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जब फायर फाइटर्स हमारे ‘तारणहार’ बने थे!

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राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली का अहम हिस्सा है, नोएडा। देश के अंदर जो शहर सबसे तेजी के साथ विकसित हो रहे हैं, उनमें से एक है नोएडा। हर क्षेत्र की महत्वपूर्ण कंपनियों के दफ्तर से लेकर बड़ी और प्रीमियम रिहाइशी सोसायटियां हैं यहां। गुड़गांव की तरह यहां भी अब पचीस करोड़ रुपये तक के अपार्टमेंट्स बिक रहे हैं।



नोएडा के जो सेक्टर सबसे प्रीमियम हैं, उनमें से एक है सेक्टर- 150, जिसमें रियल एस्टेट क्षेत्र से जुड़े सभी बड़े डेवलपर्स अपनी स्कीम लेकर आये हैं। इस सेक्टर को स्पोर्ट्स सिटी के तौर पर विकसित करने की योजना थी, लेकिन अभी ये खिचड़ी स्थिति में है। कुछ अपार्टमेंट्स बन गये हैं, तो कुछ निर्माण के दौर से गुजर रहे हैं। वहां खेल सुविधाएं विकसित नहीं हुई हैं, जिसे लेकर काफी विवाद भी हुआ, मामला कोर्ट में है।



इसी सेक्टर 150 में पिछले शुक्रवार की देर रात एक ऐसी घटना घटी, जिसने सबको झकझोर दिया। उस रात आईटी सेक्टर में काम कर रहा एक युवक गुड़गांव में अपने साथियों के साथ पार्टी करने के बाद नोएडा सेक्टर 150 स्थित अपने घर लौट रहा था।




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90 डिग्री का जानलेवा अंधा मोड़



घर लौटते समय उसकी कार एक ऐसे मोड़ से गुजरी, जहां टर्न 90 डिग्री का था। अंधेरा और कोहरा दोनों था, इसलिए कुछ समझ में नहीं रहा था। आसपास क्या था, दिख भी नहीं रहा था। कार ढंग से मुड़ने की जगह मामूली सी बैरिकेडिंग से टकराकर उस गड्ढे में गिर गई, जिसे एक नामचीन बिल्डर ने कभी किसी रिहाइशी इमारत का बेसमेंट बनाने के नाम पर खोदा था। बिल्डिंग तो बन नहीं पाई, लेकिन वहां गहरा गड्ढा जरूर मौजूद रहा। इसी गड्ढे में बरसात से लेकर तमाम स्रोतों से आया हुआ पानी जमा होता रहा, जिसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं गया, न बिल्डर का, न ही नोएडा प्राधिकरण का।



शुक्रवार रात बारह बजे के करीब जब युवराज मेहता की एसयूवी पानी से लबालब भरे इस गड्ढे में गिरी, उसके बाद वो तत्काल डूबी नहीं। 27 वर्षीय मेहता अपनी ग्रैंड विटारा से बाहर भी निकल आये। पानी पर तैर रही कार की छत पर वो खड़े हो गये। यही से युवराज ने अपने पिता को फोन किया कि उनके साथ हादसा हो गया है और उन्हें बचाने की कोशिश करें।



तेजी से पिता राजकुमार मेहता घटनास्थल पर पहुंचे। कार की छत पर खड़ा बेटा चिल्ला रहा था, अपने मोबाइल फोन की लाइट जलाकर इशारा भी कर रहा था। पिता ने तत्काल 112 नंबर पर फोन किया, पुलिस पेट्रोल कार भी थोड़ी देर में पहुंच गई। फायर ब्रिगेड़ की गाड़ी और देर से पहुंची, उसके बाद एसडीआरएफ की टीम पहुंची।



मदद मांगते हुए युवराज के जीवन की डोर टूट गई



युवराज धीरे- धीरे डूब रही अपनी कार पर खड़े होकर चिल्लाते रहे, उनकी आवाज किनारे आती रही, पिता बेबस होकर निहारते रहे, मौके पर आए जवानों और अधिकारियों से मदद की गुहार लगाते रहे, लेकिन युवराज मेहता को बचाने की कोई असरदार कोशिश नहीं हुई। पुलिस वाले पानी में घुस नहीं रहे थे, क्योंकि उन्हें तैरना नहीं आता था। फायर ब्रिगेड के जवान हिचक रहे थे कि कही पानी से भरे गड्ढे में सरिया न हो। ठंडी भी उन्हें सता रही थी, गहरे पानी में रात के अंधेरे में घुसने में भी हिचक हो रही थी। एक जवान किसी तरह घुसा भी, तो ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाया, लौटकर किनारे आ गया।



मदद की बाट जोहते- जोहते, चिल्लाते- चिल्लाते आखिरकार युवराज के जीवन की डोर टूट गई, वो अपनी कार के साथ पानी में डूब गये, जिसमें तब तक काफी पानी भर चुका था। कार के पानी में गिरने के करीब दो घंटे बाद युवराज की मौत हुई, सुबह साढ़े चार बजे लाश किसी तरह बाहर निकाली गई। कार चार दिन बाद मंगलवार को निकाली गई।



युवराज की मौत का जिम्मेदार कौन है?



