बीएनपी की वापसी के बाद क्या बहाल हो पाएगी आंतरिक स्थिरता? फोटो- एआई से एडिट किया गया है।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। ढाका में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की सत्ता में वापसी भारत की पूर्वी पड़ोस नीति में एक बड़ा बदलाव है। अगस्त 2024 से बांग्लादेश में लगातार राजनीतिक अस्थिरता, संस्थागत दबाव और सामाजिक ध्रुवीकरण देखा गया है। अब नई दिल्ली के सामने चुनौतियां और अवसर दोनों है, यह समय संतुलित और व्यावहारिक कूटनीति अपनाने का है। पिछले एक दशक से भारत के संबंध अवामी लीग सरकार के साथ काफी मजबूत रहे, सुरक्षा सहयोग बढ़ा, उग्रवादी ठिकानों को खत्म किया गया, कनेक्टिविटी परियोजनाएं तेज हुईं और आर्थिक साझेदारी मजबूत हुई। खासकर उग्रवादी गतिविधियों को नियंत्रित करने के बाद भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को खास फायदा मिला लेकिन लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसलिए भारत को अब तारिक रहमान के नेतृत्व में नई सरकार के साथ काम करने की तैयारी करनी होगी।
बांग्लादेश से रिश्ते भारत की प्रायोरिटी में क्यों? ढाका की राजनीतिक अस्थिरता अक्सर सीमाओं के भीतर नहीं रहती है, इसलिए भारत की पहली प्राथमिकता बांग्लादेश के भीतर स्थिरता होनी चाहिए क्योंकि इसका असर शरणार्थियों की आवाजाही, अवैध प्रवासन, सीमा तनाव और कट्टरपंथी गतिविधियों के रूप में पड़ सकता है। बंगाल और असम विशेष रूप से संवेदनशील हैं। इसलिए भारत का मुख्य हित यह सुनिश्चित करना है कि अगली सरकार आंतरिक व्यवस्था को बहाल करे, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करे और कट्टरपंथी नेटवर्क पर नियंत्रण रखे। बांग्लादेश में चल रहे आर्थिक संकट तथा सामाजिक असंतोष के बीच भारत के लिए यह स्थिति जिम्मेदारी और अवसर दोनों लेकर आती है। ऊर्जा, व्यापार और आपूर्ति शृंखलाओं के मामले में बांग्लादेश की भारत पर बड़ी निर्भरता है। भारत से बिजली आपूर्ति बांग्लादेश के बिजली तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ट्रांजिट समझौते भारत के मुख्य भूभाग को पूर्वोत्तर से जोड़ते हैं। यदि इन व्यवस्थाओं में बाधा आती है, तो बांग्लादेश को नुकसान होगा। भारत के नजरिये से आर्थिक सहयोग को राजनीतिक उतार-चढ़ाव से अलग रखना जरूरी है।
भारत को क्या करना चाहिए? नई दिल्ली को स्पष्ट संकेत देना चाहिए कि व्यापार, बिजली आपूर्ति और कनेक्टिविटी परियोजनाएं सरकार बदलने से प्रभावित नहीं होंगी। साथ ही, भारत को शांत तरीके से यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि बांग्लादेश की जमीन का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं होना चाहिए क्योंकि बांग्लादेश के साथ सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भारत को दृढ़ रहना होगा।
बीएनपी पर पहले कुछ कट्टरपंथी समूहों के प्रति नरमी के आरोप लगते रहे हैं तथा हालिया चुनाव में कट्टरपंथी और इस्लामी संगठनों ने बड़ी संख्या में जीत हासिल की है। खासकर भारत से जुड़े सीमावर्ती क्षेत्रों में उनकी जीत एक संवेदनशील मुद्दा है। भारत को इस संभावना को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि राजनीतिक बदलाव का फायदा चरमपंथी ताकतें उठा सकती हैं।
बंगाल और असम की सुरक्षा स्थिति पहले से ही संवेदनशील है। इसलिए दोनों देशों के बीच खुफिया सहयोग, सीमा निगरानी और आतंकवाद विरोधी तंत्र को मजबूत करना जरूरी होगा।
भारत और बांग्लादेश के बीच चीन बढ़ा रहा मुश्किलें चीन का पहलू इस पूरी स्थिति को और जटिल बनाता है। चीन ने बांग्लादेश में बुनियादी ढांचा, बंदरगाह और औद्योगिक निवेश के माध्यम से अपनी आर्थिक मौजूदगी बढ़ाई है। बीएनपी सरकार अपने विदेशी संबंधों में संतुलन बनाने की कोशिश कर सकती है। ऐसे में भारत का उद्देश्य चीन को यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि रणनीतिक संपत्तियां, खासकर बंदरगाह, भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए खतरा न बनें। यहां भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता महत्वपूर्ण होगी।
भारत की कई परियोजनाएं चीन की तुलना में धीमी रही हैं, यदि भारत अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है, तो उसे समय पर और प्रभावी ढंग से परियोजनाएं पूरी करनी होंगी। बीबीआइएन जैसे क्षेत्रीय संपर्क कार्यक्रमों और पूर्वोत्तर के व्यापार मार्गों को तेज करना होगा। जब बांग्लादेश की आर्थिक समृद्धि भारत की विकास यात्रा से जुड़ जाएगी, तो दोनों देशों की दूरी कम होगी।
भारत के लिए बांग्लादेश उसकी ‘एक्ट ईस्ट’ नीति का केंद्रीय स्तंभ है। भौगोलिक निकटता और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संबंध दोनों देशों को स्थायी रूप से जोड़ते हैं। ऐसे में द्विपक्षीय संबंधों की बुनियाद पारस्परिक सम्मान, समानता और साझा सुरक्षा हितों पर आधारित होनी चाहिए। भारत का स्पष्ट और निरंतर संदेश यही होना चाहिए कि वह एक स्थिर, समृद्ध, लोकतांत्रिक और संप्रभु बांग्लादेश का पूर्ण समर्थन करता है। यह भी पढ़ें - अब ढाका किसका? बीएनपी की जीत ने बढ़ाया दिल्ली और बीजिंग का सस्पेंस
(जेएनयू के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव से दैनिक जागरण की बातचीत) |