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बलि का बकरा बनते बीएलओ!

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अरुण श्रीवास्तव-





उत्तर भारत खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक कहावत है “गरीब की मेहरारू गांव भरे की भौज़ाई”। यह कहावत हाल के वर्षों में होने वाले विधानसभाओं के चुनावों की तैयारियों को लेकर देखी जा रही है। इस तैयारी के पहले चरण मतदाता सूची के निर्माण के दौरान जिस तरह से बूथ लेवल ऑफीसरों (बीएलओ) की आत्महत्या की खबरें आ रही हैं उसे तो ऐसा लगता है कि छोटे कर्मचारी ही बलि का बकरा बनाए जाते हैं या बनने को मजबूर होते हैं। उत्तर भारत के प्रतिष्ठित समाचार पत्र दैनिक भास्कर के अनुसार 19 दिन में छह राज्यों में 15 बीएलओ की जान चली गई और बड़ी संख्या में लोग बीमार हैं। इससे पहले किसी भी चुनाव में एक भी बीएलओ (BLO) की ज़ान नहीं गई।









2006 में बीएलओ नामक पद अस्तित्व में आया। तब से लेकर बिहार चुनाव तक एक भी बीएलओ के मरने का समाचार सुनने को नहीं मिला। जब उत्तर प्रदेश सहित कई प्रदेशों में विधानसभाओं के चुनाव होने में कई माह या साल बचे हैं तो एसआईआर में इतनी हड़बड़ी क्यों?





अपुष्ट समाचार के अनुसार जब 2003 के बाद से एसआईआर करायी ही नहीं गई फिर इस साल ही क्यों? वो भी अचानक। भारत का सबसे बड़ा चुनाव लोकसभा का होता है। 2024 लोकसभा चुनाव से पहले एसआईआर क्यों नहीं कराया गया? बिहार विधानसभा चुनाव के काफी पहले से इसकी शुरुआत क्यों की गई? वह भी तब जब चुनाव होने बहुत करीब थे और अन्य राज्यों सहित बिहार के लोग भी बाढ़ से बुरी तरह से प्रभावित थे और खेती का सीज़न भी था। यही नहीं बिहार से ही सबसे अधिक संख्या में लोग अन्य राज्यों में जाकर खेती किसानी से लेकर भवन निर्माण व घरेलू काम करते हैं।





चुनाव आयोग की निष्पक्षता का एक और नमूना बिहार विधानसभा चुनाव में देखने को मिला। चुनाव छठ पूजा के बाद करवाए गए यह सर्वविदित है कि बिहार के लोग चाहे होली-दिवाली पर अपने घर न आ पाएं छठ पर जरूर आते हैं। अब ऐसे में क्या यह संभव है कि वो छठ में भी आएं और उसके बाद फिर मतदान के लिए भी आएं। हो सकता है इससे पूर्व मतदाता सूची में करेक्शन करवाने के लिए आएं हों। सीमित आय वाले बिहार के लोग जो अन्य राज्यों में मेहनत-मजदूरी करते हैं क्या वो तीन-तीन बार अपने घर आ सकते हैं?





जबकि चुनाव के समय को लेकर इससे पहले के चुनाव मुख्य चुनाव आयुक्त रहे राजीव कुमार ने स्वीकार किया था कि लोकसभा का चुनाव गर्मी के महीने में रखना ठीक नहीं रहा। यहां यह बताना भी वाजिब है कि आमतौर पर भारत वर्ष में लोकसभा चुनाव फरवरी के आसपास और होली के पहले ही होते आए हैं। ऐसा कोई उदाहरण देखने को नहीं मिलता जब उत्तर भारत में दशहरा, दीपावली, होली के बीच या बिल्कुल करीब विधानसभाओं या लोकसभा के उप चुनाव हुए हों।







