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क्या अदालत में भूल सुधार हो पाएगा ... ...

deltin55 1970-1-1 05:00:00 views 110

'जमानत नियम है और जेल अपवाद।' न्याय का यह बड़ा सिद्धांत सोमवार को एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय में सुनाया गया और इसके साथ ही पिछले पांच सालों से जेल में बंद उमर खालिद की जमानत का प्रकरण भी चर्चा में आ गया। शीर्ष अदालत ने कहा कि, बेल नियम और जेल अपवाद, यह सिद्धांत गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए मामलों में भी लागू होता है। इसके साथ अदालत ने जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद को जमानत देने से इनकार करने वाले अपने ही पुराने फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत की 18 मई की इस टिप्पणी को यूएपीए मामलों में लंबित जमानत याचिकाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।  




गौरतलब है कि जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने यह टिप्पणी एक अन्य यूएपीए मामले में आरोपी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत देते समय की। अंद्राबी पर मादक पदार्थों की सप्लाई के जरिए आतंकवाद को फंडिंग करने का आरोप है और वह पिछले छह वर्षों से जेल में बंद था।  
सुनवाई के दौरान अदालत ने 2021 के भारत संघ बनाम के ए नजीब मामले में ऐतिहासिक फैसले का उल्लेख किया। उस फैसले में तीन-जजों की पीठ ने कहा था कि यदि किसी आरोपी के मौलिक अधिकार, विशेष रूप से शीघ्र सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन हो रहा हो, तो संवैधानिक अदालतें यूएपीए जैसे कठोर कानूनों के तहत भी जमानत दे सकती हैं। केरल में एक कॉलेज प्रोफेसर पर ईशनिंदा के नाम पर हमले का आरोप पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के सदस्य के ए नजीब और साथियों पर लगा। 2010 की इस घटना में पांच साल तक फ़रार रहने के बाद के ए नजीब को आखिरकार 2015 में गिरफ़्तार किया गया। 2016 से 2021 के बीच नजीब की ज़मानत याचिकाएं बार-बार खारिज होती रहीं, आखिर में केरल हाई कोर्ट ने उन्हें ज़मानत दे दी क्योंकि वह पहले ही चार साल तक विचाराधीन क़ैदी के रूप में जेल में रह चुका था। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इसके खिलाफ़ अपील की, जहां अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने दलील दी कि सामान्य आपराधिक क़ानून के तहत ज़मानत देने के मानदंड यूएपीए या अन्य विशेष क़ानूनों के मामलों में लागू नहीं होंगे। इस मामले में विचाराधीन कै़दी के रूप में नजीब के साढ़े पांच साल जेल में बिताना एक अहम पहलू बन गया था। नजीब के केस में अदालत ने शाहीन वेलफेयर एसोसिएशन बनाम भारत सरकार मामले का हवाला देते हुए कहा कि मुक़दमे में 'अत्यधिक देरी' अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।  




अब अनुच्छेद 21 की यही मिसाल अंद्राबी से होते हुए उमर खालिद तक दी जा रही है। ध्यान रहे कि-  
उमर खालिद को सितंबर 2020 में फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों की कथित 'बड़ी साजिश' मामले में गिरफ्तार किया गया था। दिल्ली पुलिस ने उन पर सीएए विरोधी प्रदर्शनों के दौरान भड़काऊ भाषण देने और हिंसा की पूर्व नियोजित साजिश का हिस्सा होने का आरोप लगाया था। उन पर यूएपीए के अलावा भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के तहत भी मुकदमा दर्ज किया गया। हालांकि खालिद ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा है कि दंगे भड़कने के समय वह दिल्ली में मौजूद नहीं थे। इसके बाद भी खालिद को कई बार की अपीलों के बावजूद जमानत नहीं दी गई। इस साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया था, जबकि गुलफिशा फातिमा और मीरान हेदर समेत पांच अन्य आरोपियों को राहत दी गई थी। अदालत ने उस समय कहा था कि उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका अन्य आरोपियों के मुकाबले 'गुणात्मक रूप से अलग' है और उनके खिलाफ आरोप प्रथम दृष्टया सही लगते हैं। फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने उमर खालिद और शरजीत इमाम पर इस बात के लिए रोक लगा दी है कि वो अब एक साल तक जमानत के लिए आवेदन भी नहीं कर सकते।  




लेकिन 18 मई को उसी फैसले की समीक्षा करते हुए सुप्रीम कोर्ट की एक दूसरी बेंच ने जमानत न देने को गलत माना है। अदालत ने कहा कि जनवरी 2026 में दिए गए उस फैसले में यूएपीए के तहत लंबी अवधि की कैद और शीघ्र सुनवाई के अधिकार से जुड़े सिद्धांतों को सही तरीके से लागू नहीं किया गया।  
जस्टिस उज्जल भुइयां ने 18 मई को फैसले में कहा कि उमर खालिद मामले में अपनाए गए नज़रिए (जजमेंट) को स्वीकार करना 'कठिन' है, क्योंकि इसमें यूएपीए की कठोर जमानत शर्तों की व्याख्या 2021 के बड़े पीठ के फैसले से अलग तरीके से की गई। अदालत ने स्पष्ट कहा, 'कम सदस्यों वाली बेंच बड़ी बेंच द्वारा तय किए गए फैसले से बंधी होती है। न्यायिक अनुशासन की मांग है कि ऐसे बाध्यकारी फैसले का पालन किया जाए या संदेह की स्थिति में मामले को बड़ी बेंच को भेजा जाए। छोटी बेंच बड़े बेंच के फैसले को कमजोर, दरकिनार या नजरअंदाज नहीं कर सकती।'  




खास बात यह है कि उमर खालिद और इसी मामले में अन्य आरोपियों की जमानत याचिका में दलीलें पेश करते वक्त वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने भी के ए नजीब जजमेंट को बाकायदा उद्धृत किया था। लेकिन अदालत ने उमर खालिद और शरजील इमाम के मामले में इस संदर्भ को तब महत्व नहीं दिया। जबकि इसी दलील के आधार पर गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर समेत पांच लोगों को ज़मानत दे दी थी।  
उमर खालिद की ज़मानत याचिका बार-बार खारिज होने पर जहां भारतीय न्याय व्यवस्था के भीतर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, वहीं यह मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुर्खियां बटोर चुका है। न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने उमर खालिद को पत्र लिखकर उनके जेल में होने पर चिन्ता जताई थी।  
अब देखना होगा कि शीर्ष अदालत ने जिस तरह अपनी ही एक पीठ के फैसले पर सवाल उठाए हैं, क्या उसके बाद उमर खालिद की जमानत की उम्मीद बढ़ेगी। क्या अदालत एक महत्वपूर्ण भूल सुधार कर पाएगी।






Deshbandhu Desk



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