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यूपी और बिहार के किसानों के लिए गेम चेंजर साबित होगी टेक्नोलॉजी, AI और रोबोटिक्स से की जाएगी स्मार्ट खेती

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पूसा में एआई और रोबोटिक्स लैब स्मार्ट खेती के तैयार कर रहा एआई से लैस स्मार्ट रोबोट। फोटो: जागरण





गौतम कुमार मिश्रा, पश्चिमी दिल्ली। राजधानी दिल्ली में आयोजित India AI Impact Summit 2026 में जब दुनिया भर के दिग्गज मानवता के कल्याण के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की नीति तय कर रहे हैं, ठीक उसी समय पूसा स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने इसे धरातल पर उतारने की तैयारी पूरी कर ली है। संस्थान में नव-स्थापित अत्याधुनिक एआई और रोबोटिक्स लैब भारतीय कृषि के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होने जा रही है।
यूपी और बिहार के लिए \“गेम-चेंजर\“ साबित होगी तकनीक

उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में खेती की सबसे बड़ी समस्या जोतों का छोटा आकार और युवाओं का बड़े स्तर पर पलायन है। पूसा की यह लैब इन राज्यों के लिए दोहरी उम्मीद लेकर आई है।

विज्ञानियों का कहना है कि यूपी-बिहार के छोटे किसानों के पास संसाधन कम हैं। एआई तकनीक यह सुनिश्चित करेगी कि कम खाद और कम पानी में भी उपज अधिकतम हो। प्रिसिजन फार्मिंग से लागत घटेगी, जो छोटे किसानों की आय बढ़ाने का एकमात्र रास्ता है।
पलायन पर लगाम

बिहार और यूपी के लाखों युवा रोजगार की तलाश में दिल्ली, पंजाब या महाराष्ट्र जाते हैं। जब खेती \“हाई-टेक\“ होगी और गांवों में ही \“एग्री-टेक स्टार्टअप\“ या \“कस्टम हायरिंग सेंटर\“ खुलेंगे, तो ये युवा अपने ही खेतों में तकनीक के जरिये सम्मानजनक कमाई कर सकेंगे। अब वे \“मजदूर\“ नहीं, बल्कि \“स्मार्ट फार्मर\“ कहलाएंगे।
कामगार संकट पर तकनीकी प्रहार

वर्तमान में पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे राज्य कामगारों की भारी कमी से जूझ रहे हैं। बुवाई और कटाई के समय श्रमिकों का न मिलना खेती की लागत को 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ा देता है।

पूसा की लैब में तैयार हो रहे रोबोट बिना थके, बिना छुट्टी लिए 24 घंटे काम करने में सक्षम हैं। ये \“डिजिटल मजदूर\“ न केवल पंजाब की बड़ी जोतों को संभालेंगे, बल्कि यूपी-बिहार में श्रम की कमी के समय फसलों को बर्बाद होने से बचाएंगे।
साधारण रोबोट बनाम एआई रोबोट: समझ का अंतर

पूसा की लैब में मशीनीकरण के दो अलग स्तरों पर काम हो रहा है। जहां एक साधारण रोबोट केवल कमांड को दोहराता है, वहीं एआई रोबोट सेंसर और कैमरों की मदद से फसल को \“देख\“ और \“\“समझ\“\“ सकता है।

आसान शब्दों में इसे समझें तो यदि एक एकड़ खेत में केवल 10 पौधों में कीड़ा लगा है, तो एआई रोबोट केवल उन्हीं प्रभावित पौधों पर सटीक दवा डालेगा, जबकि साधारण रोबोट पूरे खेत में छिड़काव कर संसाधन बर्बाद करेगा।
खाद व पानी नहीं होगा बर्बाद, लागत में 40% तक की कमी

एआई समिट में डेटा की महत्ता पर जोर दिया जा रहा है, और पूसा की लैब इसी डेटा का उपयोग मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए कर रही है। एआई यह सुनिश्चित करेगा कि खाद और पानी का एक भी कतरा बर्बाद न हो।

इससे इनपुट कास्ट में 40 प्रतिशत तक की कमी आएगी। रोबोटिक सेंसर मिट्टी का रियल-टाइम डेटा देंगे, जिससे अनावश्यक रसायनों के प्रयोग से धरती को बचाया जा सकेगा।
युवाओं की वापसी, खेती अब बनेगी \“हाई-टेक स्टार्टअप\“

विज्ञानियों का कहना है कि युवा शारीरिक मेहनत के कारण खेती छोड़ रहे हैं। लेकिन जब खेती में ड्रोन और सेंसर जुड़ेंगे, तो यह एक \“ग्लैमरस\“ पेशा बन जाएगा। पूसा की यह लैब युवाओं को \“एग्री-प्रेन्योर\“ बनने के लिए प्रेरित करेगी।

अब युवा खेत में पसीना बहाने के बजाय एक \“कंट्रोल रूम\“ से अपनी मशीनों को निर्देशित करेंगे। यह बदलाव ग्रामीण भारत में \“टेक-एक्सपर्ट\“ जैसे नए रोजगार पैदा करेगा।
चुनौतियां और भविष्य की राह

तकनीक को छोटे खेतों तक पहुंचाना एक चुनौती है। इसके लिए सरकार \“कस्टम हायरिंग सेंटर\“ (मशीन बैंक) जैसे मॉडल पर विचार कर रही है। विशेषकर यूपी और बिहार में छोटे किसानों के समूहों के जरिये ये रोबोट किराए पर उपलब्ध कराए जाएंगे, ताकि तकनीक का लाभ हर गरीब किसान तक पहुंच सके।


लैब में हमलोगों ने कुछ एआई आधारित रोबोट्स व मशीनें विकसित की हैं। कुछ के पेटेंट की प्रक्रिया चल रही है। आने वाले समय में यहां किसानों की जरुरत को देखते हुए कई नई एआई आधारित मशीनें विकसित होंगी।

- डाॅ. दिलीप कुमार कुशवाहा, प्रभारी, रोबोटिक्स एंड आई लैब


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