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अगर आप भी करा रहे हैं मोबाइल नंबर पोर्ट, तो हो जाएं सावधान

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मोबाइल नंबर पोर्ट



जागरण संवाददाता, आरा(भोजपुर)। अगर आप मोबाइल नंबर पोर्ट कराने की सोच रहे हैं, तो सतर्क हो जाना बेहद जरूरी है। एक छोटी-सी लापरवाही आपको लाखों रुपये की ठगी का शिकार बना सकती है। आरा साइबर पुलिस ने मोबाइल नंबर पोर्टिंग के जरिए ठगी करने वाले एक अंतरराज्यीय गिरोह का खुलासा करते हुए दो शातिर भाइयों को गिरफ्तार किया है। दोनों आरोपी नवादा जिले के रहने वाले बताए जा रहे हैं और इनके तार बिहार व झारखंड तक फैले हुए थे।
मोबाइल नंबर पोर्टिंग बन रहा ठगी का नया हथियार

साइबर अपराधी अब मोबाइल नंबर पोर्टिंग को ठगी का आसान जरिया बना रहे हैं। आरोपी पहले आम लोगों का मोबाइल नंबर अपने नाम पर पोर्ट कराते थे, फिर उसी नंबर से बैंक, यूपीआई और अन्य डिजिटल सेवाओं तक पहुंच बना लेते थे।

इसके बाद खातों से लाखों रुपये की निकासी कर ली जाती थी। इस तरीके से लोगों को तब तक भनक भी नहीं लगती, जब तक उनके खाते खाली नहीं हो जाते।
आरा साइबर पुलिस की बड़ी कार्रवाई

आरा साइबर थाने में दर्ज शिकायतों के आधार पर पुलिस ने गहन जांच शुरू की। तकनीकी साक्ष्यों और कॉल डिटेल्स के आधार पर पुलिस ने नवादा निवासी दो सगे भाइयों को गिरफ्तार किया।

पूछताछ में दोनों ने स्वीकार किया कि वे लंबे समय से इस तरह की ठगी को अंजाम दे रहे थे। पुलिस के अनुसार, गिरोह मोबाइल पोर्ट कराने के नाम पर लोगों की निजी जानकारी हासिल करता था।
लाखों रुपये नकद और कई सामान बरामद

गिरफ्तार आरोपियों के पास से पुलिस ने करीब 98 हजार रुपये नकद, 11 मोबाइल फोन, एक लैपटॉप, एक बायोमेट्रिक डिवाइस, फर्जी दस्तावेज, कई सिम कार्ड और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद किए हैं।

इन उपकरणों का इस्तेमाल मोबाइल नंबर पोर्टिंग और ओटीपी हासिल करने के लिए किया जाता था। पुलिस को आशंका है कि गिरोह ने अब तक कई राज्यों में ठगी की वारदातों को अंजाम दिया है।
ग्रामीणों और ग्राहकों को बनाते थे निशाना

पुलिस जांच में सामने आया है कि आरोपी खासतौर पर ग्रामीण इलाकों और कम तकनीकी जानकारी रखने वाले लोगों को निशाना बनाते थे।

वे सरकारी योजनाओं, केवाईसी अपडेट या नेटवर्क समस्या का हवाला देकर लोगों से मोबाइल नंबर और ओटीपी हासिल करते थे। इसके बाद बिना पीड़ित की जानकारी के नंबर पोर्ट कर लिया जाता था।
ठगी के बाद तुरंत निकाल लेते थे पैसे

मोबाइल नंबर पोर्ट होते ही अपराधी बैंक खातों और यूपीआई ऐप्स का नियंत्रण अपने हाथ में ले लेते थे। ओटीपी उनके पास पहुंचने लगता था, जिससे वे मिनटों में खाते से पैसा निकाल लेते थे। कई मामलों में पीड़ितों को तब जानकारी मिली, जब उनके फोन पर नेटवर्क बंद हो गया या बैंक से मैसेज आया।
पुलिस कर रही नेटवर्क की गहन जांच

आरा साइबर पुलिस का कहना है कि यह गिरोह अकेले काम नहीं कर रहा था। इसके पीछे एक बड़ा नेटवर्क हो सकता है, जिसकी जांच की जा रही है।

पुलिस यह भी पता लगा रही है कि किन-किन मोबाइल दुकानों या एजेंटों की मिलीभगत से पोर्टिंग कराई गई। अन्य राज्यों से भी संपर्क कर पुराने मामलों का मिलान किया जा रहा है।
अगर आप भी पोर्ट करा रहे हैं तो बरतें सावधानी

साइबर पुलिस ने आम लोगों को सलाह दी है कि मोबाइल नंबर पोर्ट कराते समय पूरी सतर्कता बरतें। किसी अनजान व्यक्ति को ओटीपी, आधार या केवाईसी से जुड़ी जानकारी न दें।

केवल अधिकृत मोबाइल स्टोर या कंपनी के आधिकारिक माध्यम से ही पोर्टिंग कराएं। किसी भी संदेह की स्थिति में तुरंत पुलिस या साइबर हेल्पलाइन से संपर्क करें।
साइबर अपराध से बचाव ही सबसे बड़ा उपाय

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि साइबर अपराध के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है। मोबाइल नंबर आज बैंकिंग और डिजिटल पहचान का अहम हिस्सा बन चुका है।

ऐसे में थोड़ी सी सावधानी आपको बड़ी आर्थिक क्षति से बचा सकती है। पुलिस ने लोगों से अपील की है कि वे सतर्क रहें और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत सूचना दें।
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