सवाल उठता है कि युवराज की मौत का जिम्मेदार कौन है? युवराज की मौत किसी ऐसे दूरदराज के इलाके में नहीं हुई, जहां किसी का मदद के लिए जल्दी पहुंचना आसान नहीं था। युवराज की मौत तो ऐसी जगह हुई, जो न सिर्फ यूपी, बल्कि देश के सबसे महत्वपूर्ण शहरों में से एक है, दिल्ली से सटा हुआ है। नोएडा को सिर्फ यूपी के ग्रोथ इंजिन के तौर पर ही नहीं देखा जा रहा है, बल्कि भारत को भी इस शहर से काफी उम्मीदें हैं, एक बड़े टेक- इंडस्ट्रियल- रेसिडेंशियल हब के तौर पर।



नोएडा बसा भी है नियोजित शहर के तौर पर, इसके विकास के लिए जो अथॉरिटी है, उसी का शॉर्ट फॉर्म शहर का नाम भी है। यूपी को सबसे अधिक राजस्व की प्राप्ति यहां से होती है, पूरे देश भर से आए हुए लोग यहां रहते हैं, सारी बड़ी आईटी कंपनियों की भी उपस्थिति है यहां। ढेरों बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं, बड़े पैमाने पर आने की तैयारी में हैं।



ऐसे नोएडा में 27 साल के एक युवक की मौत हो जाए, वो भी इसलिए कि राहत और बचाव के लिए इकट्ठा हुए जवान या तो पूरी तरह प्रशिक्षित नहीं थे या फिर उनके पास ऐसे उपकरण नहीं थे, जिनके सहारे वो कोहरे से घिरे उस गड्ढे में रात के समय में युवराज की जान बचा सकें। कहां लापरवाही रही, क्या कमियां रही, ये एसआईटी की जांच से बाहर निकलेगा, जिसका गठन यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार ने किया है और जिसकी अध्यक्षता कर रहे हैं मेरठ जोन के एडिशनल डीजी।



इस घटना को गंभीरता से लेने का अहसास कराते हुए योगी सरकार ने सोमवार को नोएडा अथॉरिटी के सीईओ एम लोकेश का भी तबादला कर दिया, जिनके पास जिम्मेदारी थी, नोएडा में सारे विकास कार्यों और आधारभूत सुविधाओं की देखभाल की, उन्हें सुनिश्चित करने की। उस बिल्डर को भी गिरफ्तार किया गया है, जिसकी स्कीम गड्ढे वाली जगह पर बननी थी, लेकिन पूरी नहीं हो पाई, जानलेवा गड्ढ़ा बना रहा।



जब बाढ़ के गहरे पानी में डूबी हमारी नाव



इस पूरे घटनाक्रम के बारे में सोचते हुए मुझे याद आ रहा है बीस साल पहले का एक वाकया। 31 जुलाई 2006 का वो दिन था, जब अहमदाबाद के एक गांव गाणोल में बाढ़ की रिपोर्टिंग करते वक्त हमारी नाव काफी गहरे पानी में डूब गई थी।  सोचता हूं कि अगर उस दिन हमारे साथ ऐसे ही राहत और बचाव कर्मी होते, जैसे नोएडा में शुक्रवार की रात को जमा हुए थे युवराज को बचाने के लिए, तो हमारा क्या होता। सिहर जाता हूं सोचकर।



ये घटना इसलिए भी याद करना जरूरी है ताकि ये अहसास हो सके कि राहत और बचाव कार्य के लिए प्रशिक्षण, अनुभव और उपकरण कितने जरूरी हैं। कितना जरूरी है इस कार्य में लगे लोगों के बीच का समन्वय, साहस और सकारात्मक रवैया। कितना आवश्यक है, हर मौके की नजाकत के हिसाब से फटाफट फैसले लेना।



31 जुलाई, 2006 की उस दोपहर हम लोग गाणोल गांव में थे। उस समय अहमदाबाद से गुजरने वाली साबरमती नदी विकराल स्वरूप धारण किये हुए थी। धरोई डैम से पानी छूटा था, बारिश लगातार हो रही थी, इसलिए अहमदाबाद शहर का वासणा बैराज भी खोल दिया गया था। एक तरफ लगातार हो रही बारिश, दूसरी तरफ विकराल हो चुकी साबरमती, गाणोल जैसे जिले के दर्जनों गांव बाढ़ की चपेट में आये हुए थे।



गाणोल गांव के अंदर तो दो से तीन फीट पानी था, लेकिन असली समस्या उन लोगों की थी, जो साबरमती नदी के किनारे गुलाब की खेती करते थे और बाढ़ के पानी में फंस गये थे। शहर से पचास किलोमीटर दूर इन्हीं लोगों को बचाने के लिए अहमदाबाद नगर निगम की फायर एंड इमरजेंसी सर्विसेज की टीम आई हुई थी।



अहमदाबाद में रहते हुए, रिपोर्टिंग करते हुए तब तक सात साल हो चुके थे। 2001 के विनाशकारी भूकंप से लेकर 2002 के गुजरात दंगों के दौरान भी अहमदाबाद फायर ब्रिगेड के इन अधिकारियों और जवानों ने शानदार काम किया था। भूकंप के दौरान धराशाई हुई इमारतों और उनके मलबे में दबे लोगों को बाहर निकालने का चुनौतीपूर्ण काम हो, या फिर दंगे के दौरान हुई आगजनी में फंसे लोगों को बाहर निकालना या आग बुझाने का काम हो, घटना घटी नहीं कि मिनटों में फायर ब्रिगेड की टीम मौजूद और हालात पर तेजी से काबू पाने की कोशिश।



