सरकारी योजनाओं की पहुंच सारंडा के इस परिवार तक नहीं।
परमानंद गोप, नोवामुंडी (पश्चिमी सिंहभूम)। पश्चिमी सिंहभूम जिले के अति नक्सल प्रभावित सारंडा वन क्षेत्र में बसे सैकड़ों आदिवासी परिवार आज भी विकास से कोसों दूर हैं। राज्य गठन को वर्षों बीत चुके हैं, लेकिन इन जंगलों में रहने वाले लोगों की जिंदगी आज भी पूरी तरह जंगल पर निर्भर है।
लाल चींटी, सूखी लकड़ी और पत्ते बेचकर किसी तरह जीवन यापन करने वाले इन परिवारों को न तो अब तक वन पट्टा मिला है और न ही सुरक्षित व सम्मानजनक जीवन।
जंगल में कैद जिंदगी
नोवामुंडी प्रखंड की पेटेता पंचायत अंतर्गत बेड़ा राईका के घने जंगलों में रहने वाला घनश्याम मारली का परिवार दर्दनाक सच्चाई की जीवंत मिसाल है। यह परिवार बीते चार दशकों से अधिक समय से जंगल में रह रहा है, लेकिन सरकारी कागजों में उसका कोई अस्तित्व नहीं है।
घनश्याम मारली के पिता स्वर्गीय अर्जुन मारली 1980 के दशक में गोइलकेरा प्रखंड के बाय बोरोय गांव के टुनिया टोला से सारंडा आए थे। उम्मीद थी कि सरकार उन्हें जमीन देगी और परिवार सुरक्षित जीवन जी सकेगा।
इसी उम्मीद में उन्होंने जंगल के बीच एक झोपड़ी बनाकर रहना शुरू किया। लेकिन समय बीतता गया, सरकारें बदलती रहीं और आज 45 साल बाद भी मारली परिवार को वन पट्टा नहीं मिल सका।
300–400 रुपये की रोजी-रोटी
पिता के निधन के बाद घनश्याम मारली अपनी पत्नी जेमा मारली और चार बेटों राहुल, सूरज, अर्पित और कृष्णा के साथ उसी जंगल में जीवन गुजार रहे हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय है।
जंगल से लाल चींटी, सूखी लकड़ी और पत्ते इकट्ठा कर ये लोग पैदल ही गुवा, नोवामुंडी, बड़ाजामदा और जेटेया के साप्ताहिक हाट पहुंचते हैं। दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद भी आमदनी केवल 300 से 400 रुपये तक सीमित रहती है।
नदी ही पानी का सहारा
भोजन की कमी होने पर परिवार जंगल से लाए गए साग-सब्जी पर ही निर्भर रहता है। जंगल के निचले इलाके में बहने वाली एक नदी ही पूरे साल स्नान और पीने के पानी का एकमात्र सहारा है।
परिवार ने कुछ मुर्गे और बकरियां भी पाल रखी हैं। इन्हें बेचकर हाल ही में झोपड़ी को टीन शेड में बदला गया, लेकिन जीवन की असुरक्षा और अभाव जस का तस बना हुआ है।
वन पट्टा के नाम पर ठगी
सारंडा क्षेत्र में वन पट्टा दिलाने के नाम पर ठगी करने वाले दलालों की भरमार है। ग्रामीणों से जिला मुख्यालय से लेकर राजधानी तक दौड़-धूप और कागजी कार्रवाई के नाम पर पैसे वसूले जाते हैं। आधार कार्ड की प्रतियां ली जाती हैं, बैठकों का आयोजन होता है, लेकिन पैसे कहां खर्च हुए और फाइल कहां अटकी है, इसकी कोई जानकारी ग्रामीणों को नहीं मिलती।
कई ग्रामीणों ने आज तक प्रखंड विकास पदाधिकारी या अंचल अधिकारी तक को नहीं देखा है। स्थानीय जनप्रतिनिधि और विभागीय अधिकारी भी इन दुर्गम जंगल गांवों तक पहुंचने से कतराते हैं।
अनपढ़ माता-पिता, बच्चों के लिए बेहतर भविष्य का सपना
घनश्याम मारली और उनकी पत्नी जेमा मारली दोनों निरक्षर हैं, लेकिन वे अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर जिम्मेदार नागरिक बनाना चाहते हैं।
उनका सात वर्षीय बेटा राहुल मारली रोजाना लगभग पांच किलोमीटर दूर बेड़ा राईका गांव के प्राथमिक विद्यालय तक पैदल आता-जाता है। स्कूल जाने का रास्ता घना और सुनसान जंगल से होकर गुजरता है, जहां जंगली जानवरों का खतरा हर समय बना रहता है।
बीमारी, ठंड और अंधेरे से संघर्ष
बीमारी की स्थिति में परिवार के पास ओझा-गुनी के अलावा कोई विकल्प नहीं होता, क्योंकि शहरी अस्पतालों तक पैदल पहुंचना संभव नहीं है।
ठंड के दिनों में ओढ़ने के लिए पर्याप्त कपड़े नहीं होते, ऐसे में पुआल और चटाई ही सहारा बनती है। बिजली के अभाव में रात के अंधेरे को दूर करने के लिए लकड़ी जलाकर रोशनी की जाती है।
कब मिलेगा हक?
