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Allahabad HC की भरण-पोषण से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी, कहा- पत्नी की वजह से कमाई में पति बना अक्षम तो कैसा भत्ता

LHC0088 2026-1-24 14:56:48 views 771
  

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अंतरिम भरण पोषण की मांग में दाखिल याचिका खारिज करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की।



विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भरण पोषण से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि यदि पत्नी अपने कार्यों से पति की कमाई की क्षमता को प्रभावित करती है तो वह भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती। ऐसे में भरण-पोषण देने से पति के प्रति अन्याय होगा।
भरण पोषण का पत्नी को कानूनी अधिकार नहीं

कोर्ट ने कहा प्रत्येक पति का दायित्व है कि वह पत्नी का भरण पोषण करे, किंतु यह पत्नी का कानूनी अधिकार नहीं। यदि पति सक्षम नहीं है तो पत्नी गुजारा भत्ता मांगने की हकदार नहीं हैं। इस टिप्पणी के साथ अंतरिम भरण पोषण की मांग में दायर पत्नी की याचिका कोर्ट ने खारिज कर दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत शुक्ला की एकल पीठ ने दिया है।
आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पत्नी ने दायर की थी

मुकदमे से जुड़े तथ्यों के अनुसार पति डाक्टर वेद प्रकाश सिंह के खिलाफ यह आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पत्नी विनीता ने दायर की थी। इसमें याची ने अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश, पारिवारिक न्यायालय, पडरौना कुशीनगर के सात मई 2025 को पारित आदेश की वैधता को चुनौती दी थी।
जानें पूरा मामला

प्रतिवादी (डाक्टर वेद प्रकाश सिंह होम्योपैथी डाक्टर हैं और क्लीनिक चलाते थे। उनको 13 अप्रैल 2019 को क्लीनिक में याची विनीता के भाई और पिता सहित चार अन्य लोगों ने गालियां दीं और जान से मारने की धमकी दी। प्रतिरोध करने पर याची के भाई ने गोली चला दी, इससे प्रतिवादी को गंभीर चोट आई। गोली उनके रीढ़ की हड्डी में फंसी हुई है। चिकित्सकीय सलाह के अनुसार, इसे निकालने का प्रयास करने से पक्षाघात हो सकता है। चोट के कारण, प्रतिवादी न केवल आराम से बैठ नहीं सकते, बल्कि वे बेरोजगार भी हो गए हैं।
परिवार न्यायालय ने याचिका अस्वीकार कर दी थी

इसी आधार पर परिवार न्यायालय ने विनीता की अंतरिम भरण-पोषण की याचिका को अस्वीकार कर दिया था। हाई कोर्ट में याची के वकील ने प्रतिवादी की आर्थिक स्थिति पर जोर दिया, लेकिन वे तथ्यात्मक निष्कर्षों को चुनौती नहीं दे सके।
न्यायालय ने कहा...

न्यायालय ने कहा, पति का पत्नी का भरण-पोषण करना पवित्र कर्तव्य है, लेकिन इस मामले में प्रतिवादी की कमाई की क्षमता याची के कृत्य के कारण नष्ट हो गई है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कल्याण डे चौधरी बनाम रीता डे चौधरी नी नंदी (2017) व शमीमा फारूकी बनाम शाहिद खान (2015) मामलों का उल्लेख किया जिसमें वास्तविक कमाई की क्षमता मुख्य बात थी।
तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है भरण पोषण

कोर्ट ने कहा, परिवार न्यायालय के आदेश में कोई स्पष्ट अवैधता या सामग्री अनियमितता नहीं है। आवेदन भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125(1) के तहत किया गया था। कोर्ट ने जसबीर कौर सेहगल (एसएमटी) बनाम जिला न्यायाधीश, देहरादून एवं अन्य (1997) में सर्वोच्च न्यायालय के उस निर्णय को भी उद्धत किया जिसमें कहा गया है कि भरण पोषण की राशि तय करने के लिए कोई निश्चित सूत्र नहीं हो सकता। यह प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

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