तुलसी का पत्ता और गंगाजल कैसे करते हैं आपकी रक्षा? (Image Source: AI-Generated)
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सूर्य ग्रहण (Surya Grahan 2026) महज एक खगोलीय घटना नहीं है, बल्कि भारतीय परंपरा में इसे ऊर्जा और शुद्धिकरण के गहरे विज्ञान से जोड़कर देखा जाता है। जब भी ग्रहण लगता है, घरों में तुलसी के पत्तों (Tulsi Leaves) और गंगाजल का उपयोग बढ़ जाता है। आइए जानते हैं इसके पीछे की असली वजह क्या है।
सूर्य ग्रहण और \“सूतक\“ का प्रभाव
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण के दौरान ब्रह्मांड में नकारात्मक ऊर्जा (Negative Energy) का प्रवाह बढ़ जाता है। इस समय को \“सूतक\“ काल (Sutak Kaal) कहा जाता है, जिसमें वातावरण दूषित हो जाता है। यही कारण है कि इस दौरान भोजन और पानी को \“अशुद्ध\“ माना जाता है।
ग्रहण में सुरक्षा कवच की तरह काम करती है तुलसी
तुलसी को केवल एक पौधा नहीं, बल्कि \“विष्णुप्रिया\“ और औषधीय गुणों का भंडार माना गया है।
नकारात्मकता से बचाव: शास्त्रों के अनुसार, तुलसी में पारा (Mercury) होता है और इसमें ऐसी विद्युत-चुंबकीय शक्ति होती है जो ग्रहण की हानिकारक किरणों को बेअसर कर देती है।
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भोजन की रक्षा: माना जाता है कि ग्रहण के दौरान निकलने वाली अल्ट्रावायलेट किरणें खाद्य पदार्थों को खराब कर सकती हैं। जब हम खाने-पीने की चीजों में तुलसी का पत्ता डालते हैं, तो यह एक \“शील्ड\“ या सुरक्षा कवच की तरह काम करता है, जिससे भोजन दूषित नहीं होता।
गंगाजल का असर
गंगाजल को सनातन धर्म में परम पावन माना गया है। ग्रहण समाप्त होने के बाद पूरे घर में गंगाजल छिड़कने की परंपरा है।
शुद्धिकरण का माध्यम: धर्म शास्त्र के मुताबिक, गंगाजल में कभी बैक्टीरिया पैदा नहीं होते। ग्रहण के बाद जब घर के कोनों में इसका छिड़काव किया जाता है, तो माना जाता है कि वह स्थान ग्रहण के दुष्प्रभाव से मुक्त हो गया है।
स्नान का महत्व: शास्त्रों के अनुसार, ग्रहण के तुरंत बाद गंगाजल युक्त पानी से स्नान करने से शरीर के चारों ओर मौजूद नकारात्मक \“आभामंडल\“ (Aura) साफ हो जाता है।
विज्ञान और आस्था का मेल
भले ही आधुनिक विज्ञान ग्रहण को छाया का खेल मानता हो, लेकिन परंपराएं हमें सूक्ष्म स्तर पर सफाई सिखाती हैं। ग्रहण के दौरान तुलसी का पत्ता चबाना वर्जित है, क्योंकि इसके पीछे का वैज्ञानिक तर्क यह है कि ग्रहण की भारी ऊर्जा के बीच तुलसी के पारा तत्व का सीधा सेवन नुकसानदेह हो सकता है।
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