जिस रफ्तार और हौसले के साथ ये अधिकारी और जवान दिन- रात लगातार काम करते थे, उसकी तारीफ के लिए शब्द कम पड़ जाएं। अहमदाबाद नगर निगम के तत्कालीन चीफ फायर ऑफिसर थे एमएफ दस्तूर, एडिशनल चीफ फायर ऑफिसर राजेश भट्ट, तीन और अधिकारी- धीरेंद्र वर्मा,  जयेश खड़िया और मिथुन मिस्त्री। इनके साथ था सैकड़ों की तादाद में अत्यंत अनुभवी अग्निशमन कर्मचारियों का दस्ता, जो की इमरजेंसी कॉल आई नहीं कि फटाफट अपनी गाड़ियों में लदकर घटनास्थल की तरफ रवाना हो जाते, सायरन बजाते, रास्ता बनाते।



आप निश्चिंत हो सकते थे अगर फायर ब्रिगेड मौके पर पहुंच गई, तो आग उसके आगे नहीं बढ़ पाएगी या अगर कोई व्यक्ति फंसा हो, घिरा हो तो बाहर निकल ही जाएगा। हर परिस्थिति के हिसाब से इन अधिकारियों और कर्मचारियों की रणनीति होती थी, आखिर इनमें से ज्यादातर ऐसे थे, जो दूसरी या तीसरी पीढ़ी के राहत और बचाव कर्मी थे।



दस्तूर के पिता खुद चीफ फायर ऑफिसर रह चुके थे, भट्ट और मिस्त्री के पिता भी फायर सर्विस में उच्च पदों पर रहकर रिटायर हुए थे, इसलिए राहत और बचाव कार्य उनके डीएनए का हिस्सा था। यही बात बाकी कर्मचारियों के साथ भी लागू होती थी।



लगातार इनके काम को करीब से देखने, मौके पर जाकर रिपोर्टिंग करने की वजह से इन अधिकारियों और जवानों के साथ आत्मीय रिश्ता बन गया था। कई बार ऐसा होता था कि घटना घटी नहीं कि खुद बनाव की जगह के लिए जाते समय हमें भी फोन पर इशारा कर जाते थे ये अधिकारी, कर्मचारी या फिर हमें पता चला तो तत्काल घटनास्थल की जानकारी दे देते थे ये।



कभी कुछ छुपाना इनके स्वभाव का हिस्सा नहीं था, आखिर जो भी करते थे, सबके सामने करते थे, हिम्मत से करते थे। मुझे याद है वो भी दिन, जब अहमदाबाद में 2002 के दंगे के दौरान एक जगह आग बुझाने के लिए जाते समय उन्मादी भीड़ ने फायर ब्रिगेड का रास्ता रोक लिया था, तो चीफ फायर ऑफिसर की भूमिका में मौजूद दस्तूर ने खुद अपनी लाइसेंसी पिस्तौल तान दी थी उपद्रवियों के सामने। दस्तूर का रुख देखककर सामने कोई टिका नहीं, रास्ता खाली हुआ, दस्तूर की गाड़ी धमाधम आगे बढ़ती गई।



इनोवेशन इन अधिकारियों के स्वभाव में था। अहमदाबाद नगर निगम के मुख्यालय के पास दाणापीठ इलाके में ही फायर एंड इमरजेंसी सर्विसेज का भी मुख्यालय था। या तो अपने वर्कशॉप में ये खुद राहत और बचाव के लिए जरूरी नया उपकरण बनाते रहते थे या फिर देश- विदेश से नये उपकरण और गाड़ियां मंगाते रहते थे, उनको टेस्ट करते रहते थे। अहमदाबाद शहर तेजी से बढ़ रहा था, उंची इमारतें खड़ी हो रही थीं, भूकंप और दंगे ने कई तरह की और नई इमरजेंसी से निबटने की आदत डाल दी थी। भविष्य की चुनौतियों को लेकर भी आगाह थे ये।



इसलिए जब 31 जुलाई 2006 की उस दोपहर अहमदाबाद फायर ब्रिगेड के पीछे- पीछे हम पत्रकारों की टोली भी गाणोल गांव पहुंची, तो वहां दस्तूर को न देखकर मैंने मिस्त्री को पाया, जो तब अहमदाबाद शहर के बोडकदेव फायर स्टेशन की अगुआई कर रहे थे, फायर ऑफिसर के तौर पर। हर बड़ी इमरजेंसी के दौरान मौजूद रहने वाले दस्तूर उस दिन वहां नहीं थे, एक तो घटना बहुत बड़ी नहीं थी, दूसरी बेटी की तबीयत भी खराब थी, सोचा था डॉक्टर को दिखाकर मौके पर पहुंचता हूं, तब तक साथी बचाव कार्य आरंभ कर देंगे।



