राजाजी) की प्रतिमा का अनावरण किया।
इस समारोह में उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन और कई केंद्रीय मंत्री उपस्थित थे। साथ ही आज राजाजी उत्सव मनाया गया और मंगलवार यानी 24 फरवरी से 1 मार्च तक राजगोपालाचारी पर एक प्रदर्शनी का भी आयोजन किया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने \“मन की बात\“ के 131वें एपिसोड के दौरान इस बदलाव का जिक्र किया था।
क्यों किया गया ये बदलाव?
इस बदलाव के पीछे केंद्र सरकार देश के राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करने और औपनिवेशिक युग की विरासत को खत्म करने का संदेश दे रही है। साथ ही भारतीय नेतृत्व से जुड़े प्रमुख चेहरों की प्राथमिकता पर जोर दे रही है।
राष्ट्रपति मुर्मु ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, “यह कदम औपनिवेशिक सोच की निशानियों को खत्म करने और भारत की सांस्कृतिक विरासत और देश की खास सेवा करने वाले नेताओं के योगदान को अपनाने की चल रही कोशिशों का हिस्सा है।“
विदेशी शासन के दौरान जनता से दूरी बनाए रखना ब्रिटिश शासकों की एक सोची-समझी पद्धति थी। हमारे अपने स्वाधीन देश में, हमारे अपने लोकतन्त्र में, जन-जन से जुड़ना हमारा सिद्धान्त है। मैं मानती हूं कि राष्ट्रपति भवन राष्ट्र का भवन है, सभी देशवासियों का भवन है। इस भवन के द्वार सभी… pic.twitter.com/eAqRA1IuvO — President of India (@rashtrapatibhvn) February 23, 2026
कौन थे राजाजी?
- चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को \“राजाजी\“ के नाम से जाना जाता है।
- उनका का जन्म 10 दिसंबर 1878 को मद्रास प्रेसीडेंसी में हुआ था।
- उन्होंने 1948 में लॉर्ड माउंटबेटन का स्थान लिया और 1950 में कार्यालय समाप्त होने तक भारत के अंतिम गवर्नर-जनरल के रूप में सेवाएं दीं।
- वह महात्मा गांधी के करीबी सहयोगी थे, उन्होंने असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में भाग लिया था।
- इसके साथ ही गांधीजी के जेल जाने के दौरान यंग इंडिया का संपादन किया और बाद में वर्ष 1959 में स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की।
- वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहे, जब बंगाल प्रांत को दो भागों में बांटा गया था।
- राजनीति से इतर उन्होंने रामायण और महाभारत का अंग्रेजी और तमिल में अनुवाद किया। उन्हें वर्ष 1954 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।
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