मेघा उपाध्याय-
बेंगलुरु की फ्लाइट में हुई एक सामान्य-सी बातचीत ने मुझे बता दिया कि आम लोग भारतीय न्यूज़ मीडिया के बारे में क्या सोचते हैं।
मैं सफर कर रही थी। बगल की सीट पर बैठे व्यक्ति अपने मोबाइल पर यूट्यूब पर न्यूज़ देख रहे थे। जिस क्रिएटर को वह देख रहे थे, उसे मैं मीडिया जगत से जानती हूँ। अच्छा लगा, तो मैंने सहज ही पूछ लिया— “आपको इनका कंटेंट पसंद है?”
वह मुस्कुराए और बोले— “हाँ, अब मैं न्यूज़ सिर्फ यूट्यूब पर ही देखता हूँ। इंडिविजुअल क्रिएटर्स या डिजिटल जर्नलिस्ट्स। टीवी तो बिल्कुल नहीं।”
फिर बड़े शांत स्वर में उन्होंने जो कहा, वह मेरे भीतर कहीं टिक गया— “मुझे टीवी न्यूज़ से नफरत है। पिछले सात साल से टीवी न्यूज़ नहीं देखी। सब कुछ प्लान्ड लगता है— वही हेडलाइंस, वही नैरेटिव, बार-बार वही दोहराव।”
वे एक पल रुके और फिर बोले— “एक बार मैं टीवी न्यूज़ देख रहा था, तभी मेरे बच्चे ने पूछा— ‘पापा, ये आंटी स्क्रीन पर चिल्ला क्यों रही हैं?’ मैंने तुरंत चैनल बदल दिया।”
फिर उन्होंने कहा— “एक बच्चा भी समझता है कि खबरें शांति और शालीनता से दी जा सकती हैं। लेकिन टीवी एंकर्स चिल्लाते रहते हैं। इसका मेरी मेंटल हेल्थ पर असर पड़ता है, इसलिए मैंने टीवी छोड़ दिया।”
मैंने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने यह नहीं बताया कि मैं टीवी में काम करती हूँ। मैंने यह भी नहीं बताया कि मैं पत्रकार हूँ।
मेरे पास न बहस करने का मन था, न बचाव करने का, न सफाई देने का। और सच कहूँ तो, उनकी कही कुछ बातें पूरी तरह गलत भी नहीं लगीं।
हाँ, इसके जवाब में तर्क हो सकते हैं। हाँ, हकीकत इतनी सीधी नहीं होती। लेकिन एक इंसान के तौर पर, कभी-कभी मुझे भी ऐसा ही महसूस होता है।
मैं थकी हुई थी। मैं बस मुस्कुरायी और कहा— “हाँ, मैं सहमत हूँ।”
वह यूट्यूब पर न्यूज़ देखते रहे। और मैं सो गयी। लेकिन वह पूरी बातचीत मेरे साथ रह गई। इसलिए सोचा, इसे साझा करूँ।


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