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Delhi Blast: गाजियाबाद में शिक्षा की आड़ में न हो आतंकी साया, संस्थानों को सुरक्षित करने की जरूरत

Chikheang 2025-12-7 13:08:39 views 1259
  

सांकेतिक तस्वीर।  



जागरण संवाददाता, गाजियाबाद। फरीदाबाद की अल फलाह मेडिकल यूनिवर्सिटी का नाम आतंकवाद के गढ़ के रूप में सामने आया था। इसी यूनिवर्सिटी में आतंकियों को पनाह मिली। यहां नर्सरी तैयार हुई और इसके चलते दिल्ली के लाल किले के सामने धमाका हुआ जिसमें 15 लोगों की जान गई। यह घटना पूरे एनसीआर के लिए चेतावनी बन गई कि यदि शिक्षण संस्थानों की गतिविधियों पर समय रहते निगरानी न रखी जाए तो ऐसे संस्थान आतंक का अड्डा बनने में देर नहीं लगाते। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

इसी संदर्भ में गाजियाबाद जैसे बड़े शिक्षा केंद्र में मौजूद निजी संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्थाओं का आंकलन जरूरी हो जाता है। जहां एक मेडिकल कॉलेज और 50 से अधिक उच्च तकनीकी संस्थानों में देशभर से करीब एक लाख छात्र पढ़ते हैं। जिले के शहरी और ग्रामीण हिस्सों में संचालित निजी शिक्षण संस्थानों पर नजर रखने की जिम्मेदारी प्रशासन और पुलिस के पास है।

प्रत्येक संस्थान को छात्रों और कर्मचारियों का पूरा रिकार्ड रखना होता है। हास्टलों में बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश पर सख्ती रखनी होती है और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत पुलिस को देनी होती है। लेकिन जमीनी स्तर पर यह सिस्टम उतना मजबूत नहीं है जितना होना चाहिए। कई संस्थान नियमित रूप से डेटा अपडेट नहीं करते। हास्टलों में प्रवेश की निगरानी ढीली रहती है और कई बार बिना सत्यापन के किरायेदारी भी जारी मिलती है।

सीसीटीवी कैमरों और स्मार्ट मानिटरिंग सिस्टम की व्यवस्था भी कई जगह या तो सीमित है या फिर ठीक से संचालित नहीं होती। पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी स्वीकार करते हैं कि निजी संस्थानों की संख्या बहुत अधिक है और व्यापक निगरानी के लिए संसाधन सीमित हैं। उनका कहना है कि यदि संस्थान जिम्मेदारी के साथ सहयोग करें तो पुलिस की निगरानी तंत्र की प्रभावशीलता बढ़ जाए। अधिकारी यह भी मानते हैं कि सुरक्षा को लेकर कड़े निर्देश तो हैं लेकिन उनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए संस्थानों के भीतर सुरक्षा के प्रति गंभीरता आना सबसे आवश्यक है।

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि गाजियाबाद जैसे तेजी से बढ़ते शिक्षा हब में पुराने ढर्रे वाली निगरानी व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार संस्थानों में स्मार्ट एंट्री सिस्टम, छात्रों का डिजिटल वेरिफिकेशन, हास्टलों की नियमित सुरक्षा ऑडिट और पुलिस व प्रबंधन के बीच मासिक संवाद जैसी व्यवस्थाएं अनिवार्य की जानी चाहिए। उनका कहना है कि जब तक तकनीकी आधारित निगरानी और कड़े अनुपालन को संस्थानों में लागू नहीं किया जाएगा तब तक खतरे की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं होती।
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