कैप्शन: पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट फाइल फोटो
राज्य ब्यूरो, पंचकूला। सड़क हादसे में 23 वर्षीय युवक संदीप की मौत के मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने आश्रित परिवार को बड़ी राहत देते हुए मुआवजे की राशि में वृद्धि कर दी है।
जस्टिस सुदीप्ति शर्मा की एकलपीठ ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, सोनीपत द्वारा 31 जनवरी 2019 को पारित अवॉर्ड में संशोधन करते हुए कुल मुआवजा 21.11 लाख रुपये से बढ़ाकर 35.18 लाख रुपये निर्धारित किया है। इस प्रकार परिवार को 14.07 लाख रुपये की अतिरिक्त राशि मिलेगी, जिस पर दावा याचिका दायर करने की तिथि से भुगतान तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देय होगा।
अपीलकर्ता सुमन शर्मा व अन्य आश्रितों ने दलील दी थी कि अधिकरण ने मृतक की वास्तविक आय का सही आकलन नहीं किया। रिकार्ड के अनुसार संदीप प्राइवेट कंपनी कार्यरत था और जुलाई 2017 की वेतन पर्ची में उसकी मासिक आय 14,412 रुपये दर्शाई गई थी। इसके बावजूद अधिकरण ने आय 9,000 रुपये प्रतिमाह मान ली।
हाईकोर्ट ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत कार्यवाही संक्षिप्त प्रकृति की होती है, अत तकनीकी आधार पर प्रमाणित वेतन पर्ची को नकारना उचित नहीं था। हाई कोर्ट ने आय को न्यायोचित रूप से 14,500 रुपये प्रतिमाह स्वीकार किया।
कोर्ट ने ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए मुआवजे की पुनर्गणना की। 23 वर्ष की आयु के आधार पर 18 का गुणक (मल्टीप्लायर) लागू किया गया। भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए आय में 40 प्रतिशत की वृद्धि जोड़ी गई।
नई गणना के अनुसार मासिक निर्भरता 15,225 रुपये बनी, जिससे वार्षिक निर्भरता 32,88,600 रुपये निर्धारित हुई। इसके अतिरिक्त 15,000 रुपये संपत्ति हानि, 15,000 रुपये अंतिम संस्कार व्यय तथा कुल 2,00,000 रुपये पारिवारिक, दांपत्य व संतान संबंधी मद के रूप में प्रदान किए गए। इस प्रकार कुल मुआवजा 35,18,600 रुपये तय किया गया।अदालत ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह दो माह के भीतर बढ़ी हुई राशि 9 प्रतिशत ब्याज सहित अधिकरण में जमा कराए।
अधिकरण को आदेश दिया गया है कि पूर्व निर्धारित अनुपात के अनुसार राशि सीधे आश्रितों के बैंक खातों में वितरित की जाए।हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि मोटर वाहन अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है, जिसका उद्देश्य दुर्घटना पीड़ित परिवारों को वास्तविक, न्यायसंगत और मानवीय आधार पर राहत प्रदान करना है। न्यायालय ने कहा कि मुआवजे का निर्धारण यांत्रिक नहीं, बल्कि संवेदनशील दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए, ताकि पीड़ित परिवार को वास्तविक न्याय मिल सके। |