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ऑनलाइन खरीदारी की मार से क्या भारत में खत्म हो रही हैं किराना दुकानें

deltin55 4 hour(s) ago views 6

ऑनलाइन बाजार इस कदर बढ़ने-फैलने लगा है कि किराना की पारंपरिक दुकानों पर बंद होने का खतरा मंडराने लगा है। त्वरित वाणिज्य या क्विक कॉमर्स आज भारत के स्टार्टअप परिदृश्य की बड़ी उम्मीद बन गया है। जोमैटो, जेप्टो और स्विगी का दबदबा है, जबकि बिग बास्केट, अमेजन और अन्य अनेक कंपनियां इसमें पैठ जमाने की कोशिश कर रही हैं। जब ये कंपनियों लोगों के घरों-दफ्तरों तक सीधे और जल्दी सामान पहुंचा दे रही हैं, तब खुदरा क्षेत्र के एक बड़े हिस्से व पड़ोस में स्थित किराना स्टोर का क्या होने वाला है?

साल 2015-16 और 2022-23 के बीच शहरी क्षेत्रों में किराना दुकानों की संख्या में 9.4 प्रतिशत या 11.50 लाख की गिरावट आई है। इसके विपरीत, 2010-11 और 2015-16 के बीच, शहरी क्षेत्रों में ऐसी दुकानों या आउटलेट लगभग 20 प्रतिशत बढ़े थे। हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि 2022-23 में ग्रामीण इलाकों में किराना दुकानों की संख्या एक साल पहले की तुलना में लगभग 56,000 कम हो गई।

जब बिग बास्केट जैसे बड़े स्टोर ने भारतीय बाजार में प्रवेश किया था, तभी अनुमान लगाया गया था कि सामान्य किराना स्टोर दौड़ से बाहर हो जाएंगे। एक समय, ऐसा अमेरिका जैसे अत्यधिक विकसित बाजारों में भी देखा गया था, वहां जब ऑनलाइन कारोबार या क्विक कॉमर्स बढ़ा, तब छोटी-मोटी दुकानें प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकीं। बड़े ऑनलाइन उद्यमों ने ही बड़े बाजार पर कब्जा कर लिया।

हाउइंडियालाइव्स की रिपोर्ट बताती है, भारत में समग्र खुदरा बिक्री में किराना का घटता महत्व आंकड़ों में भी दिखाई देने लगा है। 2015-16 तक, व्यापार क्षेत्र, जिसमें खुदरा और थोक व्यापार शामिल है, ने लगभग 13 ट्रिलियन डॉलर का सकल घरेलू उत्पाद (या अधिक सटीक रूप से, सकल मूल्य वर्धित) उत्पन्न किया है। इसमें से 34 प्रतिशत हिस्सा अनिगमित उद्यमों या किराना का था, यह हिस्सा 2010-11 से 4 प्रतिशत अंक बढ़ गया था, लेकिन 2023-24 तक यह हिस्सेदारी तेजी से गिरकर 22 प्रतिशत के आसपास पहुंच गई।

यह कहना कुछ जल्दबाजी होगी। त्वरित वाणिज्य के अनूठे अर्थशास्त्र का इशारा यही है कि सबसे तीव्र प्रतिस्पर्धा बड़े शहरों में महसूस होने की संभावना है। यह होड़ हम शहर दर शहर ही नहीं, गांव दर गांव भी देख रहे हैं। जहां किराना दुकानें मजबूत हैं, वहां उन्हें बड़ी कंपनियों से बहुत संघर्ष करना पड़ रहा है।

किराना दुकानों की संख्या में गिरावट किन वजहों से आई है? वास्तव में, गिरावट के अनेक कारण हैं। एक कारण विमुद्रीकरण भी है। जब नोटबंदी हुई थी, तब बड़ी संख्या में किराना दुकानें बंद हुई थीं। इसके अलावा लोग अब पहले की तुलना में जेब में कैश भी कम रखने लगे हैं। ई-कॉमर्स या क्विक कॉमर्स ने भी कैश रखने की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया है।

एक और बात ध्यान देने की है कि अब बड़ी निर्माता कंपनियां भी सीधे सामान बेचने को तैयार दिख रही हैं, तो आपूर्ति या वितरण का काम करने वाली अलग कंपनियों की जरूरत खत्म हो जाएगी। न केवल पारंपरिक खुदरा विक्रेताओं को, बल्कि थोक विक्रेताओं और वितरकों को भी हटाकर आईटीसी या हिंदुस्तान यूनिलीवर जैसे निर्माता सीधे बिक्री के पक्ष में हैं। बीच में कमाई करने वालों या एजेंटों की जरूरत ही खत्म हो जाएगी, इसका एक नुकसान यह भी होगा कि पारंपरिक खुदरा किराना दुकानों से भी कम कीमत में बड़ी कंपनियां अपना सामान सीधे ग्राहकों तक पहुंचा देंगी। अगर पारंपरिक दुकानों पर कमाई नहीं होगी, तो जाहिर है, लोग ऑनलाइन माध्यमों पर ही निर्भर हो जाएंगे।