मिस्त्री के जरिये पता चला कि गाणोल गांव से करीब तीन किलोमीटर दूर साबरमती नदी के पट में गुलाब की खेती करने वाले कुछ लोग फंसे हुए हैं, जिन्हें निकालने के लिए गांव के सरपंच की तरफ से उन्हें कहा गया था। गाणोल गांव अहमदाबाद जिले की धोल्का विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा था, जहां से विधायक थे बीजेपी के वरिष्ठ नेता भूपेंद्रसिंह चूड़ासमा, जो गुजरात में नरेंद्र मोदी की तत्कालीन सरकार में कृषि विभाग के कैबिनेट मंत्री थे।



हम लोग जिस जगह खड़े थे, वहां से अगले तीन किलोमीटर तक लगातार पानी ही पानी नजर आ रहा था। लहरें भी काफी उठ रही थीं, इन्हीं के बीच से आवाज करती हुई अहमदाबाद फायर ब्रिगेड की वो बोट किनारे आई, जो कुछ किसानों को साबरमती के किनारे से बचाकर लाई थी। वहां वो उस उंची जगह पर थे, जो चारों तरफ पानी से घिरा हुआ था, टापू जैसा बन गया था। वहां कभी भी पानी सबको अपनी आगोश में ले सकता था, क्योंकि जल स्तर तेजी से बढ़ रहा था।



हम पत्रकारों ने सोचा कि जो साबरमती अमूमन सूखी रहती है, लेकिन बाढ़ के दौर में विकराल स्वरूप धारण किये हुए है, उसे देखा जाए। जो लोग फंसे हुए हैं, वहां क्या हालात हैं, उसे देखा जाए। कब तक बचाव और राहत कार्य पूरा होगा, इसकी समीक्षा की जाए, रिपोर्ट किया जाए, एक पत्रकार के नाते, ये भी सोच थी, । वो जमाना टेलीविजन में स्पॉट रिपोर्टिंग का था, बाढ़ और बरसात की कवरेज लोग चाव से देखते थे।



मैं उन दिनों स्टार न्यूज़ का गुजरात ब्यूरो चीफ था, मेरे साथ कैमरामैन के तौर पर पवन जायसवाल नामक युवक था, उस जमाने में वीडियो जर्नलिस्ट शब्द फैशनेबल नहीं हुआ था। जब नाव से किसान उतरे और वो वापस रवाना हो रही थी बाकी फंसे हुए लोगों को बाहर निकालने के लिए, तो मैंने मिस्त्री से अनुरोध किया कि हमें भी भेज दें, हम लोग उस टापू पर खड़े होकर बाढ़ की रिपोर्टिंग करते रहेंगे और आखिर में खुद भी लौट आएंगे।



मिस्त्री से संबंध पुराने हो चुके थे, इसलिए लिहाज करते हुए मिस्त्री ने हामी भरी। मैं पवन के साथ नाव में बैठा, तब तक विदेशी समाचार एजेंसी एएफपी के लिए फ्रीलांसिंग करने वाले फोटोग्राफर सैम नरीमन पंथकी भी आ गये। सैम भी फायर ब्रिगेड के अधिकारियों और जवानों के काफी करीब थे, इसलिए उन्हें भी बिठा लिया गया। हम पर जब बाकी पत्रकारों की निगाह पड़ी, तो अमित राठौड़ नामक एक कैमरामैन भी नाव पर सवार हो गया, जो उस वक्त इंडिया टीवी के लिए काम कर रहा था।



नाव की कैपेसिटी आठ लोगों की थी, चार पत्रकार सवार हो चुके थे। आम तौर पर राहत और बचाव दल के दो ही सदस्य नाव लेकर जाते थे, लेकिन मिस्त्री ने हम पत्रकारों को देखा तो अपने चार जवानों को बिठा दिया, इरादा ये था कि एक तो वो हमारा ध्यान रखेंगे, दूसरा ये कि टापू पर दो अतिरिक्त फायरकर्मियों के पहुंच जाने पर वहां लोगों को संभालना, उनका भरोसा बढ़ाना और आसान हो जाएगा।



जिस नाव पर हमलोग बैठे, वो नाव भी खास किस्म की। वो सामान्य लकड़ी की नाव या फाइबर बोट नहीं थी, बल्कि थी सॉलिड मेटल की बनी हुई, जिसमें एक पुरानी मर्सिडीज कार का इंजन लगा हुआ था। ये चीफ फायर ऑफिसर दस्तूर की अनगिनत  इजादों में से एक थी, ‘एयरक्राफ्ट नाव’ के तौर पर जानी जाती थी, बचाव कार्य के लिए तेज रफ्तार से जाने के लिए।



नाव को गति देने के लिए उसमें टर्बोप्रॉप जहाज की तरह पंखे लगाये गये थे। इन डैनों से जो हवा निकलती थी, वो नाव को तेजी से आगे बढा देती थी। नाव पर पर्याप्त मात्रा में ट्यूब रखे हुए थे, जो किसी भी याट पर किनारे टंगे रहते हैं। लाइफ जैकेट भी थे, एक तरफ एक और बड़ा बॉक्स रखा हुआ था, जरूरी उपकरण के साथ।



