जब बेटियां बनीं माता-पिता की ताकत मुंबई की जुड़वां बहनों की संघर्ष गाथा (फाइल फोटो)
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। जिंदगी कभी-कभी बिना चेतावनी ऐसे मोड़ पर ला खड़ा करती है, जहां रिश्तों की भूमिकाएं बदल जाती हैं। माता-पिता जो कभी बच्चों का सहारा होते हैं, वही एक दिन बच्चों पर निर्भर हो जाते हैं। मुंबई की रहने वाली जुड़वां बहनें ऐश्वर्या और अपूर्वा वैद्य ने ऐसा ही दौर जिया, जब एक साल के भीतर उनके दोनों माता-पिता को स्ट्रोक आया। इन मुश्किल हालात ने उनके परिवार को तोड़ा नहीं, बल्कि और भी मजबूत बना दिया।
20 सितंबर 2022 की सुबह, उनकी मां का 60वां जन्मदिन मनाए सिर्फ दो दिन ही हुए थे। रात करीब 3 बजे अचानक उनके पिता पद्मनाभ वैद्य घर में गिर पड़े। वह न बोल पा रहे थे, न हिल पा रहे थे। स्थिति बेहद गंभीर थी। ऐश्वर्या सदमे में बेहोश हो गईं, जबकि अपूर्वा ने हिम्मत दिखाते हुए तुरंत डॉक्टर से संपर्क किया और पिता को अस्पताल ले जाया गया।
जांच में पता चला कि उन्हें पॉन्टाइन इंफार्क्ट (Pontine Infarct) नाम का गंभीर स्ट्रोक हुआ था, जो ब्रेनस्टेम को प्रभावित करता है। इसकी वजह महीनों से अनियंत्रित डायबिटीज थी। इसके चलते उन्हें लकवा, बोलने में दिक्कत और ट्यूब फीडिंग की जरूरत पड़ी।
अस्पताल से छुट्टी के बाद घर ही उनका रिकवरी सेंटर बन गया। फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और चौबीसों घंटे देखभाल शुरू हुई। बेटियों के लिए यह सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक लड़ाई भी थी।
दूसरा झटका- पिता की हालत फिर बिगड़ी
घर लौटने के कुछ दिन बाद पिता को लगातार हिचकियां आने लगीं। फिर अचानक उन्हें सांस लेने में दिक्कत, उल्टी और घुटन महसूस हुई। ऑक्सीजन लेवल खतरनाक रूप से गिर गया। उन्हें फिर से अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने एस्पिरेशन निमोनिया बताया।
इस बीमारी में खाना या तरल पदार्थ फेफड़ों में चले जाते हैं, जिससे संक्रमण हो जाता है। इसके बाद लंबे समय तक ट्यूब फीडिंग और कैथेटर के जरिए देखभाल करनी पड़ी। दिन-रात की मेहनत, नियमित थेरेपी और परिवार के मजबूत हौसले से धीरे-धीरे पिता की हालत सुधरी। उन्होंने फिर चलना सीखा, बोलना शुरू किया और आखिरकार पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गए। यह परिवार के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था।
एक साल बाद वही डर फिर लौटा
जब परिवार को लगा कि अब हालात सामान्य हो रहे हैं, तब 26 दिसंबर 2023 को एक और बड़ा झटका लगा। इस बार उनकी मां माधुरी वैद्य को उल्टियां और भ्रम की स्थिति होने लगी। बेटियों ने तुरंत पहचान लियायह स्ट्रोक के लक्षण थे।
कुछ ही दिनों में उन्हें दूसरा और ज्यादा गंभीर स्ट्रोक आया। घर में फिर डर, अनिश्चितता और चिंता लौट आई। मां खुद को बेटियों पर बोझ मानने लगीं और बार-बार माफी मांगती थीं। इस बार जिम्मेदारियां पहले से कहीं ज्यादा थीं। एक बेटी दवाइयों और डॉक्टरों से तालमेल संभालती, तो दूसरी मां के साथ बैठकर उन्हें भावनात्मक सहारा देती। दोनों ने मिलकर मां को हारने नहीं दिया।
जब पिता बने मां की ताकत
इस बार परिवार की ताकत बने वही पिता, जो खुद स्ट्रोक से उबर चुके थे। वह मां के साथ घंटों बैठते, उन्हें हौसला देते और मजाक भी करते। एक दिन उन्होंने कहा, “मैं तो स्ट्रोक से बच गया, असली फाइटर तो तुम हो।“ उस दिन मां के चेहरे पर हंसी लौटी। धीरे-धीरे मां की हालत भी सुधरने लगी। उन्होंने फिर से रसोई संभाली, घर में बातचीत और संगीत लौट आया। घर जो कभी अस्पताल जैसा लग रहा था, फिर से घर बनने लगा।
इस पूरे सफर में ऐश्वर्या ने अपने जज्बात लिखने शुरू किए। जर्नलिंग उनके लिए सहारा बनी। बाद में उन्होंने अपने अनुभवों को एक किताब का रूप दिया \“From Shadows to Glimmer\“, जिसे उन्होंने खुद प्रकाशित किया, ताकि ऐसे हालात से जूझ रहे लोगों को उम्मीद मिल सके।
संदेश जो हर परिवार के लिए है
यह कहानी सिर्फ बीमारी की नहीं है, बल्कि रिश्तों की है। यह दिखाती है कि माता-पिता बोझ नहीं होते, बल्कि वह मौका होते हैं उस प्यार को लौटाने का, जो उन्होंने कभी हमें दिया था। ऐश्वर्या ने कहा, “हम टूटे जरूर, लेकिन बिखरे नहीं। हमने सीखा कि मुश्किलें हमें कमजोर नहीं, मजबूत बनाती हैं।“ वहीं अपूर्वा ने कहा, “जब माता-पिता हमारा सहारा बने, तो उनका सहारा बनना हमारा फर्ज है।“
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