गाजियाबाद-हापुड़ के 277 में से महज 64 में लगे प्रदूषण मापक यंत्र।
राहुल कुमार, साहिबाबाद। एक तरफ एनसीआर में प्रदूषण रोकथाम को लेकर वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) सख्त है। दूसरी ओर उद्यमी औद्योगिक इकाइयों में प्रदूषण मापक यंत्र लगाने में लापरवाही बरत रहे हैं। जो यंत्र लगाने में रुचि दिखा रहे हैं उन्हें मिल नहीं पा रहे।
अभी तक महज 23 प्रतिशत औद्योगिक इकाइयों पर भी मापक यंत्र लगे हैं। महज दो सप्ताह बाद से ही केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की टीम कार्रवाई शुरू कर देगी। जिन इकाइयों में मापक यंत्र नहीं लगे मिले उन्हें सील करते हुए संचालन बंद किया जाएगा।
गाजियाबाद रीजन में गाजियाबाद व हापुड़ आते हैं। प्रथम चरण में मेटल, टेक्सटाइल व खाद्य से जुड़ी इकाइयों में मापक यंत्र लगाए जाने हैं। यूपीपीसीबी के आंकड़ों में इन तीनों श्रेणियों की दोनों जिलों में करीब 277 इकाइयां हैं। इनमें से अभी तक महज 64 ने ही मापक यंत्र लगे हैं। इनमें से भी 42 वे हैं, जिन्होंने पहले से ही मापक यंत्र लगवा रखे थे। सीएक्यूएम के आदेश के बाद महज 22 ने ही यंत्र लगवाए हैं। जबकि सीपीसीबी द्वारा केवल जनवरी माह की ही छूट दी गई है। 31 जनवरी से सीपीसीबी की टीम दोनों जिलों में औचक निरीक्षण शुरू कर देगी।
इस दौरान मौके पर जिस भी इकाई पर मापक यंत्र लगे नहीं पाए गए उनके बिजली कनेक्शन काटने और सील करने की कार्रवाई की जाएगी। हालांकि तीनों श्रेणियों के हजारों उद्योग संचालित हो रहे हैं, जो मानकों का पालन नहीं कर रहे।
दरअसल, वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) ने प्रदूषण पर शिकंजा कसने के लिए औद्योगिक इकाइयों पर अनिवार्य रूप से मापक यंत्र लगाने का फैसला लिया गया था। ये नियम पहले से था लेकिन उद्यमी इसका पालन नहीं कर रहे थे। अब ऐसा नहीं करने पर इकाइयों को सीधे सील कर दिया जाएगा।
तीन से 15 लाख तक आ रहा खर्चा
उद्यमियों का कहना है प्रदूषण मापक यंत्र बहुत महंगे हैं। इन्हें लगवाने के लिए थोड़ा समय और मिलना चाहिए था। दरअसल, केवल पीएम 2.5 मापने वाला यंत्र तीन से चार लाख का है। इसके अलावा पीएम-2.5, पीएम-10 व गैसों को मापने वाला यंत्र करीब 15 लाख रुपये तक का है। अगर और भी बेहतर गुणवत्ता का लगवाएंगे तो यह बजट दोगुना हो जाएगा।
जर्मनी से लाए जा रहे मापक यंत्र, मिलने हो रहे मुश्किल
अधिकारियों का कहना है कि देश में प्रदूषण मापक यंत्र ना के बराबर बनाए जाते हैं। इनका महंगा होने का कारण ये भी है कि वेंडर जर्मनी से खरीदकर ला रहे हैं। अगर देश में ही मिल पाते तो सस्ते मिल सकते थे। जो वेंडर हैं वह भी जरूरत के हिसाब से मापक यंत्र उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं। उद्यमियों का कहना है कि वेंडर एक से दो माह का समय मांग रहे हैं।
ट्रोनिका सिटी के टेक्सटाइल उद्यमी रमेश अग्रवाल का कहना है कि मापक यंत्र के लिए वेंडर से पूछा गया है उसने 13 लाख रुपये का बताया है। उसे आने में भी करीब एक माह लग जाएगा। इसके लिए और समय मिलना चाहिए।
कवि नगर के खाद्य उद्यमी मनीष ने बताया कि वेंडर को प्रदूषण मापक यंत्र खरीदने के लिए रुपये दे दिए हैं। वेंडर का कहना है कि जर्मनी से लाया जाएगा इसीलिए अभी इंतजार करना होगा। अगर निर्धारित समय तक नहीं लगा तो कंपनी बंद करनी पड़ेगी, इसका डर सता रहा है।
इकाइयों के मालिकों को दो बार नोटिस जारी किए जा चुके हैं। 124 ने प्रक्रिया शुरू कर दी है। 31 जनवरी तक की छूट दी गई हैै। निर्धारित तिथि तक मापक यंत्र नहीं लगे तो सीपीसीबी की टीम इकाइयों को सील करेगी। इसकी जिम्मेदारी उद्यमियों की होगी। - अंकित सिंह, क्षेत्रीय अधिकारी, यूपीपीसीबी |
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