नाव का इंजन स्टार्ट हुआ और नाव तेजी से हमें आगे लेकर बढ़ चली। हमारी मंजिल तीन किलोमीटर दूर थी, वो टापू, जहां लोग फंसे हुए थे, चारों तरफ पानी से घिरे हुए थे। लेकिन जैसे- जैसे हम आगे बढ़े, प्रकृति का विकराल स्वरूप नजर आता गया। जहां तक निगाह जाती, पानी ही पानी। लहरें भी तेजी से उठ रही थीं। किनारे से डेढ किलोमीटर आगे हम बढ गये, लहरें और तेज होती गईं। लगा कि आगे जाना मुश्किल होगा। राहत और बचाव कार्य में लगे जवानों की चिंता थी कि जल्दी टापू पर नहीं गये, तो वहां फंसे लोग बेचैन हो जाएंगे, जहां पानी का स्तर बढ़ रहा था।



दूसरी तरफ उन्हें ये भी लग रहा था कि जिस तरह से लहरें लगातार उंची होती जा रही हैं, नाव डगमगा रही है, उसमें आगे बढ़ना और खतरा उठाने जैसा होगा। हमारी नाव पर जो बचाव कर्मी  सवार थे, वो काफी अनुभवी थे। इसलिए उन्हें लहरों से लेकर नाव की स्थिति का बिल्कुल सही अंदाजा था।



इस टीम के अगुआ थे मशरूभाई। बड़ी- बड़ी मूंछों वाले मशरूभाई, अहमदाबाद फायर एंड इमरजेंसी सर्विसेज में लीडिंग फायरमैन थे, जिन्हें फायर सर्विस में जमादार  भी कहा जाता है। हमेशा अलर्ट रहने वाले, लेकिन स्वभाव से हंसमुख। सुरेंद्रनगर जिले के कावड़िया गांव के कहने वाले मशरूभाई फायर ब्रिगेड कर्मयों के बीच ही नहीं, हम पत्रकारों के बीच भी काफी लोकप्रिय थे।



उनके साथ थे बच्चूभाई, महादेवभाई और सुरेश डामोर जैसे तीन और अग्निशमन कर्मचारी। सभी फुर्तीले, अपने काम में माहिर। नाव चल रही थी और ये आगे की तैयारी कर रहे थे, किनारे पर पहुंचने के बाद किसको वरीयता देनी है, लोग अपने बकरियों को भी लाने की जिद कर रहे थे, जो उनके साथ टापू पर फंसी हुई थीं।



जब लहरें और तेज हो गईं, तो मैंने पहली बार मशरूभाई को विचारशील मुद्रा में देखा। उन्होंने तय कर लिया कि फिलहाल नाव को आगे लेकर जाना ठीक नहीं है, इसे मोड़कर वापस चलते हैं, जब लहरें थोड़ी शांत होंगी, तो फिर वापस आएंगे। टापू पर राहत और  बचाव दल के बाकी सदस्य मौजूद थे, इन्हें पता था कि उनके साथी हर परिस्थिति में लोगों को संभाल लेंगे।



जब मशरूभाई ने इशारा किया कि हम वापस लौट रहे हैं, तो फिर मैंने सोचा कि चलो एक पीटीसी ही कर लेते हैं, दिखा देते हैं कि राहत और बचाव कार्य कितना चुनौतीपूर्ण है, जलमग्न हो चुके पूरे इलाके में, जहां लहरें तेज थीं, साबरमती नदी भयावह मुद्रा अख्तियार किये हुए थी।



यही विचार कर मैं नाव पर खड़ा हुआ, कैमरामैन पवन को भी इशारा किया कि फ्रेम बनाए। पवन खड़ा तो हुआ, लेकिन लहरों की हालत देखकर घबरा रहा था, उसके हाथ मे थमा कैमरा इधर – उधर जा रहा था, स्टेबल फ्रेम की कौन कहे।



पवन की ये हालत देखकर उसे एक तरफ भरोसा देना था कि घबराए नहीं, दूसरी तरफ पीटीसी यानी पीस टु कैमरा भी करना था, इसलिए उसको धीरे से झिड़की लगाई, डर रहा है क्या। पवन इसके बाद संभला, लेकिन बार- बार पीछे देख रहा था, क्योंकि लहरें पीछे उठ रही थीं, नाव डगमगा रही थी। उसका मुंह मेरे सामने था, मैं भी सामने दूर- दूर तक जलमग्न हुए इलाके को देख रहा था।



अभी पीटीसी शुरु ही करूं कि मशरूभाई की कड़क आवाज आई, नाव डूबने जा रही है, बचो। जबतक ये सुनें, तब तक नाव खचाक से पलट गई। सिर्फ इतना देख पाया कि पवन के हाथ से कैमरा छूटा और पवन ने एक ट्यूब रिंग को हाथ मे थामा। पानी में डूबते- डूबते भी मेरे हाथ एक ट्यूब लग गई, जो वहां पड़ी हुई थी।



