Pratapgarh Accident घरौरा में कुएं में दबे मजदूरों को निकालते दमकल व पुलिस कर्मी। जागरण
जागरण संवाददाता, प्रतापगढ़। Pratapgarh Accident पसीना बहाकर और जान जोखिम में डालकर परिवार का पेट भरने वाले चार मजदूरों की जिंदगी की उम्मीदें कई घंटे तक कुएं में दबी रही। घरौरा गांव में रविवार को मिट्टी और ईंटों का मलबा गिरा तो दबे मेहनतकश चीखने-चिल्लाने की ताकत व हौसला भी खो बैठे। कराहने की आवाज सुनकर कुएं के ऊपर रहे स्वजन व गांव के लोग छटपटा रहे थे।
ग्रामीणों का बचाव कार्य में अथक योगदान
Pratapgarh Accident सरकारी व गैरसरकारी प्रयास से जब मजदूरों को करीब दो घंटे बाद निकाला जा सका तो दीपक की जिंदगी का प्रकाश जा चुका था। वहीं पर लग गया था कि इसकी सांस नहीं चल रही है। तब तक सैकड़ों लोग वहां जमा हो चुके थे। पुलिस वाले पूरा प्रयास करते दिखे। गांव के लोग भी मजदूरों को जिंदा दफन होने से बचाने के लिए जूझ गए। हर ओर अफरा-तफरी थी। मजदूरों की पत्नी, बच्चे, माता-पिता इतने चिंतित थे कि कुएं में कूद जाना चाहते थे। भला...अपनी आंखों के सामने उनको तिल-तिलकर मरते कैसे देख पाते। फिलहाल संयुक्त प्रयास ही रहा कि मौत केवल एक ही हुई, बाकी बचा लिए गए।
जल्दी निकारा, नाही एकौ जने न बचिहैं...
Pratapgarh Accident लालगंज प्रतिनिधि के अनुसार जल्दी आवा कुआं मा सब मजदूर गिरि के दबि गय अहैं। अरे यहमा तौ एकौ जने नहीं देखात अहैं काका..., बुलडोजर लावा, पुलिस का फोन करा, जल्दी निकारै कै जतन करा, नाहीं एकौ जने न बचिहैं...। लीलापुर के घरौरा गांव में रविवार दोपहर मची अफरातफरी के बीच ग्रामीणों की भीड़ जुटी थी। शोर के बीच जिसकी जो समझ में आ रहा था एक दूसरे को सलाह दे रहा था। हर किसी जुबां पर कुएं में मलबे में दबे चार मजदूरों की जिंदगी के लिए सकुशल निकलने की प्रार्थना थी।
अस्पताल में दीपक सरोज की मौत
गांव में मो. शमशाद के खेत में बने पुराने ट्यूबवेल के गोलाकार कुएं से ईंट निकालते समय अचानक बलुई मिट्टी धसक जाने से गए चारों मजदूरों के दब जाने से अफरा तफरी का माहौल था। करीब तीन घंटे तक चले रेस्क्यू के बाद सभी मजदूरों को बाहर निकाला गया। अस्पताल में मजदूर दीपक सरोज की मौत हो गई। पत्नी ममता, मां गीता, पिता श्यामलाल बदहवास थे। मृतक के बिलखते 10 वर्षीय पुत्र मयंक व आठ वर्षीय पुत्री दीपाली को कुछ सूझ नहीं रहा था।
दीपक भी गहरे कुएं से निकाल रहा था ईंट
रामपुर खजूर के धनीपुर निवासी दीपक सरोज अपने भाई धीरज तथा गांव के पिंटू सरोज व आकाश सरोज के साथ शनिवार से 20 फीट गहरे कुएं में चहली लगाकर ईंट निकालने का काम शुरू किया था। उस दिन करीब 10 फीट काम हुआ था। अगले दिन रविवार को सभी ने हंसते बोलते फिर काम शुरू किया तो किसी को क्या पता था कि हादसा हो जाएगा।
सबसे नीचे दबा था धीरज
मिट्टी धसकने से सबसे नीचे करीब 20 फीट पर धीरज दबा था। दीपक और आकाश लगभग 15 फीट मिट्टी के मलबे में दबे थे। सबसे पहले दीपक सरोज को बाहर निकाला गया था। हालत अधिक गंभीर होने से उसने अस्पताल में दम तोड़ दिया। दीपक दो भाइयों और एक बहन में सबसे बड़ा था। बहन विवाहिता है, जबकि भाई अविवाहित। उसका बेटा मयंक रामपुर खजूर प्राथमिक विद्यालय में कक्षा चार का छात्र है, जबकि आठ वर्षीय बेटी दिपाली कक्षा एक में पढ़ती है।
काहे सब रोवत अहैं माई
घरौरा गांव में हुए दर्दनाक हादसे के बाद पूरे गांव में मातम पसरा हुआ है। हर आंख नम है, हर चेहरा गम से भरा हुआ। इसी बीच एक दृश्य ऐसा था जिसने वहां मौजूद हर शख़्स का कलेजा चीर दिया। हादसे में जान गंवाने वाले मजदूर दीपक सरोज की आठ साल की बेटी दिपाली अपने पिता को ढूंढती हुई भीड़ के बीच भटकती रही। घर के बारह दरवाजे पर बैठी अपनी आजी को फूट-फूट कर रोते देख वह मासूमियत से पूछ बैठी काहे रोवत अहैं माई ? काहे एतना जने भीड़ लगाए अहैं? पापा का का भवा ब?
...वह कभी वापस नहीं आएंगे
दिपाली को क्या पता था कि जिस पापा के लौटने का उसे इंतज़ार है, वह अब कभी वापस नहीं आएंगे।उसकी यह मासूम आवाज़ सुनकर वहां मौजूद लोगों की आंखें छलक पड़ीं। किसी में इतना साहस नहीं था कि उस बच्ची को सच्चाई बता सके।हादसे ने न सिर्फ़ एक परिवार का सहारा छीना, बल्कि दिपाली जैसी मासूम बच्ची से पिता का साया भी हमेशा के लिए छीन लिया। गांव की महिलाओं ने उसे गोद में लेकर चुप कराने की कोशिश की, लेकिन हर बार उसकी जुबान पर बस एक ही सवाल था, पापा कहां हैं? यह हादसा एक परिवार ही नहीं, पूरे गांव के लिए ऐसा ज़ख़्म छोड़ गया है, जिसे भरने में वक्त लगेगा।
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