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चीन-इजरायल की तुलना में भारत की उपज कम... सिर्फ उत्पादन नहीं, उत्पादकता में है गांव और किसान की समृद्धि

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दो-तिहाई आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों पर निर्भर



अरविंद शर्मा, नई दिल्ली। भारत की खेती केवल अन्न उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि गांवों की अर्थव्यवस्था, सामाजिक ढांचे और राष्ट्रीय विकास की बुनियाद है। खेत मजबूत होंगे, तभी गांव संभलेंगे व सशक्त होंगे और देश की अर्थव्यवस्था टिकाऊ बन पाएगी। देश की लगभग दो-तिहाई आबादी आज भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों पर निर्भर है।

लेकिन यहां इनोवेशन की गति कम है। वस्तुत: गांव और किसान की खुशहाली जितना बजट पर निर्भर है उतना ही किसानों की मनोदशा पर भी। खेती को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने पर ही स्थिति तेजी से बदल सकती है, यह किसानों को समझना होगा और केंद्र से लेकर राज्य सरकारों को प्रोत्साहन के जरिये इसे बढ़ावा देना होगा।
खेती की सबसे बड़ी कमजोरी कम उत्पादकता दर

खेती की सबसे बड़ी कमजोरी कम उत्पादकता दर है और इस दिशा में सरकारों की ओर से बहुत कम काम हो रहे हैं। कुल उत्पादन बढ़ने के बावजूद उत्पादकता में भारत आज भी चीन, इजरायल, अमेरिका, ब्राजील जैसे देशों से काफी पीछे है। औसतन दो से ढाई गुना कम उत्पादकता है। गेहूं, धान, दाल और तिलहन की उपज वैश्विक औसत से कम है। लगभग 86 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत हैं, जिनके पास सीमित जमीन है।

ऐसे में किसानों की आय बढ़ाने का रास्ता सिर्फ दो हैं, पहला- प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाना और दूसरा- उपज की बेहतर कीमत सुनिश्चित करना। लेकिन दोनों मोर्चों पर प्रगति सीमित है। उत्पादकता बढ़ने पर ही किसान अपनी जमीन पर पारंपरिक उपज की बजाय बाजार की मांग के अनुसार फसल बोएंगे। विविधीकरण के लिए सरकार कृषि विधेयक लेकर आई थी लेकिन वह राजनीति की भेंट चढ़ गया। ऐसे में विविधीकरण के लिए प्रोत्साहन और उत्पादकता बढाने पर जोर दिया जाना चाहिए।
फसलों की मार्केटिंग नीति में बदलाव की जरूरत

एमएसपी पर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति के सदस्य डा. बिनोद आनंद का कहना है कि गांवों की समृद्धि के लिए किसानों को सहकारिता से जोड़ना जरूरी है। फसलों की मार्केटिंग नीति में बदलाव किए जाएं। को-आपरेटिव एक्सपोर्ट जोन और को-आपरेटिव कमोडिटी जोन बनाए जाने चाहिए, ताकि फसलों की खरीद, निर्यात और वैल्यू एडिशन की प्रक्रिया आसान हो सके। खाद्यान्न उत्पादन और निर्यात बढ़ा है, लेकिन उसका लाभ किसानों तक नहीं पहुंचा।

खेती की लागत और बिक्री खर्च लगातार बढ़ रहे हैं। सहकारिता आधारित व्यवस्था से किसानों को उपज की वाजिब कीमत मिल सकेगी। सब्सिडी के बजाय दिए जाएं आकर्षक प्रोत्साहनपीएम-किसान सम्मान निधि के तहत सालाना छह हजार रुपये की सहायता से मदद जरूर मिल रही है। लेकिन वक्त की मांग है कि किसानों की अपनी आय इतनी बढ़े कि उन्हें इसकी जरूरत ही न रहे। यह काम बाजार की मांग के अनुसार वैज्ञानिक खेती से ही संभव है।

बजट में अब किसी सब्सिडी की बजाय सीधे तौर पर आकर्षक प्रोत्साहन की जरूरत है। एग्रो केम फेडरेशन ऑफ इंडिया के महानिदेशक डा. कल्याण गोस्वामी भी मानते हैं कि किसान कल्याण के लिए उत्पादन सब्सिडी से आगे बढ़कर गुणवत्ता, निर्यात और तकनीक के एकीकरण पर ध्यान देना होगा। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमजोरी खेती तक सीमित नहीं है। कृषि रोजगार घट रहा है, लेकिन गैर-कृषि रोजगार उस रफ्तार से नहीं बढ़ा। लिहाजा बजट का ध्यान खेत के आसपास ही ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा देने पर भी होना चाहिए।

20 प्रतिशत तक बढ़ सकता है कृषि क्रेडिट लक्ष्य

प्री-बजट सलाहों-सुझावों से संकेत मिलता है कि सरकार वित्त वर्ष 2026-27 में कृषि क्षेत्र के लिए बड़े स्तर पर संसाधन बढ़ाने की दिशा में जा सकती है, ताकि उत्पादन, आय और ग्रामीण मांग को गति मिले। अहम संकेत कृषि ऋण लक्ष्य को लेकर हैं। चालू वित्त वर्ष में 32.5 लाख करोड़ रुपये के कृषि क्रेडिट लक्ष्य को अगले बजट में 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ाकर लगभग 36 लाख करोड़ रुपये किया जा सकता है।

इस ऋण का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा आर्ट-टर्म फसल ऋण होता है, जो किसानों को सात प्रतिशत ब्याज दर पर मिलता है। समय पर भुगतान पर तीन प्रतिशत की अतिरिक्त ब्याज छूट से यह ऋण और सस्ता हो जाता है। इससे छोटे और सीमांत किसानों को आधुनिक तकनीक अपनाने, बीज, उर्वरक और उपकरणों में निवेश का अवसर मिलेगा और ग्रामीण बाजार में मांग मजबूत होगी।

मनरेगा के स्थान पर लाए गए नए कानून जी-रामजी के तहत सरकार ने पहले ही 1.51 लाख करोड़ रुपये के आवंटन का संकेत दिया है, जो पिछले वर्ष से करीब 70 प्रतिशत अधिक है।
पिछला बजट की घोषणा का असर देखना अभी बाकी

पिछले बजट में कृषि क्षेत्र के लिए कई महत्वाकांक्षी मिशनों की घोषणा की गई थी। इनमें प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना, उन्नत बीज मिशन, दाल आत्मनिर्भरता मिशन और फल-सब्जी उत्पादन को समर्थन देने वाली योजनाएं प्रमुख थीं।

इनका उद्देश्य कम उत्पादकता वाले जिलों में खेती को लाभकारी बनाना, बेहतर बीज और अनुसंधान के जरिए पैदावार बढ़ाना तथा किसानों की आय में सुधार लाना था। अभी काम जारी है। धन-धान्य योजना के लिए सौ पिछड़े जिलों की पहचान कर ली गई है और आगे की प्रक्रिया चल रही है।
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