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लोकधुनों, गजलों और नाटकों से सजा जेएनयू का स्वर्ण जयंती समारोह, लुप्त होती बोलियों पर जताई गई चिंता

cy520520 2026-2-14 21:27:49 views 1238
  

जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र के स्वर्ण जयंती समारोह में बंगाल के बाउल गीत की प्रस्तुति देते शंभुनाथ सरकार।सौ. आयोजक



जागरण संवाददाता, दक्षिणी दिल्ली। बंगाल के प्रसिद्ध लोकगीतों और अवधी-भोजपुरी की लोकधुनों में मिट्टी की महक दिखी, गजलों व मुशायरे में उर्दू की नजाकत मंच पर उतारी, वहीं मैथिली, हिंदी और उर्दू में हुए नाटकों ने शब्दों को अभिनय के माध्यम से सांस दी। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में भारतीय भाषा केंद्र के स्वर्ण जयंती समारोह में लफ्जों ने सचमुच अपनी दुनिया रची और इन्हें एक साझा उत्सव में पिरो दिया। इस बीच लुप्त होती भाषाओं (बोलियों) पर भी चर्चा की गई।
प्रेम को निभाना बहुत कठिन

इस अवसर पर \“लफ्जों से बनती दुनिया\“ शीर्षक से आयोजित इस समारोह में विविध भाषाओं, बोलियों और संस्कृतियों ने से दिखा कि शब्द सीमाएं नहीं रचते, दिलों को जोड़ते हैं। समापन सत्र में बाउल बंगाल की निर्गुण संत परंपरा की प्रस्तुति हुई। इसमें शंभुनाथ सरकार ने ‘एकला चलो रे’, ‘मोन्टा रे’ जैसे प्रसिद्ध लोकगीतों से समां बांधा। इसके बाद ‘प्रेम और साहित्य’ सत्र में डा. सुमन केसरी ने संबोधित करते हुए कहा कि प्रेम करना बहुत आसान है, लेकिन प्रेम को निभाना बहुत कठिन है।
भाषाओं पर मंडराते खतरे को बताया

प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि प्रेम का सर्वश्रेष्ठ रूप अलौकिक प्रेम ही है। समापन सत्र में मुख्य अतिथि रहे भाषाशास्त्री प्रो. गणेश एन. देवी ने भारत में भाषाओं की स्थिति को लेकर चिंता जताई और वर्चुअल वर्ल्ड के बढ़ते प्रभाव के चलते भाषाओं के सामने उत्पन्न हो रहे खतरे पर विचार रखे।

इस दौरान प्रो. रामबक्ष जाट और प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने भी संबोधित किया। सत्र के संयोजक प्रो. गंगा सहाय मीणा रहे। मौके पर स्वर्ण जयंती समारोह की स्मारिका का विमोचन भी किया गया। अंत में केंद्र की अध्यक्ष प्रो. बंदना झा ने सभी का आभार जताया।
भाषाई व सांस्कृतिक विविधता का मना जश्न

समारोह भारत की बहुभाषी खूबसूरती दिखी। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की रचना राम की शक्ति पूजा पर हिंदी में नाट्य प्रस्तुति ने आध्यात्मिक शक्ति का वातावरण रचा। दूसरे दिन डा. मालविका हरिओम ने अवधी और भोजपुरी लोकगीतों से लोकधारा की मिठास को जीवंत किया, वहीं उर्दू में कव्वाली ने आध्यात्मिक उल्लास भरा।
सांस्कृतिक संवाद को समृद्ध बनाया

अंतिम दिन बंगाली बाउल गीत की प्रस्तुति में सूफियाना रंग दिखा। 15 सत्रों ने भी समारोह को अंतरराष्ट्रीय संवाद का मंच बनाया, जहां जेएनयू के पूर्व विद्यार्थियों जापान से योशियो ताकाकूरा, तेहरान से मोहम्मद राशिद, जर्मनी से विकास शुक्ला और नार्वे से शरद आलोक ने अकादमिक व सांस्कृतिक संवाद को समृद्ध बनाया।

यह भी पढ़ें- JNU में छात्रों की हड़ताल, \“जेएनयू प्रशासन मुर्दाबाद\“ के नारों से गूंज उठा कॉलेज; क्या है मांग?
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