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वंदेमातरम के 150 वर्षः विश्व पुस्तक मेले में इतिहास, साहित्य और राष्ट्रभाव का संगम

deltin33 1 hour(s) ago views 621
  

भारत मंडपम में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में शनिवार को पुस्तकों का अवलोकन करते पुस्तक प्रेमी।ध्रुव कुमार



संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। World Book Fair 2026 : राष्ट्रगीत वंदेमातरम के 150 वर्ष केवल एक ऐतिहासिक पड़ाव नहीं हैं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, साहित्यिक परंपरा और राष्ट्रभाव के निरंतर प्रवाह का उत्सव भी हैं। इसी भावभूमि पर इस वर्ष भारत मंडपम में आयोजित विश्व पुस्तक मेला इतिहास, साहित्य और राष्ट्रबोध का जीवंत मंच बनकर उभरा है, जहां शब्दों के माध्यम से भारत की आत्मा से साक्षात्कार हो रहा है।

नागरिकों की सुविधा और देश की गौरवगाथा को अधिक सुलभ बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार इस वर्ष कई विशेष कार्यक्रमों का आयोजन कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रतिपादित “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” का सूत्र इस पूरे आयोजन की वैचारिक धुरी के रूप में दिखाई देता है। राष्ट्रगीत वंदेमातरम के 150वें वर्ष के अवसर पर आयोजित गतिविधियां न केवल अतीत का स्मरण हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करने का प्रयास भी हैं।

  

विश्व पुस्तक मेले की थीम और उसका स्वरूप इसी सोच को स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित करता है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के नेतृत्व में शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में जिस प्रकार भाषायी अस्मिता और सांस्कृतिक विविधता को सम्मान दिया जा रहा है, उससे पूरे देश में अपनी-अपनी भाषाओं और परंपराओं को लेकर नया गौरव भाव देखने को मिल रहा है।

भारत मंडपम में सजे इस मेले में हिंदी, अंग्रेज़ी, उर्दू, बांग्ला, तमिल, तेलुगु, मराठी, ओड़िया सहित लगभग सभी भारतीय भाषाओं की पुस्तकों की समृद्ध उपस्थिति है। साथ ही दर्जनों विदेशी भाषाओं के लेखकों और प्रकाशकों की भागीदारी इस आयोजन को वैश्विक स्वरूप प्रदान करती है।

  

यह पुस्तक मेला केवल पुस्तकों की खरीद-फरोख्त का स्थान नहीं, बल्कि विचारों का संगम है। यहां भारतीय इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम, शौर्यगाथाओं और देश की अस्मिता से जुड़ी पुस्तकें पाठकों को विशेष रूप से आकर्षित कर रही हैं। वंदेमातरम की रचना से जुड़े ऐतिहासिक प्रसंग, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का साहित्य, स्वतंत्रता आंदोलन में गीत की भूमिका और राष्ट्र निर्माण में उसकी भावनात्मक शक्ति—इन सभी विषयों पर केंद्रित पुस्तकों के स्टॉल पाठकों की भीड़ से गुलजार हैं।

मेले में आने वाले पाठकों, खासकर युवाओं और छात्रों के लिए यह आयोजन एक जीवंत कक्षा की तरह है, जहां इतिहास केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि महसूस किया जाता है। वसुधैव कुटुम्बकम् की भारतीय अवधारणा यहां व्यवहार में उतरती दिखती है, जहां विश्व की विविध संस्कृतियां एक ही मंच पर संवाद करती नजर आती हैं।

वंदेमातरम के 150 वर्ष के इस अवसर पर विश्व पुस्तक मेला यह संदेश देता है कि साहित्य केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा का दर्पण है। इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रभाव के इस संगम में खड़ा यह मेला भारत की उस निरंतर यात्रा का प्रतीक है, जो अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान को समृद्ध और भविष्य को सशक्त बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

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