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नए भारत के जन्म पर सोहर गायन- मनीष मिश्रा (अध ...

deltin55 1970-1-1 05:00:00 views 80

भारत की सनातन परम्परा में, किसी भी आँगन में जब कोई मांगलिक बयार बहती है, तो वह किसी न किसी सुर, ताल और गीत का आँचल पकड़कर ही आती है। ऐसा ही एक अमर उदाहरण सोहर का है। सोहर एक प्रकार का लोकगीत है, जिसे आमतौर पर संतान के जन्म के समय गाया जाता है।

भारत में सोहर गाने की परम्परा कब से शुरू हुई, इसका कोई तथ्यात्मक इतिहास नहीं है, क्योंकि सोहर भारत की मिट्टी की देहरी पर उतरता हुआ सुरों का वह सुहाग है, जो एक नवजात शिशु की पहली अठखेलियों के स्वागत में नारियों के कंठ से स्वतः ही फूट पड़ता है। सोहर के बोलों में माँ की ममता की गंध है, बुजुर्गों के आशीष का स्पर्श है, और सदियों के संस्कारों की गूँज है। सोहर केवल एक लोकगीत नहीं, बल्कि घर-घर में पनपने वाली सुखद अनुभूति का ऐसा सामूहिक उच्चार है, जो नये जीवन के आगमन पर पूरे कुल और समाज को एक लय में पिरो देता है।





‘सोहर’ शब्द की तह में जाएँ तो पता चलता है कि यह नाम भी इसके गीतों की तरह ही मीठा और सुहावना है। बड़े-बुजुर्ग और विद्वान बताते हैं कि सोहर शब्द संस्कृत के ‘शोभन’ धातु से निकला है, जिसका अर्थ होता है, मन को भाने वाला। लोक-बोली की नदियों में बहते-बहते यही शोभन कालांतर में ‘सोहर’ बन गया। भोजपुरी अंचल में आज भी कोई चीज़ अगर पसंद आ जाए, तो लोग कहते हैं, ‘बड़ा सोहल लागता’। कुछ लोग इसकी उत्पत्ति ‘शोकहर’ से भी मानते हैं, क्योंकि बच्चे का जन्म हर घर से शोक को हर लेता है। मातृत्व तक पहुंचने की जो पीड़ा है वह स्वयं में ही कई प्रकार की पीड़ाओं से भरी होती है, ऐसे में जब संतान का जन्म होता है, तो वह संतान अपनी माता के तमाम शोक को हर लेती है। शोकहर के रूप में आए उस संतान के आगमन का उल्लास मनाते हुए सोहर फूट पड़ता है।





वैसे तो यह परम्परा भारत के ग्रामीण परिवेश में आज भी जीवित है, किंतु बदलते वैश्विक वातावरण में कहीं न कहीं हम इस ऐतिहासिक परंपरा को भूलते चले जा रहे हैं। हमारी संस्था ‘पहल’ ने भारतीय संस्कृति के इस जीवित स्पंदन को वैश्विक पहचान दिलाने का प्रण लिया है। ‘पहल’ संस्था ने उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में 100 स्वयं सहायता समूहों को ‘राम जी का पेड़ा’ बनाने के लिए एक लाख रुपए की आर्थिक सहायता दी है। ये सभी महिलाएँ ‘रामजी का सोहर’ गाते हुए प्रसाद के रूप में पेड़ा तैयार करेंगी। इसके अतिरिक्त ‘पहल’ संस्था ने एक हजार महिलाओं को ‘रामजी का झोला’ बनाने के लिए सिलाई मशीन भी वितरित की है। ये सभी महिलाएँ ‘रामजी का सोहर’ गाते हुए ‘रामजी का झोला’ तैयार करेंगी।





‘पहल’ ने सोहर की इस ऐतिहासिक परम्परा को वैश्विक स्तर पर ले जाते हुए 25 मई 2026 को एक कार्यक्रम आयोजित किया है। इस कार्यक्रम में बस्ती जनपद की 2100 महिलाएँ एक साथ, एक सुर में ‘रामजी का सोहर’ गाएँगी। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड होगा, जिसे गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी शामिल किया जा रहा है। यह कार्यक्रम एक तरफ तो सोहर को वैश्विक पहचान दिलाएगा, दूसरी तरफ यह नए भारत का भी सूचक बनेगा।

स्वतन्त्रता के पश्चात से ही भारत नक्सलवाद के दंश से जूझ रहा था। नक्सलियों ने अपनी हिंसक विचारधारा के माध्यम से भारत की आत्मा पर सैकड़ों घाव किये। किन्तु अब आदरणीय प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में माननीय गृह मंत्री जी के प्रयासों से देश नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त हो चुका है। 31 मार्च 2026 के बाद, एक तरह से नए भारत का जन्म हुआ है। गृह मंत्री जी के प्रयासों को साधुवाद देते हुए, नए भारत के जन्मोत्सव के उल्लास में, बस्ती की 2100 महिलाओं के कंठ से सोहर फूट पड़ा है, जिसकी सामूहिक ध्वनि 25 मई को गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज की जाएगी।





“जुग-जुग जिया सु ललनवा, भवनवा के भाग जागल हो” ये पंक्तियाँ हम सबने कभी न कभी सुनी होंगी। नए भारत के इस भाग्योदय पर हमारी माताएँ, हमारी बहनें, इस नए भारत के जुग-जुग जीते रहने की प्रार्थना करेंगी। जब सोहर के माध्यम से, बस्ती समेत पूरा देश एक परिवार बनकर भारत की उपलब्धि पर झूमेगा, तो उसका उल्लास कई गुना बड़ा हो जाएगा। सोहर के ये सुर, डिजिटल तरंगों पर सवार होकर देश के हर घर तक पहुँचेंगे।

हर जन्म, चाहे वह एक बच्चे का हो या एक राष्ट्रीय स्वप्न का, एक दैवीय उपहार है। और जब भी कोई नया उजाला धरती पर उतरता है, तो उसका स्वागत सोहर के इन्हीं बोलों से होना चाहिए। यह गीत नारी-शक्ति की सृजनात्मकता का ऐसा महाप्रसाद है, जो सदियों से हमारे समाज को भावनात्मक रूप से पोषित करता आ रहा है। आइये हम सब संकल्प लें, कि यह सोहर की परम्परा हर उस भारतवासी के कंठ का श्रृंगार बने, जो इस नवजात, शांत और समृद्ध भारत का स्वागत कर रहा है।

(लेखक पहल संस्था के अध्यक्ष तथा समाजसेवी हैं।)






Deshbandhu



भारतसनातन परंपरानवजात शिशुसुहावना









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