search

अमेरिका-चीन के बीच फंसा भारत:अब कम ताकतवर देशों से बढ़ा रहा दोस्ती, ट्रम्प के टैरिफ से बदली भारत की विदेश और व्यापार नीति

deltin55 3 hour(s) ago views 3

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने पिछले महीने स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के मंच से कहा था कि दुनिया की पुरानी व्यवस्था ‘टूट’ रही है। अब मध्यम ताकत वाले देशों को साथ लाकर काम करना होगा।

दावोस में अपने भाषण में कार्नी ने न तो ट्रम्प प्रशासन का नाम लिया और न ही उन अमेरिकी टैरिफ का जिक्र किया, जिनकी वजह से पुराना ग्लोबल सिस्टम हिल गया। अपने भाषण में उन्होंने सीधेतौर पर भले ही भारत का नाम न लिया हो, लेकिन इशारा साफतौर पर भारत की तरफ था।

भारत इस वक्त दो बड़े दबावों के बीच खड़ा है। एक तरफ अमेरिका की बदलती नीतियां हैं तो दूसरी ओर चीन की बढ़ती आक्रामकता। ऐसे हालात में भारत अब पारंपरिक साझेदारों से आगे बढ़कर दुनिया के दूसरे हिस्सों में नए दोस्त तलाश रहा है।

भारत-EU ने 18 साल से अटकी डील पूरी की

इस घटना के ठीक एक हफ्ते बाद, भारतीय पीएम मोदी नई दिल्ली में यूरोपियन (EU) की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन के साथ खड़े थे।

दोनों ने करीब 18 साल से अटके पड़े एक बड़े व्यापार समझौते की घोषणा की, जिसे उन्होंने ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा।

इस डील से करीब 2 अरब लोगों का बाजार तैयार होगा। यह सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि उस नए अंतरराष्ट्रीय सिस्टम का हिस्सा है, जिसमें अमेरिका की भूमिका कमजोर होने के बाद बाकी देश मिलकर नया ढांचा खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं।

भारत की विदेश नीति में बदलाव आ रहा

आज भारत उन देशों में शामिल है जिनकी राय और फैसले वैश्विक राजनीति को प्रभावित करने लगे हैं। 140 करोड़ की आबादी के साथ यह दुनिया की सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला देश है।

भारत की इकोनॉमी भी जापान और जर्मनी के साथ दुनिया की टॉप-5 में शामिल हो चुकी है, हालांकि प्रति व्यक्ति आय अब भी इन देशों से बहुत कम है।

प्रधानमंत्री मोदी की आत्मनिर्भर भारत वाली सोच अब थोड़ी नरम पड़ती दिख रही है। भारत में यह धारणा लंबे समय से रही है कि खुद को सुरक्षित रखने के लिए दूसरे देशों से ज्यादा आर्थिक जुड़ाव नहीं होना चाहिए। लेकिन यूरोप, कनाडा और दूसरे देश यह तर्क देते रहे हैं कि मिलकर व्यापार करने से ही देश मजबूत बनते हैं।

भारत-ब्रिटेन के बीच FTA से बदलाव शुरू

भारत और दूसरे अहम देशों के बीच रिश्तों में तेजी पिछले साल ब्रिटेन के साथ हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से दिखनी शुरू हुई। यह समझौता लंबे समय से अटका हुआ था।

इसके बाद दिसंबर में ओमान और न्यूजीलैंड के साथ भी ऐसे ही अहम समझौते किए गए। ये द्विपक्षीय समझौते दिखाते हैं कि भारत की नीति में बदलाव आ रहा है।

पिछले कुछ हफ्तों में जर्मनी, जापान, यूएई और सऊदी अरब के बड़े नेता नई दिल्ली आए। हर मुलाकात में भारत के साथ रिश्ते आगे बढ़ाने की बात हुई और नए समझौते किए गए।

फरवरी में ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा भी भारत आने वाले हैं। इसके बाद मार्क कार्नी भी भारत आएंगे। उम्मीद है कि वे मार्च में कनाडा के एक डेलिगेशन के साथ नई दिल्ली आएंगे और एक और व्यापार समझौते को आगे बढ़ाएंगे।

ट्रम्प के टैरिफ से रिश्ते खराब हुए

पिछले साल डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत से आने वाले ज्यादातर सामान पर 50% टैरिफ लगा दिया था। इसमें आधा जवाबी टैरिफ था और आधा रूस से तेल खरीदने की सजा के तौर पर लगाया गया एक्स्ट्रा टैक्स।

यहीं से भारत-अमेरिका के रिश्तों में बदलाव शुरू हुआ था। इससे पहले 25 सालों तक अमेरिका और भारत के रिश्ते मजबूत करने की कोशिश होती रही थी, खासकर चीन की बढ़ती ताकत का मुकाबला करने के लिए।