सारंडा के जंगलों में बसे मारली परिवार जैसे सैकड़ों परिवार आज भी सरकार से सिर्फ इतना सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर उन्हें कब उनका हक मिलेगा।
क्या जंगल में जन्म लेना, जंगल में जीना और जंगल में ही जीवन खत्म कर देना ही उनकी नियति है, या कभी विकास की रोशनी इन घने जंगलों तक भी पहुंचेगी।
लाल चींटी का क्या होता है, कैसे खाते हैं?
लाल चींटी (लाल चुटकी / चापड़ा / चटनी चींटी) आदिवासी इलाकों में सिर्फ एक कीट नहीं, बल्कि खाद्य पदार्थ और आजीविका दोनों है। झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, बिहार और मध्य भारत के जंगलों में इसे परंपरागत रूप से खाया जाता है।
शहरों में जिसे लोग अजीब या घिनौना समझते हैं, वही लाल चींटी आदिवासी समाज के लिए भोजन, दवा और रोजगार तीनों है। लेकिन यही निर्भरता उनकी मजबूरी भी है, क्योंकि आज भी कई परिवारों के पास जमीन, रोजगार और सरकारी सुविधाएं नहीं हैं।
लाल चींटी और उसके अंडों (जिसे स्थानीय भाषा में चापड़ा, कैरी, हिलया या रानी चींटी के अंडे कहा जाता है) का इस्तेमाल भोजन में होता है। इनमें प्रोटीन, आयरन और मिनरल्स भरपूर होते हैं। यही वजह है कि जंगलों में रहने वाले लोग इसे पोषण का बड़ा स्रोत मानते हैं।
लाल चींटी कैसे पकड़ी जाती है
. जंगल में पेड़ों पर बने लाल चींटी के घोंसले से इन्हें इकट्ठा किया जाता है
. सूखी टहनी या पत्तों से घोंसला हिलाकर बर्तन या पत्तल में गिराया जाता है
. बाद में चींटियों और उनके अंडों को अलग किया जाता है
लाल चींटी कैसे खाते हैं
आदिवासी समाज में लाल चींटी खाने के कई पारंपरिक तरीके हैं।
लाल चींटी और उसके अंडों को सिलबट्टे पर नमक, हरी मिर्च, लहसुन और कभी-कभी इमली के साथ पीसा जाता है। यह चटनी तीखी और खट्टी होती है और चावल या मड़ुआ की रोटी के साथ खाई जाती है।
चींटियों और उनके अंडों को हल्का भूनकर नमक-मिर्च के साथ खाया जाता है। कई जगह इसे साग की तरह भी इस्तेमाल किया जाता है।
कुछ समुदाय लाल चींटी के अंडों को साग या सब्जी में मिलाकर पकाते हैं, जिससे स्वाद के साथ पोषण भी बढ़ता है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार लाल चींटी की चटनी सर्दी-जुकाम, भूख न लगने और शरीर की कमजोरी में फायदेमंद मानी जाती है।
बाजार में कीमत
साप्ताहिक हाटों में लाल चींटी और उसके अंडे 200 से 400 रुपये प्रति किलो तक बिकते हैं। यही वजह है कि जंगल पर निर्भर परिवार इसे बेचकर अपनी आजीविका चलाते हैं। |
|