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अंतिम संस्कार के लिए नहीं मिलती अपनी मिट्टी, दफनाने के लिए जाना पड़ता है 22 KM दूर; सिरसा में सपेरा समाज की व्यथा

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कैप्शन: सिरसा में सपेरा समाज की व्यथा (फाइल फोटो)






संवाद सहयोगी, सिरसा। जीवनभर जिस शहर में सांसें लीं, मृत्यु के बाद उसी शहर में अंतिम विदाई के लिए दो गज जमीन भी न मिलना सिरसा के नाथ-सपेरा समाज की पीड़ा बन गया है। शोक में डूबे परिवारों को अपने स्वजन के शव को अंतिम संस्कार के लिए 22 किलोमीटर दूर ले जाना पड़ता है।

गुरु तेग बहादुर नगर निवासी 50 वर्षीय कलीपड़ी बाई की शुक्रवार को बीमारी से मौत हो गई। दुख की इस घड़ी में परिवार के सामने सबसे बड़ी चिंता अंतिम संस्कार की व्यवस्था रही। शहर में समाधि स्थल न होने के कारण स्वजन शव को रानियां खंड के सुल्तानपुरिया-धोतड़ के पास ले जाकर समाधि देकर लौटे। इससे एक दिन पहले इसी मुहल्ले के दो अन्य मृतकों बिमला बाई व एक अन्य को भी वहीं अंतिम विदाई दी गई थी।

नाथ-सपेरा समाज में मृतक को दफनाने की परंपरा है, लेकिन शहर में स्थान के अभाव ने इस परंपरा को निभाना भी कठिन बना दिया है। मृतका के देवर दिलबाग नाथ बताते हैं कि पहले वाहनों का इंतजाम करना पड़ता है, फिर रिश्तेदारों को साथ लेकर लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।

शोक की घड़ी में आर्थिक बोझ और असहायता दोनों साथ चलते हैं। दरअसल, सिरसा के पांच वार्डों और जिले के 52 गांवों में बसे इस समाज के लिए आज भी अपने शहर में अंतिम संस्कार का स्थायी स्थान नहीं है। समाज के प्रतिनिधियों द्वारा प्रशासन और मुख्यमंत्री के समक्ष भी यह मुद्दा उठाया जा चुका है, लेकिन समाधान अब तक अधूरा है।
राजस्थान में भी ऐसी ही व्यथा, तब मानवाधिकार आयोग ने कहा था-मृतकों की गरिमा रक्षा राज्य का दायित्व

कुछ समय पहले राजस्थान के बाड़मेर जिले में कालबेलिया समुदाय को मृतकों के दफ़न के लिए निर्धारित स्थान न मिलने का मामला राष्ट्रीय स्तर पर उठा था। 29 दिसंबर 2025 को समुदाय के लोगों ने शव सड़क पर रखकर विरोध प्रदर्शन किया था। 29 जनवरी 2026 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे मृतकों की गरिमा और मानवाधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय माना था।

आयोग ने राजस्थान सरकार के मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट तलब की थी। आयोग ने कहा था कि मृतकों की गरिमा की रक्षा राज्य का दायित्व है। सभी राज्यों को इस बारे में निर्देश दिए थे।
कई दशक से चल रहा परंपरा और पहचान का ये संघर्ष

नाथ-सपेरा समाज में मृतक को अग्नि नहीं, बल्कि भूमि में समाधि देने की परंपरा है। समाज के लिए यह केवल धार्मिक विधि नहीं, बल्कि पहचान और सम्मान का हिस्सा है। जगह के अभाव ने इस परंपरा के पालन को कठिन बना दिया है, जिससे समुदाय खुद को उपेक्षित महसूस करता है।
पांच हजार आबादी फिर भी स्थायी समाधान नहीं

सिरसा शहर में नाथ समाज की आबादी करीब 5 हजार है। रानियां नगर पालिका ने समाधि स्थल के लिए साढ़े तीन कनाल भूमि दी है, पर वहां चारदीवारी का कार्य शेष है। स्थायी व्यवस्था के अभाव में परिवारों की मजबूरी फिलहाल जारी है और अपने ही शहर में अंतिम विदाई का अधिकार अधूरा बना हुआ है।
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