अब एक नजर चुनाव आयोग की “निष्पक्षता”पर। शायद यह पहली बार देखने को मिला कि, कोई भी मुख्य चुनाव आयुक्त ने ऐसा निर्णय लिया हो या निष्क्रियता दिखाई हो जो सिर्फ और सिर्फ सत्ता पक्ष को ही लाभान्वित करने वाला रहा हो। इससे पहले तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल व उत्तर प्रदेश में आयोग ने सरकार द्वारा घोषित की गई लाभकारी योजनाओं के विषय में निर्णय लेते हुए आवश्यक कार्रवाई की। तमिलनाडु में 2011, 2016 व 2021 में विपक्षी दलों ने शिकायत की कि, हजारों घरों में ‘ऑफिशियल योजना’ के नाम पर नकदी दी गई। आयोग ने दर्जनों सीटों पर मतदान स्थगित किया और छापे मारे तो पाया कि सत्ताधारी दल ने योजना के नाम पर नगदी वो भी समान्य तौर पर नहीं चुनावी लाभ के लिए। कई सीटों पर चुनाव रद्द कराकर दोबारा चुनाव कराया गया।





इसी तरह आंध्र प्रदेश में 2019 के चुनाव में सरकार ने “किसान योजना” की पहली किस्त चुनाव पूर्व दी थी, विपक्ष की शिकायत पर आयोग ने आदेश दिया कि चुनाव घोषित होने के बाद कोई भी नई क़िस्त जारी नहीं की जाएगी। क्या ऐसा वर्तमान चुनाव आयोग ने बिहार चुनाव के लिए आदेश दिया था। बिहार में जीविका दीदियों के खाते में 10-10 हजार रुपए तिथि घोषित होने के ठीक पहले और शेष बाद में डाले गए। विपक्ष का आरोप था कि आयोग ने जान बूझकर तिथि की घोषणा किश्त जारी होने के बाद की। यही नहीं अपनी चुनावी रैलियां में यह भी कहां जाने लगा कि शेष राशि सरकार के दुबारा सत्ता में आने पर दी जाएगी। तो क्या यह बिहार के मतदाताओं को प्रभावित करने वाला नहीं था?





शक की सुई इसलिए भी बार-बार घूमती है और इस फैसले को तब मजबूती प्रदान करती है जब उन्हीं जीविका दीदियों को बीएलओ की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। चुनाव से जुड़े कार्य पहले सरकारी/अर्ध सरकारी कर्मचारी करते हैं उसके बाद आयोग व अन्य सरकारी उपक्रमों जैसे बैंक और एलआईसी के कर्मचारियों को चुनावी ड्यूटी में लगाया जाता है न कि उन जीविका दीदियों को जिन्हें आज रुपए दिए और कल एहसान उतारने का मौका दे दिया।





क्या यह अपना पक्ष मजबूत करने के लिए पुख्ता सवाल नहीं है कि, तीन हफ्तों में 16 बीएलओ की जानें चलीं गईं। सभी के सभी बीएलओ उन्हीं राज्यों से जुड़े हुए हैं जहां पर चुनाव साल दो साल के अंतर पर होने हैं। किसी अन्य राज्य जैसे उत्तराखंड में तो किसी भी बीएलओ की जान नहीं गई क्योंकि अभी यहां एस आई आर संबंधी काम ही शुरू नहीं हुआ।





सभी बीएलओ पर एसआईआर संबंधी कार्य समय से पूरा करने का जबरदस्त दबाव है। कार्य की अवधि एक समान है जबकि चुनाव एक ही अवधि में नहीं होने हैं। कुछ राज्यों में अगले साल चुनाव होने हैं तो कुछ में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं पर सबकी टाइम लाइन एक ही है। क्या गजब की पारदर्शिता है!





ऐसे में देर रात तक काम करने के तनाव और हड़बड़ी में हार्टअटैक व आत्महत्या जैसी घटनाएं देखने-सुनने को मिल रही हैं। जिससे ऐसा लगता है कि एसआईआर चुनाव सुधार के लिए नहीं बल्कि BLO जैसे छोटे कर्मचारियों पर थोपे गए ज़ुल्म का नाम है।




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