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जागरण संवाददाता, गोरखपुर। कूड़ाघाट में तिराहे पर पूरे सम्मान के साथ स्थापित लेफ्टिनेंट गौतम गुरुंग की प्रतिमा उस राह से गुजरने वाले हर व्यक्ति में राष्ट्रभक्ति का संचार करती है। राष्ट्र के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा देती है। मूल रूप से नेपाल के रहने वाले गुरुंग को गोरखपुर की पहचान से जोड़ती है।
उनके बहादुरी के किस्से आज भी गोरखपुर में गूंजते हैं। उनके गोरखपुर का ही वासी होने का अहसास कराते हैं। तिराहे के नाम के चलते उनके व्यक्तित्व व कृतित्व को याद करने के लिए मजबूर करते हैं।
23 अगस्त 1973 को देहरादून में जन्मे गौतम गुरुंग में बचपन से ही देश के लिए न्योछावर होने का जुनून था। इसी वजह से उन्होंने एमबीए करने के बाद भारतीय सेना का हिस्सा बनने का निर्णय लिया। इस क्रम में 3/4 गोरखा रायफल्स में कमीशन हुए। उन्हें पहली तैनाती जम्मू कश्मीर में मिली। उस समय गौतम के पिता गोरखपुर जीआरडी में तैनात थे।
चार अगस्त 1999 को पाकिस्तानी सैनिकों से कारगिल में मुठभेड़ चल रही थी। उसी दौरान तंगधार में युद्ध के दौरान दुश्मन की मिसाइल एक साथी के बंकर में घुस गई। साथी को संकट में देख गौतम उन्हें बचाने में जुट गए। इसी बीच एक मिसाइल ले. गौतम गुरुंग की कमर में लगी। वीरता और अदम्य साहस का परिचय देते हुए गौतम अपने आठ साथियों को तो बचाने में सफल रहे लेकिन खुद को नहीं बचा सके और 26 साल की उम्र में खुद का बलिदान कर दिया। उनके बलिदान के बाद भारत सरकार ने सेना पदक से सम्मानित किया।
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बलिदान के बाद जब लेफ्टिनेंट गौतम का शव गोरखपुर लाया गया तो उस दिन रक्षाबंधन का पर्व मनाया जा रहा था। गौतम की इकलौती बहन ने जब बलिदान हो चुके भाई की कलाई पर राखी बांधी तो उमड़ा सारा हुजूम रो पड़ा। उस समय गौतम के पिता पीएस गुरुंग भी सेना में ब्रिगेडियर थे। उन्होंने बेटे के पार्थिव शरीर को एक सैन्य अधिकारी की तरह लिया और पिता के रूप में मुखाग्नि दी।
शहर ने लोगों ने नेपाल के रहने वाले गौतम को अपना बेटा माना। कूड़ाघाट तिराहे पर उनकी प्रतिमा स्थापित कराई गई। इसके साथ ही तिराहे ही नहीं बल्कि देवरिया व कुशीनगर को ओर जाने वाली सड़क को भी उनके नाम की पहचान मिल गई। गौतम की इस बलिदानी को गोरखपुर आज भी याद करता है। उनके नाम को शहर से जोड़कर खुद को गौरवान्वित महसूस करता है।
हर राष्ट्रीय पर्व पर दी जाती है श्रद्धांजलि
लेफ्टिनेंट गौतम गुरुंग के साथी और उनके परिवार के लोग हर राष्ट्रीय पर्व पर उन्हेंं श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए गोरखपुर जरूर आते हैं। गुरुंग तिराहे पहुंचकर गोरखा रेजिमेंट के अधिकारी और सैनिक भी गौतम गुरुंग की बलिदानी को नमन करते हैं। इन अवसरों पर आमजन भी उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए जुटते हैं।प्रतिमा पर माल्यार्पण कर राष्ट्र के लिए उनके बलिदान को याद करते हैं। उस राह से गुजरने वाला कोई जुलूस बिना लेफ्टिनेंट गौतम को श्रद्धांजलि दिए बिना पूरा नहीं माना जाता है। |
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