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Budget 2026: आजादी के बाद कैसा था पहला बजट? बंटवारा, रेलवे संकट और 660 करोड़ का बोझ, कैसे संभला था देश का खजाना

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Budget 2026: आजादी के बाद कैसा था पहला बजट? बंटवारा, रेलवे संकट और 660 करोड़ का बोझ, कैसे संभला था देश का खजाना



India first budget 1947-1948: आजादी का जश्न अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि हकीकत ने दरवाजा खटखटा दिया। देश आजाद था, लेकिन खजाना लगभग खाली। ऊपर से बंटवारे का जख्म ताजा था। लाखों लोग उजड़ चुके थे, शहर बदले जा रहे थे और देश की सबसे बड़ी ताकत मानी जाने वाली रेलवे खुद पटरी से उतरी हुई थी।

ऐसे मुश्किल समय में भारत ने अपना पहला बजट पेश किया, वो भी पूरे साल का नहीं, सिर्फ साढ़े सात महीने के लिए। यह बजट सिर्फ पैसों का हिसाब नहीं था, बल्कि टूटते-बिखरते देश को संभालने की कोशिशों की असली कहानी था। आज इस खबर में आपको बताएंगे आजाद भारत के पहले बजट (independent India first budget) की पूरी कहानी।
जब लड़खड़ा गई थी देश की \“जीवनरेखा\“

रेलवे उस दौर में सिर्फ सफर का साधन नहीं, बल्कि देश की आर्थिक धड़कन थी। लेकिन 1947 का बंटवारा रेलवे के लिए किसी भूकंप से कम नहीं था। बड़ी संख्या में रेलवे कर्मचारी इधर-उधर चले गए। कई अहम रेल रूट अचानक अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार चले गए। ट्रेनों की टाइमिंग गड़बड़ा गई, मालगाड़ियां अटकने लगीं और सप्लाई चेन टूटने लगी।
जब ट्रेनें चलाना भी पड़ गया था मुश्किल

सबसे बड़ी मार पड़ी कोयले की सप्लाई पर। 1946 के दौरान कोयले की ढुलाई में तेज गिरावट आई। नतीजा- फैक्ट्रियां प्रभावित हुईं, बिजली उत्पादन पर असर और खुद ट्रेनें चलाना भी मुश्किल हो गया। ऊपर से एक और समस्या- वैगनों का टर्नअराउंड टाइम बढ़ गया। जो डिब्बा पहले 9-10 दिन में माल ढोकर लौट आता था, अब 14-15 दिन लेने लगा। मतलब साफ था- माल ढुलाई की असली क्षमता 40 से 50% तक घट गई।

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पाकिस्तान के साथ हिसाब-किताब का पेंच

बंटवारा सिर्फ जमीन का नहीं, रेलवे के माल-असबाब (furnishings) और कर्ज का भी था। सवाल था- रेलवे की संपत्तियां और देनदारियां कैसे बांटी जाएं? भारत का कहना था कि बंटवारा बुक वैल्यू माइनस डेप्रिसिएशन के आधार पर होना चाहिए। पाकिस्तान का तर्क अलग था। वो कह रहा था कि बंटवारा रेलवे की कमाई की क्षमता (earning capacity) के आधार पर हो। फर्क बड़ा था।

अगर भारत की बात मानी जाती, तो भारत पर करीब 660 करोड़ रुपए की पूंजी देनदारी आती और पाकिस्तान पर करीब 150 करोड़। लेकिन अगर पाकिस्तान का फॉर्मूला लागू होता, तो भारत का बोझ बढ़कर 757 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता था। मामला इतना उलझा कि इसे आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल तक ले जाना पड़ा।
कर्मचारियों का पलायन, फिर नई शुरुआत