अगले पंद्रह सेकेंड में क्या हुआ, कुछ भी याद नहीं। पानी ने एक बार उपर की तरफ फेंका, तो निगाह पड़ी फायरकर्मियों पर। जब तक हम कुछ और सोच पाते, उन्होंने हमारे चारों तरफ रिंग बना लिया। यही नहीं, फटाक से सैम नरीमन पंथकी और अमित को भी थामा, जिनके हाथ में बचने की कोई चीज लगी नहीं थी और घबराहट में अमित पानी के अंदर खुद हाथ पांव- मार रहे पंथकी की पीठ पर ही सवार हो गया था। उसे हटाते हुए हम चारों को संभालने में महज एक मिनट का समय लगा था मशरूभाई की अगुआई में चार सदस्यीय राहत और बचाव कर्मियों के इस दल को।



इनमें से किसी भी फायरकर्मी ने खुद कोई लाइफ जैकेट नहीं पहनी थी, चारोँ जबरदस्त तैराक थे, जबकि हम चारों पत्रकारों में से किसी को तैरना नहीं आता था। इसलिए पानी में उठती तेज लहरों के बीच उन्होंने हमें थामा, ताकि हम एक- दूसरे से छिटक कर अलग- अलग न बह जाएं। यही नहीं, हम सभी को लाइफ जैकेट भी उन्होंने पहनाई, जो बोट में बांध कर रखी गई थी। गोता लगाकार बोट में बंधी लाइफ जैकेट लाए थे हमारे लिए।



बोट नीचे जमीन में बैठ चुकी थी। जहां ये नाव डूबी थी, वहां करीब सत्रह फीट पानी था। तीन फायर फाइटर्स ने हमें थामा, और साथ में आश्वस्त भी किया, घबराएं नहीं, किसी भी कीमत पर डूबने नहीं देंगे आप लोगों को। चौथे ने फिर से गोता लगाया और नाव में बंधी हुई रस्सी के उस बंडल को खोल लिया, जो इस तरह की आपात स्थिति के लिए रखी गई थी, जिसकी कुल लंबाई थी डेढ़ सौ फीट।



रस्सी भी इस अंदाज में लपेटी गई थी कि उसे खोलने में बिल्कुल समय नहीं लगा। नाइलोन की उस रस्सी को सबसे पहले तो हम चारों पत्रकारों की कमर से एक के बाद लपेटा गया, फिर उसके दूसरे सिरे को कहां बांधा जाए, इसकी तलाश शुरु हुई। करीब सौ फीट दूर एक पेड़ की टहनी नजर आई। पेड़ पूरी तरह पानी में डूबा हुआ था, सिर्फ उसकी उपरी टहनी दिखाई दे रही थी। पेड़ से बांधना इसलिए जरूरी ताकि हम लोग एक ही जगह बने रहें, तेज धारा में इधर- उधर न खिसकें।



लहरें अब भी तेज थीं, हम लोग लगातार उपर- नीचे हो रहे थे, लेकिन एक दूसरे के आसपास ही, तीन बचाव कर्मी हमारे साथ, आराम से वो खड़े- खड़े तैर रहे थे, सिर्फ पानी को हल्का सा टैप करते हुए। उनके चेहरे पर कोई परेशानी नहीं, एकदम सहज। उनकी ये सहजता देखकर हम भी आश्वस्त हो रहे थे कि अब तक नहीं डूबे हैं, तो बच ही जाएंगे।



जिस जगह हमारी नाव डूबी थी, वो किनारे से डेढ़ किलोमीटर दूर। किनारे पर थे गांव वाले, बाकी पत्रकार साथी और फायर ब्रिगेड के अधिकारी- कर्मचारी। नाव की गड़गड़ाती हुई आवाज आनी बंद हो चुकी थी, उन्हें दूर से दिख गया था कि नाव डूब चुकी है, बीच में कोई अवरोध भी नहीं था, इसलिए किनारे खड़े लोगों को नाव डूबते हुए दिखाई दी थी।



लेकिन उन्हें ये पता नहीं था कि हमारी मौजूदा हालत क्या है। उन्हें अपनी हालत बताने का हमारे पास कोई साधन भी नहीं था। हम सबके कैमरे तो खराब हो ही चुके थे, मोबाइल फोन भी खो चुके थे। अपने साथ घट रहे अभी तक के सबसे खतरनाक पलों को कैद करने का कोई जरिया नहीं बचा था हमारे पास, कैमरे खराब, मोबाइल खराब।  किनारे खड़े लोगों को सूचना देने के लिए कोई वायरलेस सेट भी नहीं।



ऐसे में मशरूभाई ने सोचा कि एक साथी को किनारे की तरफ भेजा जाए, हालात और हमारी लोकेशन की जानकारी देने के लिए, ताकि मदद जल्दी से पहुंच पाए। लेकिन इससे पहले हम लोगों को और सुरक्षित करना जरूरी था। किसी तरह रस्सी का दूसरा हिस्सा सुरेश डामोर ने उस डूब चुके पेड़ के तने से बांधा, लंबी- गहरी डूबकी लगाते हुए। इससे ये सुनिश्चित हो गया कि हम लोग आगे कही बह नहीं सकते थे। रस्सी का एक हिस्सा पहले ही नीचे डूबी हुई नाव के सबसे उपरी हिस्से, जो विशालकाय पंखों के उपर की लाल लाइट थी, उसके बेस से बांध दिया गया था।



