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वही तेंदुआ लौटा है या फिर दूसरा आया... प्रयागराज के गंगापार इलाके में कयासबाजी के बीच दहशत में ग्रामीण

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प्रयागराज के झूंसी स्थित एचआरआइ में तेंदुआ दिखने से ग्रामीण दहशत में हैं।



जागरण संवाददाता, प्रयागराज। झूंसी के हरिश्चंद्र अनुसंधान संस्थान (एचआरआइ) में दो दिन पहले दिखे तेंदुआ की कोई खोज-खबर नहीं मिली है। वन विभाग ने फुटेज में दिखे जानवर को बिल्ली बताकर किनारा कर लिया है, लेकिन गंगा के तराई इलाके में दशहत बरकरार है। लोग कयास लगा रहे हैं कि  यह वहीं तेंदुआ है, जिसे कुछ दिन पहले पकड़ा गया था, या फिर कोई दूसरा। फिलहाल लोगों की रातों की नींद और दिन का सुकून छिन गया है।
रात में सुरक्षित घर लौटने तक चिंता

गंगापार के झूंसी के छतनाग, नीबी, धतकार, हवेलिया, कोहना, उस्तापुर महमूदाबाद समेत आसपास के अन्य इलाकों में गुरुवार रात लोग सुकुन से सो नहीं सके। किसी को बाहर बंधे मवेशियों की सुरक्षा की चिंता थी तो कोई देर रात तक कामकाज से आने वाले अपनों के सुरक्षित लौटने की प्रार्थना कर रहा था। खौफ के पीछे का कारण था तेंदुआ।
पहले भी तेंदुआ ने महीनों फैलाई थी दहशत

हरिश्चंद्र, भोला यादव, भरत कुमार, अयोध्या, दशरथ लाल के माथे पर भी चिंता की लकीरें झलक रहीं थीं। ग्रामीणों ने कहा कि बुधवार की रात छतनाग स्थित एचआरआइ में तेंदुआ देखा। सीसीटीवी की फुटेज में दिखे मवेशी की कद-काठी साफ इशारा करती है कि वह जानवर तेंदुआ है, लेकिन वन विभाग यह मानने को तैयार नहीं। करीब सात महीने पहले भी तेंदुआ ने दहशत फैला रखी थी। बहादुरपुर व उसके आसपास के तराई वाले इलाकों में वह विचरण करता रहा।
वन विभाग मांगता रहा सुबूत

उस समय ग्रामीण चीख-चीखकर कहते रहे कि तेंदुआ आया है लेकिन वन विभाग उनसे सुबूत मांगता रहा। कार्रवाई के नाम पर महज खानापूर्ति होती रही। एक बार फिर वही वाकया दोहराया जा रहा है। जो तेंदुआ एचआरआइ में दिखा वह वही है जिसे पिछले महीने पकड़ा गया या फिर कोई दूसरा तेंदुआ आ गया है। तेंदुआ चाहे जहां से आया हो, बहरहाल तराई के गांवों में लोग भय के बीच जी रहे हैं।
इतना मुश्किल भी नहीं है दूसरे तेंदुआ का आना

मध्य प्रदेश की सीमा के जंगलों और चित्रकूट में तेंदुए पाए जाते हैं। एमपी की सीमा प्रयागराज से जुड़ी हुई है। शंकरगढ़ इसी सीमा का इलाका है तो वहीं चित्रकूट का रास्ता भी वहीं से होकर जाता है। शंकरगढ़ और करछना में जंगली इलाके हैं, जो करीब-करीब आपस में जुड़े हुए हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि तेंदुए प्रतिदिन 30 से 35 किमी का सफर करते हैं। ऐसे में किसी दूसरे तेंदुए के जंगल से निकल कर यहां आने की संभावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता।
क्या कहते हैं वन रेंजर?

वन विभाग के रेंजर एलके दुबे का कहना है कि जो तेंदुआ पकड़ा गया था उसके दोबारा लौटने की उम्मीद ही नहीं। क्योंकि उसे जहां छोड़ा गया है, वह 40 किमी से भी अधिक बड़ा जंगल है। मध्य प्रदेश से भी दूसरे तेंदुआ का यहां तक आना इतना आसान नहीं है।

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