Magh Purnima 2026: माघ पूर्णिमा का महत्व।
प्रो. गिरिजा शंकर शास्त्री, (पूर्व अध्यक्ष, ज्योतिष विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय)। Magh Purnima 2026: शास्त्रों में माघमास स्नान की बड़ी महिमा कही गई है। इसमें भी माघी पूर्णिमा को विशेष महत्व दिया गया है। जब माघ मास आता है तब पूर्वी क्षितिज पर सूर्यास्त के पश्चात महीने भर मघा नक्षत्र रात्रि पर्यंत उदित रहता है, अतः जहां माघ को वैदिक ऋषियों ने तपमास कहा, उसी की पूर्णिमा को माघी पूर्णिमा भी कहा जाने लगा। पूर्णिं मीमीते अथवा पूर्णो माः अर्थात् पूर्णमा: तत्रभवा पौर्णमासी तिथि:। हेमाद्रि नामक धर्मग्रंथ में कहा गया है - पूर्णमासो भवेद् यस्यां पूर्णमासी ततः स्मृताः। अर्थात जब चंद्रमा पूर्णकला से उदित होता है, तब उस तिथि को पूर्णमासी या पूर्णिमा कहा जाता है। जब पूर्णिमा के दिन चंद्रमा एवं गुरु एक नक्षत्र में होते हैं, तब उस पूर्णिमा को महापूर्णिमा कहा जाता है। ऐसी स्थिति में उपवास, स्नान, दान आदि अक्षय फलदायक हो जाते हैं।
तिल दान का विधान
माघपूर्णिमा को तिल दान अवश्य करने का विधान किया गया है। पद्मपुराण के अध्याय 219 से 250 तक कुल 28 सौ श्लोकों में माघमास के स्नानादिक कृत्यों का माहात्म्य बताया गया है। प्रात: स्नान की प्रशंसा की गई है। कहा गया है कि प्रातःकाल जब तारे दिख रहे हों, उस काल का स्नान सर्वोत्तम होता है। सूर्योदय के समय का स्नान मध्यम तथा बाद का स्नान सामान्य फल दाता रहता है। मघा नक्षत्र युक्त पूर्णिमा जिस मास में होती है, उस मास को माघ मास कहते हैं। जिस व्यक्ति की इच्छा बहुत काल तक स्वर्गलोक में रहने की हो वह माघमास पर्यंत सूर्योदय से पूर्व किसी भी जल में स्नान कर सकता है।
माघ मास की पूर्णिमा को तीर्थस्थलों में स्नान-दानादि के लिए परम फलदायिनी बताया गया है। तीर्थराज प्रयाग में इस दिन स्नान, दान, गोदान एवं यज्ञ का विशेष महत्व है। संगमस्थल पर एक मास तक कल्पवास करने वाले तीर्थ यात्रियों के लिए यह तिथि एक विशेष पर्व है। माघी पूर्णिमा को एक मास का कल्पवास पूर्ण भी हो जाता है।
गंगा माता की आरती और पूजा
इस पुण्य तिथि को सभी कल्पवासी गृहस्थ प्रातःकाल गंगास्नान कर गंगा माता की आरती और पूजा करते हैं तथा अपनी-अपनी कुटियों में आकर हवन करते हैं, फिर साधु-संन्यासियों तथा ब्राह्मणों एवं भिक्षुओं को भोजन कराकर स्वयं भोजन ग्रहण करते हैं और कल्पवास के लिए रखी गई खाने-पीने की वस्तुएं, जो कुछ बची रहती हैं, उन्हें दान कर देते हैं और गंगाजी की \“रेणुका\“, कुछ प्रसाद-रोली एवं रक्षासूत्र तथा गंगाजल लेकर फिर से गंगा माता के \“दरबार\“ में उपस्थित होने की प्रार्थना कर अपने-अपने घरों को जाते हैं।
माघी पूर्णिमा से जुड़े नियम
माघी पूर्णिमा को कुछ धार्मिक कृत्यों के संपन्न करने की भी विधि शास्त्रों में दी गई है। वह इस प्रकार है- प्रातःकाल नित्यकर्म एवं स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु का विधिपूर्वक पूजन करें, फिर पितरों का श्राद्ध करे। असमर्थों को भोजन, वस्त्र तथा आश्रय दें। तिल, कंबल, कपास, गुड़, घी, मोदक, जूते, फल, अन्न और यथाशक्ति सुवर्ण, रजत आदि का दान दें तथा पूरे दिन का व्रत रखकर ब्राह्मणों को भोजन दें और सत्संग एवं कथा-कीर्तन में दिन-रात बिताकर दूसरे दिन पारण करें। माघ मास की पूर्णिमा को स्नानोपरांत तिलपूर्णपात्र, कंबल, वस्त्र, मिष्ठान्न, गोदान अथवा यथाशक्ति दान करने की परंपरा है। तिल का तेल, आंवला, भोजन तथा दक्षिणा देने का अतिशय पुण्य शास्त्रों में वर्णित है। जो किसी कारणवश माघ मास में तीन दिन भी स्नान नही कर पाते, वे लोग भी केवल एक दिन माघी पूर्णिमा के दिन स्नान-दान करने से संपूर्ण माघ मास के स्नान का फल प्राप्त कर लेते हैं।
दिव्यलोक की प्राप्ति की कथा
पद्मपुराण के उत्तरखंड में वशिष्ठ जी ने महाराज दिलीप को माघमास के स्नानमात्र से सुव्रत नामक ब्राह्मण के दिव्यलोक की प्राप्ति की कथा सुनाई है। वशिष्ठ जी कहते हैं कि नर्मदा नदी के तट पर एक सुव्रत नामक ब्राह्मण वेदज्ञ होते हुए भी अर्थ लोलुप हो गए और धन के लोभ में गाय, कन्या, अन्न आदि का विक्रय करने लगे। संध्यावंदन, पूजा, पाठ का भी समय नहीं रह गया। धन कैसे जोड़ें, इसी चिंतन में जीवन का बहुत समय व्यतीत कर दिया। जब वृद्ध हो गए, चलने-फिरने का सामर्थ्य नहीं रह गया, तब चिंताग्रस्त रहने लगे।
चोरों द्वारा इनका धन भी हरण कर लिया गया, तब ये अतिशय दुखी होकर प्राण त्याग करने का विचार करने लगे। अत्यंत व्याकुल होने पर इन्हें स्मरण हो आया कि कभी ये धनार्जन हेतु जा रहे थे, तभी मार्ग में गंगा जी के तट पर कुछ विद्वानों के द्वारा माघ मास का माहात्म्य सुना था –माघे निमग्नाः सलिले सुशीते विमुक्त पापास्त्रिदिवं प्रयान्ति।।
माघ स्नान का महत्व
अर्थात माघमास में शीतल जल के भीतर डुबकी लगाने वाले मनुष्य पापमुक्त होकर स्वार्गलोक चले जाते हैं। सुब्रत ने अपना मन स्थिर कर नौ दिन तक माघ स्नान किया। दसवें दिन शीत से पीड़ित होकर प्राण त्याग दिए। उसी समय एक सुंदर विमान आया, जिस पर चढ़कर वे स्वर्गलोक चले गए। बहुत दिनों तक स्वर्ग सुखभोग कर पृथ्वीलोक में जन्म लिया। पुनः प्रयाग क्षेत्र में एक मास माघ मास में विधिपूर्वक स्नान करने पर पुनः ब्रह्मलोक प्राप्त किया।
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