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भारत का मीडिया : गिरती साख

deltin55 8 hour(s) ago views 3
   
      

भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा पिछले एक दशक में पेशेवर मानकों से लगातार नीचे गिरा है। अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता सूचकांकों में भारत की स्थिति लगातार खराब हुई है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत कई वर्षों से निचले पायदानों पर बना हुआ है। यह गिरावट केवल सरकारी दबाव का संकेत नहीं है, बल्कि मीडिया संस्थानों की आंतरिक विफलताओं को भी उजागर करती है।





भारतीय मीडिया की अविश्वसनीयता किसी एक घटना, सरकार या पत्रकार समूह का परिणाम नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही संस्थागत गिरावट का नतीजा है।





1990 के बाद मीडिया का तीव्र व्यावसायीकरण हुआ। समाचार को सार्वजनिक हित की गतिविधि के बजाय एक उत्पाद की तरह देखा जाने लगा। टीआरपी, क्लिक और विज्ञापन राजस्व पत्रकारिता के मूल मानकों—सत्यापन, संतुलन और सार्वजनिक जवाबदेही—से ऊपर रखे गए। यह बदलाव कोई धारणा नहीं, बल्कि विज्ञापन-आधारित राजस्व मॉडल और न्यूज़रूम की बदली हुई प्राथमिकताओं से प्रमाणित तथ्य है।





मुख्यधारा के टीवी चैनलों में ख़बर और मनोरंजन की रेखा लगभग समाप्त हो चुकी है। स्टूडियो डिबेट्स में तथ्य-जांच की जगह शोर, उत्तेजना और पूर्वनिर्धारित निष्कर्षों ने ले ली है। कई मामलों में अदालतों ने बाद में यह स्पष्ट किया कि मीडिया ट्रायल के दौरान तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा गया या अधूरा प्रस्तुत किया गया। यह स्थिति पत्रकारिता की जिम्मेदारी से सीधा विचलन दर्शाती है।





प्रिंट और डिजिटल मीडिया में कॉरपोरेट और राजनीतिक स्वामित्व का बढ़ता प्रभाव भी स्पष्ट है। बड़े मीडिया समूहों के मालिकाना ढांचे सार्वजनिक रूप से ज्ञात हैं और उनके व्यावसायिक–राजनीतिक हित संपादकीय स्वतंत्रता को सीमित करते हैं। यह कोई अनुमान नहीं, बल्कि कंपनियों के शेयरहोल्डिंग पैटर्न और सार्वजनिक घोषणाओं से सिद्ध तथ्य है।





टीवी न्यूज़ की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है। अधिकांश प्राइम टाइम डिबेट्स में न तो शोध होता है, न संदर्भ और न ही विशेषज्ञता। विषयों का चयन इस तरह किया जाता है कि वे अधिकतम भावनात्मक उत्तेजना पैदा करें—धार्मिक पहचान, राष्ट्रवाद, अपराध या चरित्र हनन जैसे मुद्दे प्राथमिकता बन जाते हैं।





कई स्वतंत्र अध्ययनों और न्यायालयों की टिप्पणियों में यह सामने आया है कि मीडिया ने अनेक मामलों में जांच एजेंसियों से पहले ही दोष सिद्ध कर दिया, जिसे बाद में न्यायिक प्रक्रियाओं ने खारिज कर दिया। यह मीडिया की संस्थागत गैर-जिम्मेदारी का प्रत्यक्ष प्रमाण है।







प्रिंट मीडिया, जिसे कभी अपेक्षाकृत संतुलित माना जाता था, वह भी इन दबावों से अछूता नहीं रहा। बड़े अख़बार समूहों की आय का बड़ा हिस्सा सरकारी विज्ञापनों, कॉरपोरेट विज्ञापनों और प्रायोजित सामग्री से आता है। यह तथ्य सार्वजनिक वित्तीय रिपोर्टों और विज्ञापन वितरण के आँकड़ों से स्पष्ट है। ऐसी संरचना में सत्ता या बड़े कॉरपोरेट हितों के खिलाफ निरंतर और गहन रिपोर्टिंग करना संस्थागत रूप से कठिन हो जाता है।





इसका परिणाम यह हुआ कि बेरोज़गारी, पोषण, श्रम अधिकार और पर्यावरण संकट जैसे गंभीर सामाजिक–आर्थिक मुद्दे मुख्यधारा की सुर्खियों से लगभग गायब हो गए।





डिजिटल मीडिया ने आरंभ में उम्मीद जगाई थी, क्योंकि वहां प्रवेश की बाधाएँ कम थीं। लेकिन समय के साथ यहां भी एल्गोरिदम-आधारित कंटेंट, सनसनीखेज शीर्षक और विचारधारात्मक ध्रुवीकरण हावी होता गया। सोशल मीडिया पर फैलने वाली अप्रमाणित सूचनाएँ कई बार बिना सत्यापन के न्यूज़ पोर्टलों तक पहुँच जाती हैं। यह केवल नैतिक विफलता नहीं, बल्कि तेज़ी से प्रकाशित करने की प्रतिस्पर्धा का परिणाम है—जिसे कई पत्रकार स्वयं सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर चुके हैं।





पत्रकारों की कार्य स्थितियाँ भी इस संकट का एक महत्वपूर्ण पहलू हैं। बड़े पैमाने पर अनुबंध आधारित नियुक्तियाँ, कम वेतन, नौकरी की असुरक्षा और संपादकीय हस्तक्षेप ने स्वतंत्र रिपोर्टिंग को कमजोर किया है। प्रेस काउंसिल और एडिटर्स गिल्ड जैसी संस्थाओं की सीमित प्रभावशीलता के कारण आत्म-नियमन लगभग निष्प्रभावी हो गया है।





इसके बावजूद यह तथ्य भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि भारत में आज भी कुछ पत्रकार और प्लेटफॉर्म जोखिम उठाकर तथ्यपरक रिपोर्टिंग कर रहे हैं—ग्राउंड रिपोर्ट्स, डेटा आधारित विश्लेषण और सत्ता से असहज सवाल पूछते हुए। लेकिन उनकी पहुँच सीमित है और उन्हें अक्सर कानूनी, आर्थिक और राजनीतिक दबावों का सामना करना पड़ता है।





इस पूरे परिदृश्य का निष्कर्ष स्पष्ट है। भारतीय मीडिया का संकट विश्वसनीयता के पतन, संरचनात्मक निर्भरता और पेशेवर मूल्यों के क्षरण का संकट है। यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही है कि भारतीय मीडिया का एक बड़ा और प्रभावशाली हिस्सा आज अपने दायित्वों पर खरा नहीं उतर रहा। लेकिन यह पतन न तो एक दिन में आया है और न ही इसका समाधान केवल व्यक्तिगत नैतिकता से संभव है। इसके लिए मीडिया के स्वामित्व, राजस्व मॉडल और नियामक ढांचे पर गंभीर और ईमानदार पुनर्विचार आवश्यक है।




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