अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के वैज्ञानिकों ने स्तन कैंसर को लेकर महत्वपूर्ण शोध किया है। फोटो: सांकेतिक
अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। स्तन कैंसर के कारणों को समझने में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण शोध किया है। शोध में सामने आया है कि स्तन में मौजूद टाम-20 प्रोटीन, जो सामान्य परिस्थितियों में स्तन कोशिकाओं की सुरक्षा और उर्जा प्रबंधन में दरबान की भूमिका निभाता है, कैंसर की स्थिति में अपना चरित्र बदल लेता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार टाम-20 का यही बदला हुआ चरित्र रोग की पहचान और उपचार दोनों में मददगार हो सकता है। मुख्य शोधकर्ता रिषभ सिंह के अनुसार टाम-20 प्रोटीन अच्छे और जरूरी प्रोटीनों को निश्चित मात्रा में स्तन कोशिका के उर्जा केंद्र माइटोकान्ड्रिया के भीतर प्रवेश देता है।
जब स्तन कैंसर कोशिकाएं बनती हैं तो उन्हें ज्यादा उर्जा की आवश्यकता होती है, जो स्तन कोशिकाओं को मिलने वाली प्रोटीन की निश्चित मात्रा से संभव नहीं है। ऐसे में यही टाम-20 अनजाने में जरूरत से ज्यादा सक्रिय होकर आवश्यकता से अतिरिक्त उर्जा भेजने लगता है। इसका नतीजा यह होता है कि कैंसर कोशिकाओं को अतिरिक्त उर्जा मिलने लगती है और वह दोगुनी तेजी से बढ़ने-फैलने लगती हैं।
शोधकर्ता वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि टाम-20 की अति-सक्रियता को नियंत्रित कर लिया जाए तो कैंसर कोशिकाओं की उर्जा आपूर्ति रोका जा सकता है। जिससे उनकी वृद्धि और सक्रियता रुक जाएगी। शोध की यह जानकारी स्तन कैंसर के निदान और उपचार के क्षेत्र में एक नई दिशा खोलती है।
शोध के वरिष्ठ कॉरेस्पॉन्डिंग शोधकर्ता बायोफिजिक्स विभाग के प्रोफेसर डाॅ. सरोज कुमार के अनुसार टाम-20 अब सिर्फ एक प्रोटीन नहीं, बल्कि स्तन कैंसर के लिए एक संभावित ‘थेरेनास्टिक टारगेट’ (एक ही समय में रोग की पहचान और रोग के उपचार) बनकर उभर रहा है। यानी इसके जरिए बीमारी की पहचान संभव है, जिससे भविष्य में उपचार की नई रणनीतियां विकसित की जा सकती हैं।
शोध को एम्स के बायोफिजिक्स और जेरियाट्रिक मेडिसिन विभाग के संयुक्त सहयोग से किया गया। जेरियाट्रिक मेडिसिन विभाग डाॅ. प्रसुन चटर्जी ने स्तन कैंसर से पीड़ित मरीजों के आंकड़ों और चिकित्सकीय विश्लेषण से स्तन कैंसर के समय टाम-20 की बढ़ी हुई सक्रियता की प्रमाणित किया।
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