search

क्यों हजरत निजामुद्दीन दरगाह पर धूमधाम से मनाई जाती है वसंत पंचमी? 700 साल पुरानी है परंपरा

Chikheang 2026-1-22 08:56:33 views 1153
  

क्यों निजामुद्दीन दरगाह पर मानती है वसंत पंचमी? (Image Source: AI-Generated)  



लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आमतौर पर जब हम वसंत पंचमी के बारे में सोचते हैं, तो हमारे दिमाग में ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा, पीली सरसों के खेत और आसमान में उड़ती पतंगें आती हैं, लेकिन दिल्ली में स्थित हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर यह त्योहार एक बिल्कुल अलग और दिल को छू लेने वाले अंदाज में मनाया जाता है (Why is Basant Panchami celebrated at a Dargah)।

यह जगह एक ऐसी मिसाल है जहां सूफी रहस्यवाद और स्थानीय परंपराएं एक-दूसरे में इस तरह घुल-मिल जाती हैं कि मजहब की दीवारें धुंधली पड़ जाती हैं। यहां वसंत केवल मौसम का बदलना नहीं, बल्कि एक गुरु और शिष्य के बीच के उस अटूट प्रेम का उत्सव है, जिसने 700 साल पहले एक उदास गुरु के चेहरे पर मुस्कान ला दी थी (Basant Panchami at Nizamuddin Dargah)। आइए, विस्तार से जानते हैं इस बारे में।

  

(Image Source: AI-Generated)
कुछ ऐसा है वसंत का त्योहार

वसंत पंचमी वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है। हिंदू धर्म में इस दिन ज्ञान, संगीत और कला की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। लोग वसंत के खिलते फूलों के प्रतीक के रूप में पीले रंग के कपड़े पहनते हैं और मंदिरों में आशीर्वाद लेने जाते हैं। उत्तर भारत में इस दिन पतंग उड़ाने की भी एक प्यारी परंपरा है, जहां आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है।
गम में डूबे थे निजामुद्दीन औलिया

निजामुद्दीन दरगाह पर वसंत पंचमी मनाने की शुरुआत एक बेहद भावुक घटना से हुई थी। यह कहानी सूफी संत निजामुद्दीन औलिया और उनके प्रिय शिष्य अमीर खुसरो के अटूट रिश्ते की है।

दरअसल, एक बार हजरत निजामुद्दीन औलिया अपने भांजे की मृत्यु के कारण बहुत गहरे दुख में थे। उनके शिष्य अमीर खुसरो अपने गुरु को इस तरह उदास देखकर बहुत परेशान थे। तभी खुसरो ने देखा कि कुछ हिंदू लोग पीले कपड़े पहनकर, संगीत के साथ खुशियां मनाते हुए वसंत पंचमी का त्योहार मना रहे हैं।



(रिपोर्ट: एएनआई)
ऐसे शुरू हुई दरगाह पर वसंत की रवायत

खुसरो को लगा कि वसंत का यह उल्लास उनके गुरु के दुख को कम कर सकता है। उन्होंने भी पीले रंग के कपड़े पहने और हाथों में सरसों के फूल लेकर, पूरबी बोली में गाते हुए एक जुलूस निकाला। वे गाते और झूमते हुए हजरत निजामुद्दीन औलिया के पास पहुंचे और उनके कदमों में फूल अर्पित किए।

खुसरो की इस मासूम और प्रेम पूर्ण कोशिश को देखकर हजरत निजामुद्दीन औलिया की आंखों में आंसू आ गए और वे मुस्कुरा दिए। उन्होंने अपने शिष्य के इस प्रेम को स्वीकार किया और उत्सव में शामिल हो गए। बस तभी से दरगाह पर बसंत पंचमी मनाने की यह परंपरा शुरू हो गई।
आज भी कायम है रौनक

  

(Image Source: AI-Generated)

आज भी हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर यह परंपरा उसी उत्साह के साथ निभाई जाती है। वसंत पंचमी के दिन पूरी दरगाह को पीले फूलों से सजाया जाता है। दरगाह का आंगन पीले रंग की आभा से चमक उठता है।

इस दिन विशेष रूप से सूफी कविताएं और कव्वालियां गाई जाती हैं। अमीर खुसरो द्वारा शुरू की गई धुनों की गूंज आज भी यहां सुनाई देती है। इस मौके पर लोगों के बीच मिठाइयां बांटी जाती हैं और फूलों का चढ़ावा चढ़ाया जाता है।

यह त्योहार सिर्फ प्रकृति के बदलाव या वसंत के आगमन का जश्न नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिक चिंतन और नई शुरुआत का भी प्रतीक है। यहां अलग-अलग धर्मों और पृष्ठभूमियों के लोग एक साथ आते हैं और इस सूफी संत की विरासत और वसंत की खुशियों को एक साथ मनाते हैं।

यह भी पढ़ें- Basant Panchami 2026: उत्तराखंड की गुफा से दक्षिण के तट तक, बेहद खास हैं मां सरस्वती के 5 प्राचीन मंदिर

यह भी पढ़ें- Basant Panchami 2026: देखना चाहते हैं वसंत पंचमी की असली धूम? इन 5 जगहों पर बनाएं घूमने का प्लान
like (0)
ChikheangForum Veteran

Post a reply

loginto write comments
Chikheang

He hasn't introduced himself yet.

510K

Threads

0

Posts

1610K

Credits

Forum Veteran

Credits
169090