बंटवारे (India Pakistan railway assets division 1947) का असर सिर्फ ट्रैकों पर नहीं, इंसानों पर भी पड़ा। रेलवे बजट दस्तावेज बताता है कि करीब 1,26,300 रेलवे कर्मचारियों ने पाकिस्तान से भारत आने का विकल्प चुना। इनमें से लगभग 1,08,400 लोग भारत पहुंच चुके थे या अपनी आमद की सूचना दे चुके थे। इसमें सबसे बड़ी बात थी कि करीब 1,04,000 कर्मचारियों को नई पोस्टिंग भी दे दी गई थी।

सोचिए, ये सब तब हो रहा था जब देश दंगों, शरणार्थियों और प्रशासनिक अव्यवस्था से जूझ रहा था। दूसरी तरफ, करीब 83,000 कर्मचारी भारत से पाकिस्तान जाने का विकल्प चुन चुके थे। इतने बड़े पैमाने पर कर्मचारियों का ट्रांसफर, उनके परिवारों की बसावट और नई जगह पर काम शुरू कराना, यह अपने आप में एक ऐतिहासिक प्रशासनिक चुनौती थी।

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जब लाखों शरणार्थियों को ढो रही थी रेलवे

रेलवे सिर्फ अपने स्टाफ को नहीं, बल्कि लाखों शरणार्थियों को भी ढो रही थी। ट्रेनों में लोग, सामान, यादें सब कुछ भरकर चल रहा था। सामान्य यात्री सेवाएं कम करनी पड़ीं, क्योंकि ट्रेनें राहत और बचाव का साधन बन चुकी थीं। इससे आम यात्रियों को दिक्कत हुई, लेकिन हालात ऐसे थे कि प्राथमिकता इंसानों की जान थी।
साढ़े 7 महीने का बजट, पर बोझ पहाड़ जैसा

यह बजट 15 अगस्त 1947 से 31 मार्च 1948 तक के लिए था। यानी पूरा साल भी नहीं। इस दौरान सरकार को शरणार्थियों के पुनर्वास, दंगों से हुई तबाही और नए प्रशासन की स्थापना पर भारी खर्च करना था। कई खर्च ऐसे थे, जिनका सही अंदाजा भी नहीं था।

रेलवे खुद घाटे में थी, इसलिए उससे आम बजट को मदद मिलने की उम्मीद नहीं थी। उल्टा खर्च बढ़ रहे थे, वेतन आयोग की सिफारिशें, कोयले और अनाज की बढ़ती कीमतें, और कर्मचारियों की नई सेवा शर्तें, इन सबने रेलवे की कमर तोड़ दी।
जब सरकार को बढ़ाना पड़ा किराया

सरकार के पास विकल्प सीमित थे। घाटा कम करने के लिए रेलवे किरायों और माल भाड़े में बढ़ोतरी का रास्ता चुना गया। खासतौर पर कोयला, लोहा-इस्पात और जरूरी सामान की ढुलाई से ज्यादा राजस्व जुटाने की योजना बनी। यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन हालात ने मजबूर किया।
सिर्फ बजट नहीं, संघर्ष की पूरी कहानी

1947-48 का यह बजट बताता है कि आजाद भारत ने शुरुआत ही संकटों के बीच की थी। टूटी रेल लाइनें, बंटा इंफ्रास्ट्रक्चर, पाकिस्तान से वित्तीय विवाद और खाली खजाना। फिर भी देश ने रुकना नहीं चुना। रेलवे को दोबारा खड़ा करने, प्रशासन को पटरी पर लाने और अर्थव्यवस्था को संभालने की कोशिश शुरू हो चुकी थी।

इसलिए यह बजट सिर्फ वित्तीय दस्तावेज नहीं, बल्कि उस जज्बे की कहानी है। जहां संसाधन कम थे, मुश्किलें ज्यादा थीं, लेकिन इरादा मजबूत था। रेलवे, पाकिस्तान से बंटवारे का हिसाब और साढ़े सात महीने का बजट, इन तीनों ने मिलकर नए भारत की पहली आर्थिक परीक्षा लिखी।
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