चालू रहने की हालत में इन पंखों से निकलने हवा किसी को भी उड़ा सकती थी या उनसे किसी का अंग टकरा जाए, तो वो कट सकता था, इसलिए पंखों के उपर स्टील की एक जाली भी कवर के तौर पर लगी हुई थी। ये जाली भी उस दिन बड़ी काम आई। उस जाली से भी रस्सी का बाकी बचा हुआ हिस्सा बांध दिया गया, ताकि अगर लाइट वाली रॉड टूट भी जाए, तो भी हम स्थिर रहें, जाली से बंधी हुई रस्सी हमें टिकाये रहे।



मानव स्वभाव कितना विचित्र हो सकता है, इसकी भी झलक हमें उस परिस्थिति में मिली। जब दोनों तरफ रस्सियां बंध गई, तो मशरूभाई ने ‘मावा’ की पुड़िया निकाली,  जो उनकी पॉकेट की जेब में कही पड़ी हुई थी। गिली हो चुकी थी जर्दा मसाले वाली ये पुड़िया, लेकिन आराम से होंठ मे दबाते दिखे मशरूभाई। ये हमें निश्चिंतता का अहसास कराने के लिए था, मानो कोई मुसीबत ही न हो, सब कुछ सामान्य हो, नियंत्रण में हो। इस तरह के भयावह हालात में, जहां पानी में हम उपर- नीचे हो रहे हों, तेज लहरों के कारण, भरोसा दिलाने की इससे बड़ी ऑप्टिक्स कुछ नहीं हो सकती थी।



ये सब करने के बाद ये तय हुआ कि कोई एक फायर फाइटर किनारे जाए और वहां हमारे हालात और लोकेशन की जानकारी दे, ताकि बचाव कार्य हो सके। किनारे तैर कर जाना भी आसान नहीं था, डेढ़ किलोमीटर तक तैर कर जाना, वो भी उस परिस्थिति में, जहां लहरें काफी तेज हों, धारा के विपरीत तैरने वाली परिस्थिति थी वो।



लेकिन चारों में सबसे फिट और युवा सुरेश डामोर ने हिम्मत की, वोलंटियर किया अपने को इस मिशन के लिए, गांव की तरफ तैर कर जाने के लिए, उस मंदिर के पास, जिसके किनारे से राहत और बचाव कार्य चल रहे थे, वही पर सभी लोग मौजूद थे। हम आशा भरी निगाहों से सुरेशभाई को तैर कर जाते देखते रहे।



ये सब होते- होते एक घंटे हो चुके थे। पानी में काफी समय से थे हमलोग, सर्दी भी लग रही थी, लेकिन तनाव थोड़ा कम हो चुका था। ये चिंता जरूर थी कि घर वालों पर क्या बीत रही होगी, अगर उन्हें हमारे मौजूदा हालात के बारे में पता चल गया हो तो, या फिर ये कि हम कब तक बाहर निकल पाएंगे। अगले दो घंटे के बाद शाम हो जाती और मुश्किल बढ़ जाती। साबरमती नदी आगे जाकर खंभात की खाड़ी के पास अरब सागर में मिलती है।



इन सवालों से हम दो- चार हो ही रहे थे कि दूर से एक मोटर की गूंजती हुई आवाज आई। ये आवाज थी उस फाइबर बोट में लगे यामाहा के शक्तिशाली इंजिन की, जिसके बल पर वो बोट हमारी तरफ तेजी से बढ़ रही थी। लहरों पर वो हिचकोले खा रही थी, लेकिन हमारी दिशा में आ रही थी। हम चातक भाव से देख रहे थे, हमारे पास आते- आते पंद्रह मिनट लग गये थे इस नाव को।



नाव नजदीक आई, तो देखा कि नाव को सफेद लुंगी- कुर्ता पहने एक सज्जन कुशलता से चला रहे हैं। माथे पर गोल, लाल टीका लगा हुआ, लग गया कि ये स्वामीनारायण संप्रदाय से जुड़े हुए होंगे। नाव हमारे करीब आई, हिचकोले खा रही थी, जब करीब आई तब भी। उस पर फायर ऑफिसर मिस्त्री खुद भी सवार थे।



एक- एक कर हम सबको नाव में चढ़ाया गया। पंथकी तो अपने भारी शरीर और कैमरे के बैग को हाथ में पकड़े हुए इतने थक चुके थे कि नाव पर सवार होने में भी परेशानी हुई, दो फायर फाइटर्स ने उन्हें धकेल कर नाव में डाला। करीब सवा घंटे के इंतजार के दौरान हमारे साथ मौजूद फायर सर्विसेज के कर्मचारियों ने एक के बाद एक गोते लगाकर हमारे सभी उपकरणों को भी हासिल कर लिया था, सिर्फ मोबाइल हाथ नहीं लग पाए थे, छोटे आकार और पानी की तेज धार के कारण। सबसे आखिर में बोट में चढ़े मशरूभाई।



इस तरह दुर्घटना के पूरे डेढ घंटे बाद हम किनारे पहुंचे, तो वहां मौजूद थे भूपेंद्रसिंह चूड़ासमा। हम लोग भींगे थे, लेकिन उन्होंने गले लगा लिया। आंखों में आंसू थे, कह रहे थे कि अगर आप लोगों को कुछ हो जाता, तो मैं क्या मुंह दिखाता। यही बात उन्होंने फायर ऑफिसर मिस्त्री को भी कही थी और किसी भी कीमत पर हमें तत्काल बचाने के लिए कहा था।