आम तौर पर ई-कॉमर्स ने भारत में खुदरा बाजार को किस हद तक प्रभावित किया है, इसका संकेत इस तथ्य से मिलता है कि आईटीसी जैसी कंपनी का लगभग 31 प्रतिशत सामान डिजिटल माध्यम से ही बिकने लगा है। उदाहरण के लिए, ब्लिंकिट के अधिग्रहण पर आधारित जोमैटो के क्विक कॉमर्स बिजनेस में इसके औसत मासिक लेनदेन वाले ग्राहक 2022-23 में 29 लाख से बढ़कर 2023—24 में 51 लाख हो गए हैं।

2023-24 में इसके प्रत्येक डार्क स्टोर का औसत सकल ऑर्डर मूल्य लगभग 8 लाख रुपये प्रतिदिन था। 16 शहरों में 4,500 ग्राहकों के बीच किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, 31 प्रतिशत शहरी भारतीय अपनी प्राथमिक किराने की खरीदारी के लिए त्वरित वाणिज्य का उपयोग करने लगे हैं।

ऑनलाइन आपूर्ति का यह व्यवसाय सस्ते श्रम, विशेषकर ‘गिग’ श्रमिकों द्वारा संचालित है। दैनिक किराने के सामान से लेकर आईफोन तक हर चीज की 10-15 मिनट के भीतर होम डिलिवरी होने लगी है। लोगों को पड़ोस की किराना दुकान या बाजार जाने की भी जरूरत नहीं है। उदाहरण के लिए, जोमैटो के तहत प्रति माह औसतन 67,000 डिलिवरी कर्मचारियों ने साल 2023-24 में लगभग 20.30 करोड़ ऑर्डर वितरित किए हैं।

निवेशकों के लिए मुख्य बात और आकर्षण यह है कि वैश्विक स्तर पर ऐसे अन्य प्लेटफार्म के अनुरूप, कोई भी क्विक कॉमर्स व्यवसाय ऐसे श्रमिकों को कर्मचारियों के रूप में नहीं मानता है। इस प्रकार, ऐसी कंपनियां अपने साथ काम करने वालों को वैधानिक रोजगार लाभ देने से बचती हैं। जबकि ऐसे श्रमिकों को ‘गिग’ श्रमिक कहा जाता है और उनकी सेवा वास्तव में, अनौपचारिक या आकस्मिक श्रम के पुराने रूपों के समान है।

फिलहाल, क्विक कॉमर्स के अर्थशास्त्र का सर्वाधिक असर बड़े शहरों पर पड़ रहा है। ऑल इंडिया कंज्यूमर प्रोडक्ट्स डिस्ट्रीब्यूटर्स फेडरेशन (एआईसीपीडीएफ) के अनुसार, जो रोजमर्रा की वस्तुओं के वितरकों का प्रतिनिधित्व करता है, पिछले साल लगभग 2,00,000 किराना स्टोर बंद हो गए हैं। करीब 45 प्रतिशत किराना दुकानें मेट्रो शहरों में और 30 प्रतिशत दूकानें टियर-वन शहरों में बंद हुई हैं।



2015-16 और 2022-23 के बीच शहरी क्षेत्रों में किराना दुकानों की संख्या में 9.4 प्रतिशत या 11.50 लाख की गिरावट आई है। इसके विपरीत, 2010-11 और 2015-16 के बीच, शहरी क्षेत्रों में ऐसे आउटलेट लगभग 20 प्रतिशत बढ़े थे। हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि 2022-23 में ग्रामीण इलाकों में किराना दुकानों की संख्या एक साल पहले की तुलना में लगभग 56,000 कम हो गई।

झारखंड में साल 2015-16 और साल 2022-23 के बीच अनिगमित व्यापार प्रतिष्ठानों में 21 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई, लेकिन इसी अवधि में गुजरात में भी 19 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। दूसरे छोर पर देखें, तो उत्तर प्रदेश, किराना दुकानों की सबसे बड़ी संख्या वाला राज्य है और यहां सात साल की अवधि में किराना दुकानों की संख्या में 26 प्रतिशत की नाटकीय गिरावट देखी गई। समृद्ध राज्य कर्नाटक में भी इसी अवधि में 32 प्रतिशत की गिरावट देखी गई।

आर्थिक विकास के सामान्य क्रम में, छोटी दुकानों का खत्म होना कम चिंताजनक हो सकता है, अगर वहां कार्यरत श्रमिकों को कहीं और लाभकारी रोजगार मिल जाए। एनएसएस के अनुसार, अनिगमित व्यापार प्रतिष्ठानों में साल 2023-24 में 3.97 करोड़ कर्मचारी थे, जो 2015-16 की तुलना में लगभग दस लाख अधिक हैं। रोजगार के बारे में सोचने की जरूरत है और रोजगार सुरक्षा के बारे भी उपाय करने होंगे।
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