हालांकि, सोमवार को अमेरिका ने भारत पर टैरिफ 50% से घटाकर 18% कर दिया है। ट्रम्प ने अप्रैल में 25% रेसिप्रोकल टैरिफ (जैसे को तैसा) लगाया था और रूस से तेल खरीदने के कारण अगस्त में 25% पेनल्टी का ऐलान किया था। इससे भारत पर कुल टैरिफ 50% हो गया था।

अब व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने न्यूज एजेंसी ANI को बताया कि भारत पर सिर्फ टैरिफ 18% ही लगेगा। अमेरिका रूसी तेल खरीदने के कारण लगा 25% टैरिफ हटा देगा।

सप्लाई चेन में भारत की पकड़ कमजोर

वॉशिंगटन स्थित ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की सीनियर फेलो तन्वी मदान के मुताबिक, भारत चाहता था कि वह चीन के साथ वही करे जो चीन ने पश्चिमी देशों के साथ किया। यानी उनकी प्रतिभा और तकनीक हासिल करे और फिर खुद एक मजबूत प्रतिस्पर्धी बने।

अब इसमें भारत की सबसे बड़ी कमी यह है कि दुनिया की सप्लाई चेन में उसके हाथ कोई ऐसा मजबूत पत्ता नहीं है, जिससे वह दूसरों पर दबाव बना सके। जैसे चीन के पास रेयर-अर्थ खनिज हैं, या ताइवान और नीदरलैंड के पास एडवांस चिप बनाने की तकनीक है, जिनकी वजह से बाकी देश उन पर निर्भर रहते हैं।



भारत के पास फिलहाल ऐसा कुछ नहीं है। आज हालात यह हैं कि चीन का सामान दुनियाभर के बाजारों में छाया हुआ है और चीनी सैनिक हिमालय के उस हिस्से में डटे हुए हैं, जिस पर भारत अपना दावा करता है।

ऐसे में भारत को चीन के मुकाबले पहले से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय समर्थन की जरूरत है। अगर यह मदद अमेरिका से नहीं मिलती, तो फिर दूसरे देशों को आगे आना होगा।

पटरी पर आ रहे भारत-कनाडा के रिश्ते

कनाडा के साथ नया समझौता एक बड़ा बदलाव माना जाएगा। अक्टूबर 2024 में भारत और कनाडा के रिश्ते तब बिगड़ गए थे, जब वैंकूवर के पास रहने वाले एक सिख अलगाववादी की हत्या को लेकर दोनों देशों ने एक-दूसरे के कई राजनयिकों को बाहर निकाल दिया था।

इसके बाद जून 2025 में जब प्रधानमंत्री मोदी, मार्क कार्नी के निमंत्रण पर अल्बर्टा में हुए जी-7 शिखर सम्मेलन में शामिल हुए, तभी से रिश्तों में सुधार दिखने लगा था। इसके कुछ ही समय बाद अमेरिका के टैरिफ का झटका लगा।

ईवाई इंडिया के मुख्य नीति सलाहकार डी. के. श्रीवास्तव का कहना है कि जितने ज्यादा देशों से भारत की साझेदारी होगी, उतना ही वह वैश्विक उतार-चढ़ाव से खुद को सुरक्षित रख पाएगा। हालांकि यह साफ नहीं है कि दूसरे देश अमेरिकी टैरिफ से हुए नुकसान की कितनी भरपाई कर पाएंगे।

अमेरिका भारत का सबसे बड़ा बाजार

अमेरिका भारत का सबसे बड़ा बाजार है और 50% टैरिफ लगने के बाद वहां भारत के निर्यात में शुरुआती महीनों में भारी गिरावट आई थी। पिछले साल भारतीय मुद्रा डॉलर के मुकाबले 7% कमजोर हुई।

भारत ने इसकी भरपाई इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर पर ज्यादा ध्यान देकर की, क्योंकि इस पर टैरिफ नहीं लगता। साथ ही दूसरे देशों में भी अपना बाजार बढ़ाया। नतीजा यह हुआ कि कुल मिलाकर भारत का निर्यात पिछले साल बढ़ ही गया।

इन नए व्यापार समझौतों के साथ-साथ देश के भीतर हो रहे आर्थिक सुधार भारत को और मजबूती दे सकते हैं। अर्थशास्त्री रजत कथूरिया कहते हैं, “भारत में अक्सर संकट को सुधार का मौका बना लिया जाता है। जैसे छत से पानी टपकने लगे, तो पूरा घर ही मरम्मत के लिए तैयार कर दिया जाता है।”

----------------

यह खबर भी पढ़ें…

दुनिया को डराने वाले ट्रम्प यूरोप के आगे क्यों झुके:27 देशों ने 'ट्रेड बाजूका' की धमकी दी; घबराए ट्रम्प ने 10% टैरिफ हटाया
like (0)
deltin55administrator

Post a reply

loginto write comments
deltin55

He hasn't introduced himself yet.

410K

Threads

12

Posts

1310K

Credits

administrator

Credits
135587