इन दोनों से हमें पता चला कि हमारे बचाव के लिए फाइबर बोट इतनी तेजी से कैसे आई। पता ये चला कि जैसे ही हमारी नाव डूबी, किनारे खड़े मिस्त्री और बाकी लोगों को ये दिख गया। पीले और लाल रंग की हमारी ‘एयरक्राफ्ट बोट’ दूर से नजर आ जाती थी, अपने विशाल पंखों और गरजती हुई आवाज से।



इसलिए जैसे ही हमारी ये नाव डूबी, मिस्त्री ने नजदीक के एक गांव में बचाव कार्य कर रहे स्वामीरायण संप्रदाय के उस फुलटाइम वोलंटियर को सूचना दी, जो बाढ़ के हालात में लगातार लोगों को बचाने, सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का काम करते थे। ये वोलंटियर थे, अरुण भगत, जो अरुणी महाराज के तौर पर जाने जाते थे और बीएपीएस नामक उस संस्थान से जुड़े हुए थे, जिस संस्थान ने दुनिया भर में सबसे अधिक हिंदू मंदिर बनाए हैं, अक्षरधाम नाम से।



  सफेद पोशाक में ये व्यक्ति अरुणी महाराज हैं, जो बीएपीएस के पूर्णकालिक स्वयंसेवक हैं और जिन्होंने सुरक्षित बचाव अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।



इस संस्थान का ट्रेनिंग सेंटर है सारंगपुर, जहां ‘संकट मोचन’ हनुमान का एक मंदिर भी है, जिसकी व्यवस्था भी बीएपीएस के साधु और स्वयंसेवक ही देखते हैं। सारंगपुर मंदिर से जुड़े और समाज सेवा में हमेशा आगे रहने वाले अरुणी भगत, गेरुआ वस्त्र धारण करना चाह रहे थे, संन्यासी बनना चाह रहे थे, लेकिन संस्था के तत्कालीन अध्यक्ष प्रमुख स्वामी के कहने पर वो सफेद वस्त्र में ही रहे, लेकिन संन्यासी जैसे ही बने रहे, घर- परिवार से कोई नाता नहीं, पूरे समय सेवा कार्य।



उन्हीं अरुणी महाराज को जैसे ही हमारे बारे में पता चला, अपनी फाइबर वोट को किनारे लाकर ट्रॉली पर रखा और फटाफट गाणोल गांव आ गये। यहां ट्रॉली से नाव उतारी और फिर इंजन गर्जाया और हमारी तरफ तेजी से आ गये। लहरों के बीच नाव को लेकर आना आसान काम नहीं था, उसमें भी तब जब एक मजबूत नाव पहले ही डूब चुकी हो। लेकिन जब जोश हो और दिल में बचाने का भाव हो, तो डर नहीं लगता।



यही जज्बा था, जिसकी वजह से अरुणी भगत और उनके साथ आए फायर ब्रिगेड के अधिकारी- कर्मचारी हमारी नाव डूबने के डेढ घंटे के अंदर हमें बचाकर वापस ले आए। ये उतना ही समय था, जितने समय तक पानी में फंसा रहा था युवराज मेहता नामक युवक, 16 जनवरी की रात नोएडा के सेक्टर 150 में, पानी से भरे हुए उस गड्ढे में, जहां बचाव कर्मियों और उसके बीच की दूरी डेढ किलोमीटर नहीं, बल्कि कुछ फीट थी।



सवाल उठता है कि फिर आखिर क्यों नहीं बच पाया युवराज पिछले हफ्ते और कैसे बच गये थे हम लोग बीस साल पहले। अगर कोई फर्क था, तो ये कि जिन लोगों ने हमें बचाया था, वो अपने फन में माहिर थे, उन्हें पानी से डर नहीं लगता था, बल्कि पानी पर खेलते थे वो। जब उन्होंने फायर फाइटर्स के तौर पर अहमदाबाद में नौकरी ज्वाइन की थी, तो उनकी सेवा की बुनियादी शर्त ही थी अच्छा तैराक होना, पांच मिनट में दो सौ मीटर तैर जाना।



इसलिए अहमदाबाद फायर एंड इमरजेंसी सर्विसेज के इन जवानों को अपनी चिंता कभी नहीं थी, वो चिंतित थे हमारे लिए। और सिर्फ चिंता नहीं, बचाने के लिए तेजी से उठाये थे उन्होंने कदम, दिया था सूझबूझ, साहस और समन्वय का परिचय। काश, नोएडा में भी उस रात कोई मशरूभाई होते, कोई महादेवभाई होते, कोई बच्चूभाई होते, कोई सुरेशभाई होते, या फिर पूरे बचाव की रणनीति और अगुआई करने के लिए कोई मिथुन मिस्त्री जैसे दमकल विभाग के अधिकारी होते, या फिर अरुणी भगत जैसे समर्पित बीएपीएस के वोलंटियर। ये सभी फरिश्ते थे, जो 31 जुलाई 2006 के उस दिन हमें मिले थे, 16 जनवरी 2026 की रात ऐसा कोई फरिश्ता युवराज को हासिल नहीं हुआ।
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