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ई-टंग ने किया हर्बल मिलावट का खेल खत्म, 2-3 सेकंड में पता चलेगा नकली प्रोडक्ट

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ई-टंग का प्रोटोटाइप। जागरण






आशीष चौरसिया, ग्रेटर नोएडा। अभी तक हर्बल प्रोडक्ट्स में मिलावट और शुद्धता की जांच एक्सपर्ट्स की जानकारी और समझ पर निर्भर करती थी। नतीजे अक्सर हर व्यक्ति में अलग-अलग होते थे। दिल्ली के महाराजा सूरजमल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की हाइपरग्रे टीम ने इस समस्या का हल ढूंढ लिया है।

आयुष मंत्रालय से मिले एक प्रॉब्लम स्टेटमेंट के आधार पर, टीम ने एक ई-टंग बनाया है। यह ई-टंग कुछ ही सेकंड में हर्बल प्रोडक्ट्स के असली होने के साथ-साथ मिलावट की मात्रा का भी पता लगाएगा। इस डिवाइस से मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां बेहतर क्वालिटी वाले प्रोडक्ट्स मार्केट में ला पाएंगी। इससे लैब टेस्टिंग में लगने वाला समय भी बचेगा, और कम समय में प्रोडक्ट रिपोर्ट मिलने से संबंधित डिपार्टमेंट को एक्शन लेने में मदद मिलेगी।

हाइपरग्रे टीम को लीड करने वाले पुलकित कपूर ने बताया कि मार्केट में बड़ी संख्या में नकली और मिलावटी हर्बल प्रोडक्ट्स बिकते हैं, जिसका लोगों की हेल्थ पर बुरा असर पड़ता है। कई बार देखा गया है कि मिलावटी प्रोडक्ट्स खाने से लोगों की जान भी चली गई है। जब डिपार्टमेंट इन प्रोडक्ट्स के सैंपल इकट्ठा करके टेस्टिंग के लिए लैब में भेजता है, तो रिपोर्ट आने में 15 दिन से लेकर एक महीने तक का समय लग जाता है। तब तक, प्रोडक्ट्स मार्केट में बड़ी मात्रा में बिक चुके होते हैं।

  

ई-टंग बनाने वाली टीम। जागरण

ई-टंग इस प्रॉब्लम को सॉल्व करेगा। यह ई-टंग सिर्फ दो से तीन सेकंड में एक सैंपल टेस्ट करेगा और मिलावटी प्रोडक्ट्स और उनकी मात्रा का पता लगाएगा। उन्होंने बताया कि उनकी टीम को आयुष मंत्रालय की तरफ़ से हर्बल प्रोडक्ट्स के स्टैंडर्ड और असली होने का सही अंदाजा लगाने का काम दिया गया था। हाल ही में, ई-टंग को गलगोटिया यूनिवर्सिटी में हुए स्मार्ट इंडिया हैकाथॉन के हार्डवेयर एडिशन में दिखाया गया था और एडमिशन राउंड में इसे विनर घोषित किया गया था। अब, ई-टंग को पेटेंट कराने समेत बाकी सभी काम सरकार कर रही है।
ई-टंग कैसे काम करता है?

यह सिस्टम हर्बल सैंपल्स को एनालाइज़ करने के लिए कई सेंसर और इलेक्ट्रोकेमिकल इलेक्ट्रोड वाले एक सस्ते एम्बेडेड हार्डवेयर सेटअप का इस्तेमाल करता है। यह सिस्टम pH, टोटल डिज़ॉल्व्ड सॉलिड्स (TDS), अलग-अलग इलेक्ट्रोड से इलेक्ट्रोकेमिकल रिस्पॉन्स और ऑप्टिकल एब्जॉर्प्शन जैसे पैरामीटर्स को मापता है। ये सब मिलकर हर हर्बल सैंपल के लिए एक खास टेस्ट फिंगरप्रिंट बनाते हैं। ई-टंग के पीछे की टीम को पुलकित कपूर लीड कर रहे हैं और इसमें प्रखर चंद्रा, साइमन खबास, वैशाली, सैनी शर्मा और पारुल सिंह शामिल हैं।

एक ESP-32-बेस्ड हार्डवेयर यूनिट रियल-टाइम डेटा इकट्ठा करती है, जबकि एनालिसिस लेयर सेंसर पैटर्न को टेस्ट सिग्नेचर से मैप करने के लिए डेटा-ड्रिवन मॉडल का इस्तेमाल करती है। पूरा डिज़ाइन प्रैक्टिकल इस्तेमाल, कम लागत और पोर्टेबिलिटी पर ज़ोर देता है। इससे सिस्टम को मैन्युफैक्चरिंग यूनिट, रिसर्च लैब और फील्ड इंस्पेक्शन में इस्तेमाल किया जा सकता है।
यह होगा फायदा

पारंपरिक प्रैक्टिस में, टेस्ट का असेसमेंट काफी हद तक सब्जेक्टिव होता है और एक्सपर्ट की समझ पर निर्भर करता है। यह हर व्यक्ति में अलग हो सकता है। इससे हर्बल प्रोडक्ट में स्टैंडर्डाइजेशन, क्वालिटी कंट्रोल और मिलावट का पता लगाने में चुनौतियां आती हैं। टीम के सॉल्यूशन का मकसद टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके इस प्रोसेस में स्टैंडर्डाइजेशन और रिपीटेबिलिटी लाना है। आयुष मंत्रालय द्वारा दिया गया प्रॉब्लम स्टेटमेंट साइंटिफिक और टेक्नोलॉजी-ड्रिवन अप्रोच के ज़रिए इस कमी को दूर करने का मकसद रखता है।


अभी, किसी प्रोडक्ट के सैंपल को लैब से टेस्ट रिपोर्ट मिलने में 14 दिन लगते हैं। कभी-कभी, जब ज़्यादा सैंपल मिलते हैं तो समय बढ़ जाता है। अगर रिसर्च लैब में ऐसा डिवाइस इस्तेमाल किया जाए, तो यह बहुत आसान हो जाएगा।
- सर्वेश मिश्रा, असिस्टेंट फ़ूड कमिश्नर II
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